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बंगाल में कोविंद की जीत की खुशी पर भारी है प्रणब मुखर्जी की विदाई का गम
रीता तिवारी/कोलकाता
Updated Thu, 20 Jul 2017 07:22 PM IST
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pranab mukherjee
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नए राष्ट्रपति की जीत की खुशी पर पुराने राष्ट्रपति की विदाई का गम भारी पड़ रहा है। कम से कम पश्चिम बंगाल में तो तस्वीर ऐसी ही है। रामनाथ कोविंद की जीत तो पहले से ही तय थी। यहां लोगों को देश के पहले और संभवत: आखिरी राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की विदाई का गम ज्यादा सता रहा है।
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यहां तृणमूल कांग्रेस के अलावा वामपंथी दलों और कांग्रेस ने कोविंद की बजाय विपक्ष की साझा उम्मीदवार मीरा कुमार के पक्ष में मतदान किया था। वैसे, क्रास वोटिंग के चलते कोविंद को यहां पांच अतिरिक्त वोट मिल गए। राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से उनको यहां भाजपा और उसकी सहयोगी गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के तीन-तीन यानी कुल छह विधायकों के ही वोट मिलने थे। लेकिन उनको यहां 11 विधायकों के वोट मिले हैं। इसी तरह विपक्ष की साझा उम्मीदवार मीरा कुमार के पक्ष में पडे़ 10 वोट खारिज हो गए थे।
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मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तो कोविंद की उम्मीदवारी के एलान के वक्त ही सवाल किया था कि वे कौन हैं? ममता ने कहा था कि वे कोविंद को जानती-पहचानती ही नहीं हैं। उन्होंने सवाल किया कि भाजपा को क्या इस पद के लिए कोई और उम्मीदवार नहीं मिला था।
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ममता ने कहा था कि प्रणब दा, लाल कृष्ण आडवाणी या सुषमा स्वराज में से किसी को भी राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया जा सकता था। प्रणब मुखर्जी के गृह जिले मुर्शिदाबाद में उनका कार्यकाल खत्म होने की वजह से आम लोगों में मायूसी है। लोगों का कहना है कि प्रणब दा देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचने वाले पहले और शायद आखिरी व्यक्ति थे।
राष्ट्रपति भवन में रहने के बावजूद प्रणब मुखर्जी हर साल दुर्गा पूजा के दौरान अपनी पारिवारिक पूजा में यहां आते थे और बाकायदा पूजा-पाठ करते थे। सुरक्षा का ज्यादा ताम-झाम नहीं होने की वजह से उस समय इलाके का कोई भी व्यक्ति उनसे आसानी से मिल सकता था। जहां तक कोविंद का सवाल है उन्होंने कभी राज्य का दौरा नहीं किया है। यही वजह है कि यहां राजनीतिक हलकों में उनको पहचानने वाले कम ही हैं। राज्य के आम लोगों ने तो शायद पहली बार राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने पर ही कोविंद का नाम सुना था।