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Farming: जलवायु परिवर्तन से बचकर कैसे बढ़ती आबादी की भूख मिटा सकते हैं किसान, कृषि वैज्ञानिक ने बताए तरीके

Fri, 12 Jan 2024 10:22 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Fri, 12 Jan 2024 10:22 PM IST
सार

जैसे-जैसे देश में जनसंख्या बढ़ रही है, वैसे वैसे खाद्यान्न की जरूरतें भी बढ़ रही हैं। हमने इस लक्ष्य को अच्छी पैदावार के जरिए पाने का प्रयास किया है। इसके लिए तमाम खाद्यान्नों, फलों, सब्जियों आदि की अच्छी किस्में विकसित करके इस लक्ष्य को पाने का प्रयास हो रहा है।

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Protecting crops from climate change and eradicating hunger is the first priority: Dr. Gyanendra Pratap Singh
फसल - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

खेती-खलिहानी और किसानी के क्षेत्र में सबसे बड़ा खतरा जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निबटने का है। राष्ट्रीय पादप अनुवांशिक संसाधन ब्यूरो (एनबीपीजीआर) के निदेशक डा. ज्ञानेन्द्र प्रताप सिंह के अनुसार आने वाले समय में इन चुनौतियों के बढ़ने का खतरा है। इसे ध्यान में रखकर देश की खाद्यान्नों की पैदावार बढ़ाना तथा फसलों को जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से बचाना ही मुख्य लक्ष्य है। ताकि कृषि प्रधान देश अपनी खाद्यान्न जरूरतों में आत्म निर्भरता की तरफ बढ़ता रहे। लोगों की खाद्य सुरक्षा की जिम्मेदारी पूरी की जा सके।
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डा. ज्ञानेन्द्र एक उम्दा वैज्ञानिक हैं। सिंह को व्हीट ब्रीडर के रूप में जाना जाता है। वह कहते हैं कि जैसे-जैसे देश में जनसंख्या बढ़ रही है, वैसे वैसे खाद्यान्न की जरूरतें भी बढ़ रही हैं। हमने इस लक्ष्य को अच्छी पैदावार के जरिए पाने का प्रयास किया है। इसके लिए तमाम खाद्यान्नों, फलों, सब्जियों आदि की अच्छी किस्में विकसित करके इस लक्ष्य को पाने का प्रयास हो रहा है। वह कहते हैं कि इसके साथ-साथ जलवायु में परिवर्तन की संभावना कृषि क्षेत्र के लिए डरावने सपने दिखाने की गति से बढ़ रही है। 
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अमर उजाला से बातचीत के दौरान कहते हैं कि चुनौती मुश्किल जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। हम अपनी पैदावार बढ़ाकर आने वाले समय में खाद्य सुरक्षा की जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। इस दिशा में हमारे तमाम वैज्ञानिक शोध, अनुसंधान में लगे हैं। डा. ज्ञानेन्द्र प्रताप सिंह को देश में व्हीट मैन के तौर पर जाना जाता है। गेंहू और जौ के क्षेत्र में उनका योगदान उल्लेखनीय है। गेहूं की 60 किस्म, जौ की तीन किस्म, आलू की एक किस्म के विकास में डा. ज्ञानेन्द्र की प्रमुख भूमिका रही है। इनमें से 35 किस्में पिछले दस सालों से किसानों, कृषि उद्योगों और उपभोक्ताओं के बीच में अपनी जगह बनाए हैं। 
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गेंहू की एचडी2967, एचडी3086, डीबीडब्ल्यू187,डीबीडब्ल्यू222 और डीबीडब्ल्यू173 को गेहूं उत्पादक किसानों ने काफी पसंद किया है। वह इन बीजों के जरिए अच्छी पैदावार प्राप्त कर रहे हैं। इन किस्मों का विकास भी जनन द्रव्य के माध्यम से ही विकसित किया गया है। खास बात यह है कि गेहूं की ये किस्में भारतीय भौगोलिक परिस्थिति के अनुकूल हैं।

हमारे पास किस्मों की कमी नहीं है
डा. सिंह का कहना है कि जननद्रव्य संरक्षण (राष्ट्रीय जीन बैंक)के मामले में विश्व में भारत का स्थान दूसरा है। यह जीन बैंक हमारी सबसे बड़ी ताकत है। इसके माध्यम से विभिन्न किस्म के खाद्यान्न, फल, फूल, सब्जी आदि की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की जा सकती है। वह कहते हैं कि हमारे पास खाद्यान्नों की अच्छी किस्में हैं। डा. सिंह स्वयं में एक अच्छे अनुसंधानकर्ता हैं। वह कहते हैं कि देश में गेंहू, जौ समेत तमाम खाद्यान्नों आदि के बीज हैं। उत्पादक सही बीज का चयन करके अपनी फसल को अचानक तापमान में होने वाले उतार चढ़ाव या मौसमी खतरों से बचा सकते हैं। वास्तविकता तो यह है कि अभी हम इस क्षेत्र में अपनी प्रचुर क्षमता का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। 


भविष्य की चुनौतियों के बारे में पूछने पर वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक का कहना है कि चुनौतियों की कमी नहीं है। हमारे सामने पैदावार को लगातार बढ़ाते रहने, फसल को तमाम तरह की मौसम और बे मौसम की मार से बचाने, तापमान आदि को झेलने में संक्षम उन्नत बीजों के प्रचार-प्रसार की बड़ी चुनौती है। विश्व में जलवायु परिवर्तन सबसे ज्वलंत मुद्दा बनकर उभरा है। इस जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव से खेती-बाड़ी को बचाना प्रमुख लक्ष्य है।
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