अपराधी पहचान बिल पर मचा है बवाल: नए कानून के दुरुपयोग को लेकर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
कानून विशेषज्ञों का कहना है कि फिंगर प्रिंट जैसे मामले 80 फीसदी मामलों में मदद नहीं कर पाते। हर 10 हजार व्यक्ति में फिंगर प्रिंट के दूसरे से मैच होने की आशंका रहती है, जबकि डीएनए पूरा प्रमाण होता है जिसका किसी दूसरे से मिलान होने और गलत व्यक्ति के पहचान होने की कोई आशंका नहीं रहती, लिहाजा कानून विशेषज्ञ इस बदलाव को बेहद आवश्यक बता रहे हैं...
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अपराधियों की पहचान के लिए अंग्रेजों के समय 1920 में बने कानून ‘आइडेंटिफिकेशन ऑफ प्रिजनर्स एक्ट’ का स्थान लेने के लिए ‘क्रिमिनल प्रोसिजर आइडेंटिफिकेशन बिल 2022’ लोकसभा से पास हो चुका है। बिल में प्रावधान है कि मजिस्ट्रेट के आदेश पर हेड कांस्टेबल स्तर का अधिकारी अपराधियों या संदेहास्पद व्यक्तियों के बायोलॉजिकल नमूने एकत्र कर सकेगा। इसमें फिंगर प्रिंट के साथ-साथ अपराधी की फोटो, आंखों के रेटिना की बनावट, खून-पेशाब, आदत-व्यवहार का रिकॉर्ड रखना और डीएनए का नमूना लेना शामिल है। केंद्र ने इस कानून को नए जमाने में अपराधियों को पकड़ने के लिए समय की मांग बताया है, तो विपक्ष ने इसके दुरुपयोग की आशंका जताते हुए बिल का कड़ा विरोध किया है।
बसपा सांसद दानिश अली ने इस बिल का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि यह कानून बनने के बाद भारत जैसा लोकतांत्रिक देश पुलिस स्टेट बन जाएगा। जिसमें सरकार पुलिस के माध्यम से हर व्यक्ति की निजता पर नजर रखेगी। उन्होंने आशंका जताई है कि इस कानून के बनने के बाद कभी भी किसी भी निर्दोष को फर्जी मुकदमों में फंसाया जा सकेगा। अब तक अनेक नौजवानों को बिना किसी गुनाह के केवल शक के आधार पर विभिन्न केसों में फंसाया जाता रहा है, लेकिन नए कानून बनने के बाद उनके खिलाफ सबूत भी बनाया जा सकेगा जिससे उनका छूट पाना मुश्किल हो जाएगा।
आशंका है कि इस कानून के बनने के बाद राजनीतिक विरोधियों या वैचारिक मतभेद रखने वाले लोगों के खिलाफ सबूत भी गढ़े जा सकेंगे। इससे उनको कानूनी पचड़ों में फंसाने को कानूनी जामा पहनाया जा सकेगा। लेकिन क्या विपक्ष की यह आशंका सही है? क्या केवल दुरुपयोग की आशंका से किसी कानूनी सुधार को हमेशा के लिए रोका जा सकता है? सरकार को विपक्ष की चिंताओं को दूर करने के लिए कानून में क्या उपाय किए जा सकते हैं?
