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राजस्थान के कई शहरों में चल रही हैं बिना किताबों वाली लाइब्रेरी

Sun, 23 Dec 2018 02:37 PM IST
Shani Mishra भाषा, जयपुर
भाषा, जयपुर Published by: Shani Mishra Updated Sun, 23 Dec 2018 02:37 PM IST
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Rajasthan library without books jaipur
प्रतीकात्मक तस्वीर
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लाइब्रेरी या पुस्तकालय, शब्द के साथ ही जहन में करीने से लगी किताबों की कतारों, पत्रिकाओं और अखबारों की तस्वीर उभरती है, लेकिन अगर लाइब्रेरी में किताबें ही न हों तो वह कैसी लाइब्रेरी, कैसा पुस्तकालय? लेकिन यह हकीकत है कि जयपुर सहित राजस्थान के कई शहरों में ऐसी बिना किताबों वाली लाइब्रेरी की संख्या तेजी से बढ़ी हैं।

खासकर उन इलाकों में जहां छात्र छात्राओं की संख्या अधिक है वहां ऐसी ढेरों लाइब्रेरी खुली हैं। ये जहां विद्यार्थियों के लिए एकाग्र होकर अध्ययन करने का ठिकाना बनी हैं वहीं परिचालकों के लिए चोखा धंधा साबित हो रही हैं।

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दरअसल नयी पीढ़ी की ये लाइब्रेरी पारंपरिक पुस्तकालय जैसी नहीं होती जिनमें किताबों से भरे कमरे हों जहां शांति से बैठकर उन्हें पढा जा सके या पढने के लिए लिया जा सके। बल्कि ये नयी लाइब्रेरी सेल्फ स्टडी जोन के रूप में काम करती हैं जहां छात्र-छात्राएं अपनी-अपनी किताबें लेकर आते हैं वहां बैठकर पढ़ते हैं और वापस अपने घर, हास्टल या कमरे में चले जाते हैं। इन दिनों इस तरह की लाइब्रेरी का चलन जोर पकड़ रहा है और इनके लिए जरूरत होती है बस जगह की।
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जयपुर में स्टडी प्वाइंट लाइब्रेरी चला रहे तारा अवाना कहते हैं, हम छात्र छात्राओं को शोर शराबे व चिल्लपों से दूर एक शांत वातावरण मुहैया करवाते हैं जहां बैठकर वह एकाग्रचित होकर अध्ययन कर सकते हैं। साथ ही उन्हें फ्री वाईफाई की सुविधा उपलब्ध रहती है जिससे वे अपने लैपटाप या टैब पर ऑनलाइन क्लासेज ले सकते हैं। 

   

विभिन्न प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए घर से दूर शहर में कमरा लेकर या हास्टल में रह रहे युवक, युवतियों के लिए इस तरह की लाइब्रेरी बहुत उपयोगी साबित हो रही हैं। महारानी फार्म में ऐसे ही एक छात्र आयुष कुमार के अनुसार न केवल हास्टल या कमरा लेकर रहने वाले बल्कि अपने परिवार के साथ रह रहे बच्चे भी इन लाइब्रेरी की सदस्यता लेते हैं क्योंकि वहां उन्हें पढ़ने के लिए पूरी तरह एकांत और अनुकूल माहौल मिलता है।

यही कारण है कि जयपुर का गोपालपुरा बाइपास हो या घड़साना का सखी रोड अथवा सूरतगढ का हाउसिंग बोर्ड, इस तरह की लाइब्रेरी खुल रही हैं और चल रही हैं। वह भी बड़ी संख्या में।

घड़साना मंडी में ऐसी ही एक लाइब्रेरी चलाने वाले सुरजीत इसे कम निवेश में चोखा धंधा मानते हैं। वे कहते हैं कि बैठने का फर्नीचर, पीने का पानी, एसी हीटर और न्यूज पेपर जैसी बुनियादी सुविधाओं के बदले हर छात्र से 400 से 600 रुपये शुल्क लिया जाता है। यह दोनों ही पक्षों के लिए फायदे का सौदा है।

अवाना के अनुसार उनके यहां छात्र-छात्राएं सुबह सात बजे से दोपहर दो बजे तक और फिर दो बजे से रात नौ बजे तक आकर पढ सकते हैं। किताबें, लैपटाप या टैब उन्हें खुद का ही लाना होता है।

युवाओं की बढ़ती संख्या के साथ राजस्थान में कोटा के बाद जयपुर, सीकर व सूरतगढ़ सहित अनेक शहर कस्बे प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रमुख केंद्र के रूप में उभरे हैं। वहां बड़ी संख्या में बच्चे बाहर से आकर रहते हैं, जिससे निजी हास्टलों का काम बढा है। मकान किराये पर देना एक बड़ा उद्योग बन गया है और अब नया कांसेप्ट इन बिना किताबों वाली लाइब्रेरी के रूप में सामने आया है।

   
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