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महागठबंधन पर माकपा- करात -येचुरी की अपनी वजहें हैं कांग्रेस से दूरी
शरद गुप्ता, नई दिल्ली
Updated Fri, 14 Sep 2018 06:22 AM IST
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Sitaram Yechuri, CPM
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मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) अजीब पशोपेश में है। वह बिहार और तमिलनाडु में तो कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ना चाहती है, लेकिन राजस्थान और पश्चिम बंगाल में नहीं। वह तेलंगाना में भी कांग्रेस, टीडीपी और टीजेएस द्वारा बनाए महागठबंधन में शामिल नहीं हुई है।
कांग्रेस के साथ माकपा का यह प्यार और नफरत का रिश्ता दरअसल उसकी अंदरूनी राजनीति की वजह से है। जहां पार्टी महासचिव सीताराम येचुरी माकपा को विपक्षी गठबंधन का हिस्सा बनाना चाहते हैं, वहीं उनके पूर्ववर्ती प्रकाश करात कांग्रेस से किसी भी तरह का रिश्ता रखने के खिलाफ हैं। वर्ष्ज्ञ 2008 में करात के नेतृत्व में ही माकपा ने अमेरिका के साथ सिविल न्यूक्लियर डील पर मतभेद के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाली तत्कालीन यूपीए सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। इसके बाद माकपा ने मायावती के नेतृत्व में वैकल्पिक सरकार बनाने की कोशिश भी की थी। वर्तमान में भी माकपा की सर्वोच्च नीति निर्धारक संस्था ‘केंद्रीय समिति’ में करात समर्थकों का बहुमत है, इसीलिए येचुरी कांग्रेस से रिश्ते सुधारने के लिए कुछ नहीं कर पा रहे हैं।
बिहार-तमिलनाडु के लिए ये है तर्क
माकपा का मानना है कि तमिलनाडु में वह डीएमके के साथ गठबंधन करेगी, जिसमें कांग्रेस एक जूनियर पार्टनर हो सकती है। इसी तरह बिहार में भी उसका समझौता राजद से होगा न कि कांग्रेस से। वहां माकपा, सीपीआई और सीपीआई (एमएल) को समझौते में एक-एक सीट मिलने की आशा है, हालांकि सीपीआई ने बेगूसराय और बांका की दो सीटें मांगी हैं।
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तेलंगाना, राजस्थान व बंगाल में ये दिक्कत
राजस्थान, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ही मुख्य विपक्षी पार्टी है, इसलिए माकपा उससे तालमेल करने के बजाए तीसरे मोर्चे की भूमिका में रहना चाहती है। राजस्थान में चार बार सीपीएम विधायक रहे अमारा राम के लिए कांग्रेस एक सीट छोड़ने को तैयार है, लेकिन माकपा बात ही नहीं कर रही है। इसी तरह तेलंगाना में माकपा को महागठबंधन में शामिल होने के लिए सीपीआई के महासचिव सुधाकर रेड्डी ने येचुरी को पत्र लिखकर आमंत्रित किया है, लेकिन अभी तक उन्हें कोई उत्तर नहीं मिला।
बंगाल में पहले था अघोषित समझौता
मजे की बात है कि बंगाल के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और माकपा ने सीटों का अघोषित बंटवारा किया था। पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने एक जनसभा में राहुल गांधी के साथ मंच भी साझा किया था। लेकिन औपचारिक गठबंधन की घोषणा नहीं की थी। इसके बावजूद माकपा ने इस चुनाव में अब तक का अपना सबसे खराब प्रदर्शन किया था।
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कांग्रेस के साथ माकपा का यह प्यार और नफरत का रिश्ता दरअसल उसकी अंदरूनी राजनीति की वजह से है। जहां पार्टी महासचिव सीताराम येचुरी माकपा को विपक्षी गठबंधन का हिस्सा बनाना चाहते हैं, वहीं उनके पूर्ववर्ती प्रकाश करात कांग्रेस से किसी भी तरह का रिश्ता रखने के खिलाफ हैं। वर्ष्ज्ञ 2008 में करात के नेतृत्व में ही माकपा ने अमेरिका के साथ सिविल न्यूक्लियर डील पर मतभेद के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाली तत्कालीन यूपीए सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। इसके बाद माकपा ने मायावती के नेतृत्व में वैकल्पिक सरकार बनाने की कोशिश भी की थी। वर्तमान में भी माकपा की सर्वोच्च नीति निर्धारक संस्था ‘केंद्रीय समिति’ में करात समर्थकों का बहुमत है, इसीलिए येचुरी कांग्रेस से रिश्ते सुधारने के लिए कुछ नहीं कर पा रहे हैं।
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बिहार-तमिलनाडु के लिए ये है तर्क
माकपा का मानना है कि तमिलनाडु में वह डीएमके के साथ गठबंधन करेगी, जिसमें कांग्रेस एक जूनियर पार्टनर हो सकती है। इसी तरह बिहार में भी उसका समझौता राजद से होगा न कि कांग्रेस से। वहां माकपा, सीपीआई और सीपीआई (एमएल) को समझौते में एक-एक सीट मिलने की आशा है, हालांकि सीपीआई ने बेगूसराय और बांका की दो सीटें मांगी हैं।
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तेलंगाना, राजस्थान व बंगाल में ये दिक्कत
राजस्थान, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ही मुख्य विपक्षी पार्टी है, इसलिए माकपा उससे तालमेल करने के बजाए तीसरे मोर्चे की भूमिका में रहना चाहती है। राजस्थान में चार बार सीपीएम विधायक रहे अमारा राम के लिए कांग्रेस एक सीट छोड़ने को तैयार है, लेकिन माकपा बात ही नहीं कर रही है। इसी तरह तेलंगाना में माकपा को महागठबंधन में शामिल होने के लिए सीपीआई के महासचिव सुधाकर रेड्डी ने येचुरी को पत्र लिखकर आमंत्रित किया है, लेकिन अभी तक उन्हें कोई उत्तर नहीं मिला।
बंगाल में पहले था अघोषित समझौता
मजे की बात है कि बंगाल के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और माकपा ने सीटों का अघोषित बंटवारा किया था। पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने एक जनसभा में राहुल गांधी के साथ मंच भी साझा किया था। लेकिन औपचारिक गठबंधन की घोषणा नहीं की थी। इसके बावजूद माकपा ने इस चुनाव में अब तक का अपना सबसे खराब प्रदर्शन किया था।