सबूतों के अभाव में छूट रहे हैं अपराधी
साइबर लॉ एक्सपर्ट ऐडवोकेट विराग गुप्ता ने अमर उजाला को बताया कि किसी भी कानून के दुरुपयोग की आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता, लेकिन केवल इस आशंका से नए कानून के आने में अड़ंगा लगाया जाना भी किसी भी तरह सही नहीं है। आज बदलती तकनीक के कारण अपराध और अपराधियों की प्रकृति में बहुत बड़ा बदलाव आ चुका है। आज हत्या और दुष्कर्म के लगभग आधे मामलों में अपराधी सबूतों के अभाव के कारण छूट जाते हैं। ऐसे में उन्हें पकड़ने के लिए उपयुक्त नवीनतम तकनीक का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इसके लिए नया कानून बेहद आवश्यक है।
बताया जा रहा है कि इस कानून का सबसे नकारात्मक पहलू यह है कि पुलिस किसी को केवल आशंका के आधार पर भी हिरासत में ले सकती है, और उसके बायोलॉजिकल नमूने एकत्र कर सकती है। लेकिन इसे यह कहकर खारिज किया जा रहा है कि चूंकि बायोलॉजिकल नमूने केवल मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद ही लिए जा सकेंगे, लिहाजा इसका दुरुपयोग नहीं हो सकता।
कानून विशेषज्ञों का कहना है कि फिंगर प्रिंट जैसे मामले 80 फीसदी मामलों में मदद नहीं कर पाते। हर 10 हजार व्यक्ति में फिंगर प्रिंट के दूसरे से मैच होने की आशंका रहती है, जबकि डीएनए पूरा प्रमाण होता है जिसका किसी दूसरे से मिलान होने और गलत व्यक्ति के पहचान होने की कोई आशंका नहीं रहती, लिहाजा कानून विशेषज्ञ इस बदलाव को बेहद आवश्यक बता रहे हैं।
केंद्र सरकार के पास लगभग 10 लाख अपराधियों का और राज्य सरकारों के पास लगभग 30 लाख अपराधियों का फिंगर प्रिंट उपलब्ध है। लेकिन इससे अपराधियों को पहचानना और अपराध रोकना मुश्किल हो रहा है, लिहाजा कानून में बदलाव किए जाने की मांग की जा रही है।
इस तरह के नमूने लेने और उसे रखने में एक बड़ा पहलू इस पर आने वाला भारी खर्च भी है। ध्यान देने की बात है कि अब तक देश के लगभग 40 फीसदी थानों में कंप्यूटर और अन्य आवश्यक सेवाएं नहीं होतीं। 28 फीसदी मामलों में एफआईआर दर्ज करने से लेकर अन्य खर्च के लिए स्टेशनरी तक के खर्च पुलिस वालों को अपनी जेब से खर्च करने पड़ते हैं। वहां रक्त-डीएनए, रेटिना की फोटो लेने जैसे कार्यों का भारी खर्च कौन उठाएगा। इस तरह का कानून जमीन पर किस तरह से लागू किया जा सकेगा।
75 साल तक कैसे सुरक्षित रहेंगे नमूने?
दूसरी बड़ी आशंका यह है कि नमूनों को 75 वर्ष के लिए एनसीआरबी के पास सुरक्षित रखा जाएगा। यानी जांच के नमूने लेने से लेकर इसे सुरक्षित रखने तक पूरी जिम्मेदारी सरकार के पास रहेगी। इससे सरकार के द्वारा इन नमूनों के दुरुपयोग की आशंका बरकरार रहेगी। विशेषज्ञों की राय है कि एक स्वतंत्र निकाय के अंदर इन नमूनों को सुरक्षित रखा जाए और केवल अदालती आदेशों के बाद ही उनका उपयोग सुनिश्चित किया जा सके तो इसके दुरुपयोग की आशंका को कम किया जा सकेगा।
आज जहां थोड़ी सी सूचना के आधार पर लोगों के बैंक अकाउंट खाली कर दिए जा रहे हैं, लोगों की पूरी जिंदगी की कमाई दांव पर लग जा रही है, वहां केवल अपराध रोकने के नाम पर एक बड़ी आबादी का बायोलॉजिकल डाटा सुरक्षित रखना बहुत सही नहीं कहा जा सकता। ध्यान रखना होगा कि हमारा संविधान अपराधियों के अधिकारों का भी संरक्षण करता है। ऐसे में इसका दुरुपयोग हर हाल में रोकना आवश्यक होगा।