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राष्ट्रपति कोविंद बोले: रामानुजाचार्य जैसे संतों ने सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित देश की अवधारणा का निर्माण किया

Sun, 13 Feb 2022 08:15 PM IST
गौरव पाण्डेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हैदराबाद
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हैदराबाद Published by: गौरव पाण्डेय Updated Sun, 13 Feb 2022 08:15 PM IST
सार

देश में इस समय 11वीं शताब्दी के संत रामानुजाचार्य की 1000वीं जयंती के अवसर पर 12 दिवसीय रामानुज सहस्त्राब्दि समारोहम का आयोजन किया जा रहा है।

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President Ram Nath Kovind says saints like Ramanujacharya built the concept of nation based on cultural values in Hyderabad
रामानुज सहस्त्राब्दि समारोहम में राष्ट्रपति कोविंद - फोटो : twitter/rashtrapatibhvn

विस्तार

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने रविवार को कहा कि रामानुजाचार्य जैसे संतों, कवियों और दार्शनिकों ने देश की सांस्कृतिक पहचान, निरंतरता और एकता का निर्माण किया है और उसे पोषित किया है। उन्होंने हैदराबाद में 11वीं सदी के संत रामानुजाचार्य की सहस्त्राब्दि जयंती समारोह में शामिल होने के बाद एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि संतों, कवियों और दार्शनिकों ने सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित राष्ट्र की अवधारणा का निर्माण किया है।

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उन्होंने कहा, 'संस्कृति आधारित राष्ट्र की यह अवधारणा उससे अलग है जिस तरह इसे पश्चिमी विचारधारा में वर्णित किया गया है। सदियों पहले भारत को एक धागे से एकजुट करने वाली भक्ति परंपरा का उल्लेख पुराणों में मिलता है। इस परंपरा को रामानुजाचार्य से प्रेरित भक्ति संप्रदायों के रूप में देखा जा सकता है, जो तमिलनाडु के श्रीरंगम और कांचीपुरम से लेकर उत्तर प्रदेश के वाराणसी तक फैले हुए थे। भारतीयों की भावनात्मक एकता सदियों पुरानी है।'
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'भारत के दर्शन और पश्चिम के दर्शन में बहुत अंतर है'
राष्ट्रपति ने कहा कि रामानुजाचार्य का 'विशिष्टाद्वैत' न केवल दर्शन के क्षेत्र में एक विलक्षण योगदान है बल्कि दैनिक जीवन में दर्शन की प्रासंगिकता को भी दर्शाता है। उन्होंने कहा, पश्चिम में जिसे दर्शन कहा जाता है वह अब केवल पढ़ाई के एक विषय तक सीमित रह गया है। लेकिन हम जिसे दर्शन कहते हैं वह केवल एक विश्लेषण नहीं है, यह दुनिया की ओर देखने का तरीका है, जीवन का तरीका है। दार्शनिक-संतों की बदौलत भारत में यह हमेशा सच रहा है।
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'समानता की हमारी अवधारणा पश्चिम से नहीं आई है'
राष्ट्रपति ने आगे कहा कि सामाजिक न्याय के लिए आवाज उठाने वाले बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर ने साफ तौर पर कहा था कि देश के आधुनिक गणराज्य के मौलिक संवैधानिक आदर्श भारत की सांस्कृतिक विरासत पर आधारित हैं। उन्होंने कहा, इस तरह स्पष्ट होता है कि समानता की हमारी अवधारणा पश्चिमी देशों से नहीं ली गई है। यह भारत की सांस्कृतिक भूमि में विकसित हुई है। वसुधैव कुटुंबकम की हमारी शाश्वत दृष्टि समानता पर ही आधारित है।

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