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हरियाणा की जेलों में रेडियो, 21 लोगों की टीम रचेगी इतिहास

Sun, 10 Jan 2021 03:17 AM IST
देव कश्यप डॉ. वर्तिका नंदा
डॉ. वर्तिका नंदा Published by: देव कश्यप Updated Sun, 10 Jan 2021 03:17 AM IST
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Radio in Haryana jails 21 people team will create history
तिनका तिनका की संस्थापक वर्तिका नंदा और जेल रेडियो से जुड़े लोग - फोटो : अमर उजाला

अब जेलें कहेंगी। उनके पास अपना रेडियो हो, इस मुहिम ने अब रफ्तार पकड़ ली है। 2021 की शुरुआत में ही हरियाणा की जेलें इस कोशिश को अगले चरण पर ले जाएंगी। 21 लोगों की टीम है। 16 पुरुष और पांच महिलाएं। यह सभी मिलकर इतिहास रचेंगे। यह 21 बंदी हरियाणा की तीन अलग-अलग जेलों में अपनी सजा काट रहे हैं। इन सबको जेल रेडियो के लिए चुना गया और 2020 में दिसंबर के अंत में इनकी विधिवत ट्रेनिंग हुई। इस तरह हरियाणा की जेलों के पहले जेल रेडियो के लिए पन्ने जुड़ने शुरू हुए।

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2013 में जुलाई के अंत के महीने में एक खुशनुमा दोपहर में मुझे तिहाड़ जेल के रेडियो की शुरुआत का साक्षी बनने का मौका मिला था। भारत में जेल रेडियो की शुरुआत दक्षिण एशिया के इस सबसे बड़े जेल परिसर से ही हुई थी। वहां बंदियों से बात करते-करते मैने उस दिन सोचा था कि इस कोशिश को अपने कर्म और चिंतन का एक हिस्सा बनाऊं और वैसा हुआ भी।
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2019 में भारत की सबसे पुरानी जेल इमारत में चल रही जिला जेल आगरा को मैंने तिनका तिनका प्रिजन रेडियो मॉडल के लिए चुना। उस समय इस जेल में करीब 2,700 बंदी थे। पहली मुलाकात में जब बंदियों से पूछा गया कि क्या वे जेल रेडियो का हिस्सा बनना चाहेंगे तो गिनती के कुछ बंदी ही सामने आए। उस समय इन बंदियों को इस बात का इल्म तक नहीं था कि कोरोना के दौर में यही जेल रेडियो जेल में उनका सबसे बड़ा सहारा बनने वाला है।
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जेल का यह रेडियो महिला और पुरुष बैरक के बीच के एक हिस्से में बना हुआ है। यह पहले जेल के चीफ हेड वार्डर का कमरा था। बाद में इसे जेल रेडियो बना दिया गया। कई महीनों की मेहनत के बाद आखिरकार 31 जुलाई 2019 को जब इस जेल रेडियो की शुरुआत हुई तो उत्साह देखने लायक था। उस दिन कई बातें पहली बार हुईं- महिला बैरक से बच्चों ने पहली बार जेल के इस हिस्से में आकर जेल रेडियो को देखा, महसूस किया और माइक को पकड़ कर अपनी कविताएं सुनाईं। महिला बैरक की  कुछ बंदिनियों को भी यही मौका पहली बार मिला।

इसकी दीवार को अरबाज और सतीश ने बनाया। इसका रंग ठीक वही था जो तिनका तिनका ने कुछ और जेलों की दीवारों में बनवाया है। दीवार के बनने के दौरान ही एक बंदी ने मुझे बताया कि वो कुछ दिनों पहले आत्महत्या करने की कोशिश कर चुका है, लेकिन जेल के रेडियो की इस प्रक्रिया से जुड़ जाने से उसके अवसाद में बेहद कमी आयी है।

