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राजस्थान में अब ज्यादा बच्चे भी अच्छे: क्यों हटाई जा रही तीन दशक पुरानी रोक, और किन राज्यों में है ऐसा कानून

Thu, 26 Feb 2026 07:10 PM IST
Kirtivardhan Mishra स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: Kirtivardhan Mishra Updated Thu, 26 Feb 2026 07:10 PM IST
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सार
राजस्थान में दो बच्चों का नियम कब से और कितनी सख्ती से लागू रहा है? यह फैसला क्यों लिया गया था और समय के साथ इन्हें किन-किन और क्षेत्रों तक बढ़ाया गया? इस दौरान बच्चे पैदा करने के नियम क्या थे और दो से ज्यादा बच्चों वाले लोग नियमों को तोड़ने के लिए क्या-क्या आजमाइशें करते थे? अब राजस्थान में यह नियम हटने से क्या होगा? भारत में कहां-कहां इस तरह दो बच्चों की सीमा से जुड़े नियम लागू रहे हैं? आइये जानते हैं...
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Rajasthan Cabinet Two Child Policy for Municipal and Local Polls scrapped after 3 decades other States Assam
राजस्थान में दो संतान की नीति पर चली कैंची। - फोटो : अमर उजाला/AI

विस्तार

राजस्थान में स्थानीय चुनावों से पहले राज्य सरकार ने बड़ा फैसला किया है। बुधवार को मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में हुई कैबिनेट बैठक में तीन दशक पुरानी उस नीति को बदल दिया गया, जिसके तहत राज्य में दो से ज्यादा बच्चे वाले लोग निकाय और पंचायत चुनाव नहीं लड़ सकते थे।  


राजस्थान में साल 1994 में पहली बार परिवार नियोजन को बढ़ावा देने के लिए मुख्यमंत्री भैरो सिंह शेखावत की भाजपा सरकार ने एक कानून बनाया था। इसके बाद अलग-अलग कानूनों के जरिए दो बच्चों की नीति को अलग-अलग नौकरियों पर भी लागू किया जाने लगा। हालांकि, अब जनसंख्या वृद्धि दर में कमी आने के बाद राजस्थान ने इस नियम को बदलने का फैसला किया है। अमर उजाला से बातचीत के दौरान भारत के पूर्व रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त अमूल्य रत्न नंदा से सरकार के इस फैसले पर कई नई बातें कीं और अहम तथ्य साझा किए।

राजस्थान में दो बच्चों का नियम कब से और कितनी सख्ती से लागू रहा है? यह फैसला क्यों लिया गया था और समय के साथ इन्हें किन-किन और क्षेत्रों तक बढ़ाया गया? इस दौरान बच्चे पैदा करने के नियम क्या थे और दो से ज्यादा बच्चों वाले लोग नियमों को तोड़ने के लिए क्या-क्या आजमाइशें करते थे? अब राजस्थान में यह नियम हटने से क्या होगा? भारत में कहां-कहां इस तरह दो बच्चों की सीमा से जुड़े नियम लागू रहे हैं? आइये जानते हैं...

राजस्थान में कब लागू हुए दो बच्चों से जुड़े नियम, किन क्षेत्रों में लागू

राजस्थान दो बच्चों की सीमा से जुड़े नियम लागू करने वाला पहला राज्य बना। यहां चुनाव और सरकारी नौकरियों के लिए अलग-अलग कानूनों में संशोधन करके ये नियम लागू किए गए।

1994-1995: पंचायत और निकाय चुनावों के लिए 
स्थानीय स्तर के चुनावों में दो बच्चों का नियम 1992 में लाया गया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरों सिंह शेखावत की सरकार के समय राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 के तहत यह प्रावधान किया गया था कि जिनके दो से अधिक बच्चे होंगे, वे पंचायत और निकाय चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। इसके लिए कटऑफ तारीख 27 नवंबर 1995 रखी गई थी। यानी इसके बाद जिन लोगों की तीसरी संतान पैदा होगी, वे सरकारी सेवा के लिए अयोग्य होंगे। इसके लिए राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 और राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, 1959 में बदलाव किया गया। यही बदलाव बाद में नगरपालिका अधिनियम, 2009 में भी लागू रहा।

2002: सरकारी नौकरियों के लिए
सरकारी नौकरी पाने के लिए दो से ज्यादा बच्चे होने पर अयोग्य ठहराने का कानून साल 2002 में लाया गया था। उदाहरण के तौर पर, राजस्थान पुलिस अधीनस्थ सेवा नियम के अंतर्गत यह तय किया गया है कि 1 जून 2002 को या उसके बाद दो से ज्यादा बच्चों वाले उम्मीदवार पुलिस बल में नियुक्ति के पात्र नहीं माने जाते। राजस्थान विभिन्न सेवा (संशोधन) नियम, 2001 के तहत यह नियम सख्ती से लागू है।

यह फैसला क्यों लिया गया था?

