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राहुल के फैसलों पर उठ रहे सवाल, क्या होगा पंजाब और यूपी में कांग्रेस का हाल?
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Fri, 20 May 2016 01:03 PM IST
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- फोटो : अमर उजाला
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2014 और 2016 दोनों में महीना मई का ही था जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की सीटों का आंकड़ा 50 से कम गया। बृहस्पतिवार को चार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश के चुनाव परिणाम आए और कांग्रेस ने 2 और राज्य खो दिए। इन चुनाव परिणामों के बाद कांग्रेस पार्टी लाइन में अगर किसी पर उंगलियां उठ रही हैं तो वो हैं उपाध्यक्ष राहुल गांधी। चुनावों में मिल रही लगातार हार के बाद राहुल की क्षमता और कार्यशैली पर भी प्रश्नचिन्ह लगाए जाने लगे हैं।
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कांग्रेस की हालत फिलहाल यह है कि इन चुनावों के बाद कांग्रेस के कुल विधायकों की संख्या जो 163 थी वो अब 115 ही रह गई। 30 सीटों वाली पुडुचेरी में मिली जीत के अलावा कांग्रेस के लिए कोई राहत की खबर नहीं है। देश के 29 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों में से केवल 6 राज्य जिनमें उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, मणिपुर, मेघालय और मिजोरम शामिल हैं केवल यहीं कांग्रेस की सरकार बची है। बीते साल नवंबर में आए बिहार के नतीजों को छोड़ दें तो ऐसा कोई चुनाव नहीं संपन्न हुआ जिसमें राहुल की भूमिका पर सवाल न खड़े किए गए हों। हालांकि कि पार्टी में राहुल की कार्यशैली से प्रभावित उनके प्रशंसक यह बात कहते रहते हैं कि उन्हें पार्टी का अध्यक्ष बना दिया जाना चाहिए।
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इन चुनाव परिणामों के बाद कांग्रेस के हाथ से केरल और असम निकल गए। अगर बात केरल की करें तो यहां कांग्रेस गठबंधन को भ्रष्टाचार के आरोपों की कीमत चुकानी पड़ी। सोलर पैनल में घोटाले के आरोप चुनाव में खूब गूंजे थे। हालांकि ओमन चांडी ने इसे साजिश बताते हुए आरोपों को नकार रहे थे लेकिन जनता ने उन्हें ही नकार दिया। भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद कांग्रेस की रही सही कसर बुजुर्ग नेता अच्युतानंदन के नेतृत्व में लेफ्ट फ्रंट जीत ने निकाल दी। असम में कांग्रेस को हार उसकी वजह से मिली। परिणाम आने के बाद तो यह बाते भी सामने आने लगी कि जब पार्टी के पूर्व नेता हिमंत विश्वशर्मा राहुल गांधी से बात करने गए और उन्हें बताया कि अगले चुनावों में पार्टी 25 सीटों से ज्यादा नहीं जीत पाएगी तो उस पर राहुल का जवाब था 'सो वाट (so what)' और फिर वो अपने कुत्ते को खिलाने लगे। बता दें कि हिमंत विश्वशर्मा बीते साल गोगोई सरकार में नंबर दो की हैसियत रखते थे लेकिन वो नौ विधायकों साथ भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए और इस बात का काफी असर दिखा।
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कांग्रेस और उसकी लगातार हो रही हार के बारे में हकीकत यही है कि राहुल गांधी के फैसलों से उसे नुकसान ही हो रहा है। चाहे बंगाल में लेफ्ट में गठबंधन का फैसला हो या फिर तमिलनाडु में डीएमके के साथ चुनाव लड़ना। इन फैसलों से कांग्रेस को खासा नुकसान हुआ। असम में 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस की सीटें 14 से घट कर 7 हो गई और इसके बाद भी राहुल गांधी ने तरुण गोगोई को ही नेतृत्व देने का फैसला किया, हालांकि पार्टी के अंदर से हिमंत विश्वशर्मा को अगला सीएम कैंडिडेट बनाने की बात आ रही थी लेकिन उस पर कांग्रेस हाईकमान ने ध्यान नहीं दिया जिसका परिणाम उसे भुगतना पड़ रहा है।
अगर राहुल गांधी के फैसले इसी तरह से गलत साबित होते रहे तो वो दिन दूर नहीं होंगे जब कांग्रेस 6 से शून्य पर न सिमट जाए। बता दें कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की डूबती नइया को संभाालने के लिए लाए गए प्रशांत किशोर के बारे में भी यह बात जगजाहिर है कि पार्टी कार्यकर्ता नहीं चाहते थे कि किशोर आएं लेकिन फिर भी हाईकमान की ओर से कार्यकर्ताओं को यह समझाबुझाकर फैसला थोपा गया कि वे पार्टी संगठन से जुड़े हुए फैसले नहीं लेंगे। पंजाब में भी कैप्टन अमरिंदर सिंह कई बार पार्टी हाईकमान के खिलाफ अपनी शिकायत दर्ज करा चुके हैं।
बात अन्य दलों के नेताओं की करें तो बावजूद राहुल गांधी के उपाध्यक्ष रहने के भी वे सोनिया गांधी को ही तरजीह देते हैं। पार्टी के ही लोग चाहते हैं कि जब तक राहुल पूर्णतया परिपक्व न हो जाएं तब तक उन्हें अध्यक्ष बनाने के फैसले से बचा जाए। इन चुनाव परिणामों के बाद कांग्रेस के सामने यह बड़ा प्रश्न होगा कि आगामी उत्तर प्रदेश और पंजाब के विधासभा चुनाव में पार्टी की रणनीति क्या होगी? उत्तर प्रदेश के संबंध में सवाल और भी जटिल हो जाने की संभावना है क्योंकि यहां कई कांग्रेस काडर के लोग नहीं चाहते कि राहुल विधानसभा चुनाव के दौरान राज्य में पार्टी का चेहरा बनें।