रेडियो शुरू हुआ और सपनों ने पंख लेने शुरू किए। महिला बैरक से हर रोज एक महिला बंदी आकर यहां पर कार्यक्रम प्रस्तुत करने लगी, पुरुष जेल से एक नवयुवक। देश की किसी जेल में शायद पहली बार ऐसा हुआ कि कोई रेडियो जॉकी महिला थी और वे नियमित तौर पर प्रसारण से जुड़ी थी। कार्यक्रमों का रनऑर्डर बनाया गया ठीक वैसे जैसा किसी व्यावसायिक रेडियो स्टेशन में बनाया जाता। मोंटाज बना, धुन बनी, और साथ ही बनी बंदियों की पसंद के कार्यक्रमों की लिस्ट। जेल के अंदर कलाकार बंदियों की तलाश शुरू हो गई। उनकी सूची भी बनी और उन्हें प्रेरित किया गया कि वे अपनी आवाज में अपनी बात को कहें। इस पूरी मुहिम में जेल के अधीक्षक शशिकांत मिश्रा और उनकी टीम का भरपूर सहयोग मिला। जेल सृजनस्थली का स्वरूप लेने लगी।

कोरोना आया तो जेलों में मुलाकात बंद हो गईं। यह बहुत उदासी का मौसम था। इस बीच जेल का रेडियो साथी बन गया। रजत हर रोज बंदियों के पसंद के कार्यक्रमों को सुनाने लगा। उनकी पसंद के गीत, किसी दिन उदासी भरे, किसी दिन उम्मीद भरे और इन गानों ने बैरकों में रोशनियों को भर दिया। यह जेल रेडियो अब भी जारी है।

इस कड़ी में दूसरी पहल थी- हरियाणा की जेलें। अक्तूबर के महीने में प्रक्रिया शुरू हुई , दिसंबर में ऑडिशन हुआ। तीनो जेलों के करीब 60 बंदियों ने आवेदन दिया। उन्हें हाथ से लिखी हुई चिट्ठी भिजवाई गई। बैरक में उन्होंने इसे पढ़ा। चिट्ठी और जेल रेडियो की अहमियत को कुछ समझा। ऑडिशन वाले दिन जबरदस्त उत्साह था। हरियाणा की जेलों के महानिदेशक के सेल्वाराज पूरी तल्लीनता से इस प्रक्रिया मे शामिल रहे। तीनो जेलों के सुपरिटेंडेंट ऑडिशन के समय खुद वहां मौजूद रहे– जयकिशन छिल्लर, लखबीर सिंह बरार और देवी दयाल। वे बंदियों के उत्साह को बढ़ाते रहे। ऑडिशन के दौरान कुछ बंदियों ने कहा कि उन्हें ठीक से बोलना नहीं आता, लेकिन बोलना सीखने की इच्छा है। इनमे से किसी बंदी ने ऑडिशन के पहले तक रेडियो का हिस्सा बनने का सपना तक नहीं देखा था। किसी ने माइक के सामने कभी नहीं बोला था, लेकिन अब उनके सामने एक सुंदर हकीकत थी।

26 दिसंबर से 30 दिसंबर, 2020 तक इन तीनो जेलों की ट्रेनिंग वर्कशॉप चली। यह जेलें थीं- सेंट्रल जेल अंबाला, जिला जेल फरीदाबाद और जिला जेल। पांच दिनों की इस ट्रेनिंग में नियत समय से ज्यादा समय तक काम चला। इसने कई नए मापदंड तय किए। इन बंदियों को रोज होमवर्क दिया जाता था। उनसे संवाद स्थापित किया गया, उनकी पसंद- नापसंद पूछी गई, कार्यक्रमों की लिस्ट बनाई गई। उन्हें जेल के कलाकारों को ढूंढने का काम दिया गया। मीडिया की शब्दावली समझाई गई, फाइव डब्ल्यू (W) वन एच (H), खबर कैसी लिखी जाए, इनवर्टेड पिरामिड कैसे होता है, क्या होता है, खबर लिखते समय किन  बातों को ध्यान में रखना है, जेल की न्यूज क्या होगी, कैसी होगी- इन पर विस्तार से बात हुई।