भारत सरकार के पंचायती राज मंत्रालय की ओर से 2009 में कराई गई एक रिसर्च में राजस्थान में दो बच्चों की नीति के असर के बारे में विस्तार से बताया गया था। इसमें पूर्व की भैरो सिंह शेखावत सरकार की तरफ से दो संतानों की नीति लाने की वजहों से लेकर इसके प्रभाव तक को सामने रखा गया था। 

1. जनप्रतिनिधियों को 'रोल मॉडल' के रूप में स्थापित करना 
इस नियम को लागू करने के पीछे सबसे बड़ी धारणा यह थी कि अगर चुने हुए जनप्रतिनिधि (जैसे पंचायत सदस्य) दो बच्चों के नियम को अपनाते हैं, तो वे समाज के लिए रोल मॉडल यानी आदर्श के रूप में काम करेंगे। यह माना गया कि उन्हें देखकर आम जनता भी प्रेरित होगी और छोटे परिवार के स्वरूप को अपनाएगी। 

2. जनसंख्या नियंत्रण और स्थिरीकरण 
देश और राज्य के हित में बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रित करना एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय माना गया। इस नियम का मुख्य उद्देश्य जनसंख्या स्थिरीकरण के लक्ष्य को हासिल करना था। 

3. जन्म दर में प्रत्यक्ष कमी 
उस दौरान तर्क दिया गया था कि अगर पंचायती राज संस्थाओं के लगभग 35 लाख निर्वाचित प्रतिनिधियों पर यह नियम लागू किया जाता है, तो इसके जरिए सीधे तौर पर लाखों अतिरिक्त जन्मों को रोका जा सकेगा।

4. परिवार नियोजन को कानूनी समर्थन
सुप्रीम कोर्ट ने भी 2003 के अपने एक फैसले में स्पष्ट किया था कि चुनाव लड़ने के लिए दो से अधिक बच्चों वाले उम्मीदवारों को अयोग्य ठहराने के प्रावधान के पीछे का मुख्य उद्देश्य परिवार नियोजन को बढ़ावा देना है।

5. सामाजिक-आर्थिक बेहतरी
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि इस तरह की अयोग्यता का नियम राष्ट्रीय जनसंख्या नीति के तहत आता है और इसका व्यापक उद्देश्य जनता की सामाजिक-आर्थिक बेहतरी और बेहतर स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित करना है।

योजना का क्या असर रहा, दो से ज्यादा बच्चे पैदा होने पर क्या हुआ?

राजस्थान में दो बच्चों के नियम का काफी गहरा और कई मामलों में नकारात्मक असर देखने को मिला। सरकारी और मीडिया रिपोर्ट्स में भी इन प्रभावों का जिक्र किया गया है। इस मुद्दे पर भारत के पूर्व रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त अमूल्य रत्न नंदा ने कहा कि टू-चाइल्ड पॉलिसी थोपने के गंभीर परिणाम होते हैं। चीन की 'वन-चाइल्ड पॉलिसी' का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि इससे कन्या भ्रूण हत्या बढ़ती है और जन्म के समय लिंगानुपात बुरी तरह बिगड़ जाता है।

1. बड़े पैमाने पर जनप्रतिनिधियों की अयोग्यता

इस नियम के कारण पंचायत स्तर पर कई लोगों को अपना पद गंवाना पड़ा। 2009 के सरकारी शोध के मुताबिक, साल 2000 के पंचायत चुनावों के बाद राजस्थान में अयोग्यता के कुल 808 मामले सामने आए थे, जिनमें से 63% (508 मामले) केवल दो बच्चों के नियम के उल्लंघन के कारण थे। पद गंवाने वालों में सबसे बड़ी संख्या पंचायत सदस्यों (पंचों) और सरपंचों की थी। इसके अलावा तीन बच्चों वाले कई नेता चुनाव लड़ने से ही वंचित रह गए। यह स्थिति इसके बाद भी हर वर्ष जारी रही, जिससे बचने के लिए बाद में उम्मीदवारों ने अवैध हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए।

