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कांग्रेस पार्टी की मुसीबतों का पहाड़ तो अभी बस प्रियंका गांधी ढो रही हैं

शशिधर पाठक, नई दिल्ली Published by: अमर शर्मा Updated Fri, 30 Aug 2019 10:47 PM IST
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प्रियंका गांधी वाड्रा
प्रियंका गांधी वाड्रा - फोटो : amar ujala

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कांग्रेस पार्टी की चुनौतियां काफी भारी भरकम हो गई हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी चिकित्सकों की सलाह के अनुसार काम कर रही हैं। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी लगातार सत्ताधारी दल भाजपा के निशाने पर हैं। कांग्रेस के महासचिव और दिल्ली के प्रभारी पीसी चाको खामोश चल रहे हैं। हरियाणा के प्रभारी, वरिष्ठ कांग्रेस महासचिव गुलाम नबी आजाद जम्मू-कश्मीर मामले तक सीमित हैं। अकेले केवल कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा भर हैं जो मुख्य विपक्षी दल के नेता की भूमिका निभा रही हैं। इसमें भी प्रियंका उत्तर प्रदेश (उ.प्र.) के राजनीतिक हालात को लेकर लड़ाई लड रही हैं। उनके कंधों पर उ.प्र. में कांग्रेस की जड़ों को हरा-भरा बनाने का भार जो है। आखिर यह कांग्रेस को क्या हो गया है?
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क्या राजनीति को लकवा मार गया?

पार्टी के एक पूर्व महासचिव इससे काफी खिन्न हैं। वह ऑन द रिकार्ड कुछ बोलना भी नहीं चाहते। सूत्र का कहना है कि मुंह खोलना बड़ा गुनाह हो जाता है, लेकिन ऐसा दौर आया है कि जैसे राजनीति को ही लकवा मार गया हो। सूत्र का कहना है कि हरियाणा में विधानसभा चुनाव होना है। अब वहां राजनीतिक तैयारी के लिए समय भी नहीं बचा है। कांग्रेस के नेता आपस में लट्ठ चला रहे हैं। दिल्ली में अगले साल चुनाव होना है। शीला जी के आकस्मिक निधन के बाद कांग्रेस का सारा अभियान ठप सा हो गया है। उ.प्र. में कांग्रेस का संगठन नहीं है, वहां काफी समय से प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति लंबित है। मध्य प्रदेश (म.प्र.) में कांग्रेस अध्यक्ष और प्रदेश के पदाधिकारियों की नियुक्ति होनी है और राज्य के मुख्यमंत्री तथा नेताओं का खेमा आपसी खेमेबाजी में व्यस्त है। झारखंड, बिहार विधानसभा में भी चुनाव होने हैं, लेकिन अजीब सी शिथिलता बनी हुई है। 

बस एक प्रियंका मेहनत कर रही हैं

पार्टी के एक और वरिष्ठ नेता का दर्द सुन लीजिए। सूत्र का कहना है कि उन्होंने सोनिया गांधी को पत्र लिखा है। वह अनुशासित नेता हैं, इसलिए पत्र के बारे में कुछ नहीं कहना चाहते, लेकिन वह दु:खी हैं। क्योंकि उनकी 70 साल के करीब होने जा रही उम्र और 45 साल के राजनीतिक जीवन में उन्होंने इतनी हताशा जैसी स्थिति नहीं देखी। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष दो महीने तक इस्तीफा देकर खामोश बैठे रहे तो पार्टी के वरिष्ठ नेता अब यह नहीं तय पा रहे हैं कि उन्हें सत्ताधारी दल और सरकार के कामकाज, उसके तौर तरीके का विरोध करना है या प्रशंसा। पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश, शशि थरुर जैसे नेता अच्छे कामकाज की प्रशंसा कर रहे हैं तो पार्टी का एक धड़ा अपने ही नेता के प्रयास में टोका-टाकी में उलझा है। 

पार्टी के एक नेता एआईसीसी के मंच से यह बताने में व्यस्त हैं कि एक विपक्षी पार्टी का काम क्या है? पार्टी के पूर्व महासचिव और उपरोक्त वरिष्ठ नेता दोनों का कहना है कि कांग्रेस पार्टी में नेताओं की कमी नहीं है। भले ही कुछ नेताओं ने महासचिव या अपने पदों से इस्तीफा दे दिया हो, लेकिन उन्होंने राजनीति को अलविदा नहीं कहा है। फिर भी सब पदाधिकारी या तो खामोश हैं या उन्हें क्या करना है, समझ में नहीं आ रहा है। केवल प्रियंका गांधी वाड्रा के ट्वीट, उनके उ.प्र. के दौरे के सहारे कांग्रेस चल रही है। पार्टी का मीडिया विभाग भी इन दिनों प्रियंका गांधी के ट्वीट को पार्टी के व्हाट्सएप ग्रुप में साझा करने में व्यस्त है।

चिदंबरम होते तो आर्थिक नीतियों की बघिया उधेड़ते

कांग्रेस के हाशिए पर चल रहे कुछ नेताओं को इस समय सीबीआई की हिरासत में चल रहे पी चिदंबरम की याद आ रही है। एक युवा नेता हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय की राजनीति की है, कांग्रेस के पूर्व विधायक हैं। पिछले दो चुनाव में हारने के बाद इन दिनों बस कांग्रेस मुख्यालय आ जा रहे हैं। उनका कहना है कि पी चिदंबरम हिरासत में नहीं होते तो मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों को आईना दिखाते। सूत्र का कहना है कि केंद्रीय वित्त मंत्री ने प्रेसवार्ता की थी। रिजर्व बैंक ने 1.76 लाख करोड़ रुपये केंद्र सरकार को दिए। दो दिन शेयर बजार सकारात्मक रहा, लेकिन पिछले तीन दिन में उससे बड़ी गिरावट हुई है। सोना 40 हजार रुपये प्रति 10 ग्राम हो गया। कोई आर्थिक सूचकांक अच्छी खबर नहीं दे रहा है, लेकिन कांग्रेस पार्टी में कोई सरकार की नीतियों पर बोलने वाला नहीं है।

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