उन्हें बताया गया कि वे इस जेल रेडियो के उत्पादक भी खुद है और उपभोक्ता भी। इस लिहाज से यह रेडियो पूरी तरह से उनका अपना है। उनकी अपनी पूंजी है। पांच दिनों में हैरान करने वाले नतीजे सामने आए। महिलाएं खुलकर बातें करने लगीं। उनके पास लिखने को और कहने को बहुत कुछ था। तीनो जेलों ने भरपूर उत्साह के साथ जेल रेडियो का  सिग्नेचर ट्यून बनाया और परिचय गान भी। एक परिचय गान से बात शुरू हुई और हर जेल ने चार परिचय गान बना डाले, चारों के केंद्र में जेल का रेडियो।

आखिरी दिन जिला जेल फरीदाबाद में वहां बंदियों से मुलाकात हुई। फरीदाबाद जेल के सभी दस बंदियों ने बड़े जोश से ये बताया कि वे इस रेडियो के लिए क्या करना चाहेंगे। इन सब को होमवर्क दिया गया था कि आखिरी दिन वे करीब सौ शब्दों में किसी के भी नाम एक चिट्ठी लिखेंगे। यह काम भी बंदियों ने बखूबी किया। किसी ने अपने पिता के नाम चिट्ठी लिखी, किसी ने  मां के नाम, किसी ने पति के नाम और किसी ने बहन के नाम और उन सबके केंद्र में जेल के रेडियो को रखा। ट्रेनिंग खत्म हो गई लेकिन बात यहां से शुरू होती है। अब सभी ट्रेनी बंदी एक-दूसरे को आरजे कहते हैं और सृजन में मशगूल रहते हैं। बैरक से आसमान का जो एक टुकड़ा दिखता है, उसमें चमक दिखने आने लगी है। शिकायतें घटी हैं, सद्भाव बढ़ा है।

बाहर की दुनिया को शायद बरसों यह समझने में लगेंगे कि जेल की एक अलग दुनिया है। जेल को संसार की बनी-बनाई कसौटियों पर कसा नहीं जा सकता। बीते सालों में बहुत से लोगों ने मुझसे कहा कि वे जेल के लिए कुछ करना चाहते हैं, लेकिन अक्सर कुछ करने में कहीं से पूंजी पाने की एक लालसा दिखाई दी। जेलें कुछ दे नहीं सकतीं आर्थिक तौर पर तो बिल्कुल नहीं लेकिन मानसिक और आध्यात्मिक तौर पर बहुत कुछ देती हैं जिसको मापना बाहरी दुनिया के बस में अक्सर होता ही नहीं। कोरोना में अपनी निजी परेशानियों से जूझ रहे लोगों के लिए नए साल के जश्न के बीच में यह सोचना भी गवारा नहीं था कि जेल में कुछ लोग ऐसे हैं जिनकी परवाह किसी को नहीं है। बहरहाल इन बंदियों ने जेल रेडियो में अपना आसरा ढूंढ लिया है। उनके पास अपना रेडियो होगा, तो अपनी उम्मीदें भी होंगी।

जेलों में इंद्रधनुष बनाने की एक तिनका कोशिश भर ने संभावनाओं के कई पिटारे खोल दिए हैं। कौन जानता है ये 21 बंदी कभी जेल की बजाय अपनी आवाज से ही पहचाने जाने लगें। क्या पता उजली नीयत से उपजा जेल का यह जादुई रेडियो शायद खुशी की किसी बंद गुफा की चाबी समेटे हो।


(वर्तिका नंदा जेल सुधारक हैं और तिनका तिनका की संस्थापक। यह भारत भर की जेलों को आपस में जोड़ता अभियान है। तिनका तिनका तिहाड़, डासना और तिनका तिनका मध्यप्रदेश चर्चित किताबें। फिलहाल जेलों में रेडियो स्थापित करने में जुटी हैं। आगरा के बाद अब हरियाणा की जेलों में तिनका रेडियो लाने में प्रमुख भूमिका में हैं।)

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