2. कानून से बचने के लिए अनैतिक हथकंडे 

चुनाव लड़ने या अपना पद बचाने के लिए कई उम्मीदवारों ने अनैतिक और गैर-कानूनी तरीके अपनाए। इनमें फर्जी जन्म प्रमाण पत्र बनवाना, जन्म तिथि में हेरफेर करना, तीसरे बच्चे के पितृत्व से इनकार करना और बच्चे को किसी और को गोद दे देना शामिल रहा। 

दस्तावेजों में फर्जीवाड़ा: कई उम्मीदवारों ने तीसरे बच्चे के जन्म का पंजीकरण ही नहीं करवाया। इसके अलावा घर पर होने वाले प्रसव का फायदा उठाकर बच्चों की वास्तविक जन्म तिथि में हेरफेर करना, फर्जी जन्म प्रमाण पत्र बनवाना और चुनाव आयोग के सामने झूठे शपथ पत्र दाखिल करना एक आम बात हो गई थी। प्रसव के लिए अस्पताल में गलत नाम से भर्ती होने के मामले भी सामने आए। खुद को बचाने के लिए झूठे नसबंदी प्रमाण पत्र का भी सहारा लिया गया।

बच्चे को गोद देना या अपना होने से इनकार करना: अपने तीसरे बच्चे को किसी रिश्तेदार को गोद दे देना, बच्चे को छिपाकर रखना या यह दावा करना कि वे उस बच्चे के माता-पिता नहीं बल्कि केवल 'देखभाल करने वाले' हैं जैसी घटनाएं भी सामने आई हैं। इससे जुड़ा नागौर का एक चर्चित उदाहरण भी है। यहां एक बड़े नेता के तीन बच्चे थे। जब यह नियम लागू हुआ, तो उसी दौरान उनकी तीसरी संतान का जन्म हुआ था। चुनाव लड़ने के लिए उन्होंने अपने सबसे छोटे बच्चे को कानूनी रूप से अपने सगे भाई को गोद दे दिया।

हालांकि, विपक्षी उम्मीदवार ने हार नहीं मानी और अस्पताल के जन्म प्रमाण पत्र और स्कूल के पुराने रिकॉर्ड निकालकर उनकी पोल खोल दी, जिसके कारण उन्हें अपना पद गंवाना पड़ा।

पितृत्व से ही कर दिया इनकार: सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ लोगों ने तो उम्मीदवारी के लिए अपनी ही संतान को अपनाने से मना कर देना या बच्चे को नाजायज घोषित कर दिया। इसके अलावा खुद को बचाने के लिए कुछ उम्मीदवारों ने डीएनए टेस्ट तक करवाने के पैंतरे आजमाए।

3. महिलाओं के खिलाफ क्रूर हथकंडों की वजह भी बना नियम

अपने पद बचाने के लिए पुरुष नेताओं ने पत्नियों के खिलाफ सबसे ज्यादा अनैतिक तरीके अपनाए। इनमें गर्भवती पत्नी को छोड़ देना, उनका गर्भपात करवाना या उसे कुछ समय के लिए किसी दूसरी जगह भेज देने जैसे कदम शामिल रहे, ताकि तीसरे बच्चे का रिकॉर्ड नेताओं के साथ न जुड़े। एआर नंदा के मुताबिक, इन नियमों की वजह से अवैध तरीके से तीसरे बच्चे का लिंग पता करने का चलन बढ़ा और अगर यह लड़की होती तो उनकी भ्रूण हत्या करने जैसी घटनाएं बढ़ीं। यानी दो बच्चों की नीति राज्य में लिंगानुपात बिगाड़ने का भी काम किया। 

4. कमजोर और हाशिए के वर्गों पर सबसे ज्यादा मार 

अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि इस नियम का सबसे ज्यादा नुकसान युवा, गरीब और दलित वर्गों (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग) को हुआ। शिक्षा, जागरूकता और बेहतर स्वास्थ्य/परिवार नियोजन सुविधाओं की कमी के कारण ये वर्ग आसानी से इस नियम से नुकसान में रहे। पूर्व जनगणना आयुक्त के मुताबिक, चूंकि पिछड़े लोगों के पास शिक्षा के साधन काफी कम होते हैं। ऐसे में जब कम शिक्षा वाले लोग जानकारी के अभाव में दो से ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं तो उनसे वह मौके भी छिन जाते हैं, जो आमतौर पर उन्हें मिलने चाहिए। दो से अधिक बच्चे होने पर उन्हें पंचायत चुनाव लड़ने से रोक दिया जाता है, जिससे लोकतंत्र में उनकी भागीदारी खत्म हो जाती है।

5. राजनीतिक रंजिश और ब्लैकमेलिंग का हथियार बना नियम

यह नियम गांव की राजनीति में विरोधियों से बदला लेने का एक बड़ा हथियार बन गया। चुनावी प्रतिद्वंद्वियों की ओर से शिकायतें दर्ज कराने के कारण कई जनप्रतिनिधि अदालती मुकदमों में उलझ गए, जिससे उनका समय और पैसे दोनों बर्बाद हुए और ग्रामीण विकास के कार्यों से उनका ध्यान पूरी तरह भटक गया।

6. जागरूकता बढ़ी, पर जनसंख्या वृद्धि दर काफी नीचे आई

इन तमाम विवादों के बीच योजना के कुछ सकारात्मक प्रभाव भी देखे गए। इस नियम ने ग्रामीण समाज का ध्यान बढ़ती जनसंख्या की ओर खींचा, छोटे परिवार के महत्व को उजागर किया और कई लोगों को परिवार नियोजन के उपाय अपनाने के लिए प्रेरित भी किया।

हालांकि, इसका एक असर यह भी रहा है कि राजस्थान में जनसंख्या वृद्धि दर में कमी आई है। खुद राजस्थान सरकार के मंत्रियों ने बुधवार को बताया कि राजस्थान में जब यह नियम लागू हुआ था, तब यहां टोटल फर्टिलिटी रेट (टीएफआर) 3.6 था। यानी राजस्थान में हर एक मां औसतन 3.6 बच्चों को जन्म दे रही थी/दे सकती थी। हालांकि, अब यह दर 2.0 पर आ गई है। यह आंकड़ा इसलिए अहम है, क्योंकि टीएफआर अगर 2.1 से नीचे होता है तो यह नए जन्मों के घटने का संकेत है। यानी जितने लोगों की जान जा रही है, उतने बच्चे पैदा नहीं हो रहे। अगर टीएफआर 2.1 से ऊपर होता है, तो जन्मदर क्षेत्र में होने वाली मृत्यु दर से अधिक होती है। 

इसके अलावा, तीसरे बच्चे को छिपाने के चक्कर में भ्रष्टाचार भी बढ़ता है। नंदा ने इस बात पर बहुत खुशी जताई है कि राजस्थान ने अब इस नीति से पीछे हटने का फैसला लिया है। वे इसे बहुत समझदारी भरा और बेहतरीन फैसला मानते हैं, जिसका सभी को स्वागत करना चाहिए।

अब राजस्थान में यह नियम हटने से क्या होगा? 

राजस्थान में दो बच्चों की नीति से कई व्यापक दुष्प्रभाव पैदा हुए हैं, जिनके तहत मुकदमे बढ़े और नेताओं-संगठनों ने नियम बदलने की मांग शुरू की। इसके बाद ही राजस्थान सरकार ने नियम को बदला है। एआर नंदा के मुताबिक, यह काफी अच्छी बात है कि राजस्थान ने अब इस नीति से पीछे हटने का फैसला लिया है।

उन्होंने कहा कि देश और राज्यों में कुल प्रजनन दर (टोटल फर्टिलिटी रेट) घटकर अब औसतन दो या उससे भी कम हो गई है। इसका मतलब है कि जन्मदर अब प्राकृतिक रूप से नियंत्रित होकर प्रतिस्थापन स्तर पर आ गई है। ऐसे में राजस्थान में जन्मदर को सीमित करने वाली नीति के हटने से काफी फायदा होने की संभावना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि फिलहाल इस मुद्दे पर यह नहीं कहा जा सकता कि देर हुई है या नहीं, लेकिन यह फैसला मौजूदा समय में सही है और उम्मीद है कि असम समेत जिन राज्यों में अभी यह नियम लागू है, वहां भी इसे हटाने पर विचार होगा। 

और किन-किन राज्यों में लागू हैं दो बच्चों से जुड़े नियम?

राजस्थान के अलावा भारत के कई अन्य राज्यों में भी जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा देने के लिए 'दो बच्चों के नियम' लागू किए गए। अलग-अलग राज्यों में यह नियम पंचायत चुनाव, स्थानीय निकाय चुनाव और सरकारी नौकरियों में लागू हैं।

1. असम
असम कैबिनेट ने फैसला लिया था कि साल 2021 से दो से अधिक बच्चों वाले व्यक्ति सरकारी नौकरियों के लिए अयोग्य माने जाएंगे।

2. महाराष्ट्र
महाराष्ट्र में जिला परिषद और पंचायत समिति अधिनियम के तहत दो से अधिक बच्चों वाले व्यक्तियों को स्थानीय निकाय चुनाव (ग्राम पंचायत से लेकर नगर निगम तक) लड़ने से अयोग्य ठहराया गया है। साथ ही, महाराष्ट्र सिविल सेवा नियम, 2005 के तहत सरकारी नौकरी के लिए भी यह नियम लागू है। इसके अलावा, दो से अधिक बच्चों वाली महिलाओं को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लाभ से वंचित करने का भी प्रावधान है।

3. गुजरात
साल 2005-06 में गुजरात सरकार ने स्थानीय प्राधिकरण अधिनियम में संशोधन किया था, जिसके तहत दो से अधिक बच्चों वाले व्यक्तियों को स्थानीय स्वशासन (ग्राम पंचायत, नगर पालिका और नगर निगम) के चुनाव लड़ने से अयोग्य कर दिया गया।

4. आंध्र प्रदेश और तेलंगाना
इन दोनों राज्यों में 'पंचायत राज अधिनियम, 1994' के तहत यह प्रावधान है कि 30 मई 1994 के बाद यदि किसी व्यक्ति के दो से अधिक बच्चे होते हैं, तो उसे पंचायत चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा। 

5. ओडिशा
ओडिशा में 'जिला परिषद अधिनियम, 1991' के तहत दो से ज्यादा बच्चों वाले उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने पर रोक है।

6. उत्तराखंड
उत्तराखंड सरकार ने पंचायत चुनावों के लिए दो बच्चों का नियम लागू किया था। हालांकि, हाईकोर्ट के दखल के बाद ग्राम प्रधान और ग्राम पंचायत वार्ड सदस्यों को इस नियम से छूट दे दी गई। वर्तमान में यह नियम केवल जिला पंचायत और ब्लॉक विकास समिति (बीडीओ) का चुनाव लड़ने वाले सदस्यों पर लागू होता है।

7. हरियाणा
हरियाणा में 'पंचायती राज अधिनियम, 1994' के तहत पंचायत चुनावों में यह नियम लागू किया गया था। साल 2003 में 'जावेद बनाम हरियाणा राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस नियम को वैध ठहराया था।
 

इन राज्यों में दो बच्चों से जुड़े नियम वापस लिए गए

मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश में साल 2001 से सरकारी नौकरियों (न्यायिक सेवाओं सहित) के लिए दो बच्चों का नियम लागू किए गए। इसके तहत 26 जून 2001 के बाद जिन लोगों के तीसरे बच्चे का जन्म हुआ है, वह सरकारी सेवा के लिए अयोग्य हो जाते हैं। यह नियम उच्च न्यायिक सेवा के लिए भी लागू है। 

इसे स्थानीय निकाय चुनावों के लिए भी लागू किया गया था, लेकिन भारी विरोध और इसके नकारात्मक परिणामों के बाद साल 2005 में तत्कालीन सरकार ने इसे पंचायत चुनावों से वापस ले लिया।

हिमाचल प्रदेश: हिमाचल ने भी साल 2000-2001 में इस नियम को अपनाया था, लेकिन बाद में फरवरी 2005 में कैबिनेट के फैसले के जरिए इसे वापस ले लिया गया।

छत्तीसगढ़: छत्तीसगढ़ को भी राज्य गठन के समय मध्य प्रदेश से पंचायत चुनावों में दो बच्चों का नियम विरासत में मिला था। हालांकि, बाद में राज्य ने इस नीति को खत्म कर दिया।


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