सियासी बिसात: जाति की राजनीति में जुटीं भाजपा-टीएमसी, जानें कितना कारगर 'ओबीसी कार्ड'
पहले धर्म और अब जाति...पश्चिम बंगाल की राजनीति इस बार ऐसे-ऐसे रंग दिखा रही है, जो राज्य के इतिहास में इससे पहले नजर नहीं आए। दरअसल, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने अपने एकदिवसीय पश्चिम बंगाल के दौरे पर महिष्य और तेली जाति को ओबीसी लिस्ट में शामिल करने का वादा किया तो सियासत की नई बिसात बिछ गई। वहीं, तृणमूल कांग्रेस भी हिंदू ओबीसी जातियों पर फोकस बढ़ा रही हैं। इस रिपोर्ट में हम समझते हैं पश्चिम बंगाल की सियासी बिसात को और जानते हैं कि कितना कारगर साबित होगा 'ओबीसी कार्ड'?
पिछड़ों के दम पर आगे निकलने की कोशिश?
गौर करने वाली बात यह है कि बंगाल की राजनीति में 2020 से पहले पिछड़ों के लिए कोई जगह तक नहीं थी, लेकिन 2021 विधानसभा चुनाव आते-आते यही पिछड़े अब राजनीतिक पार्टियों के आगे निकलने का रास्ता बनते जा रहे हैं। दरअसल, राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कोतुलपुर में पिछड़े वर्ग की जातियों को लुभाने के लिए नया दांव खेला। उन्होंने एलान किया कि भाजपा अगर सत्ता में आई तो महिष्य और तेली जाति के लोगों को ओबीसी सूची में शामिल करने के लिए एक आयोग का गठन किया जाएगा। वहीं, तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने भी अपने घोषणा पत्र में एससी और एसटी को सालाना 12 हजार रुपये देने का एलान किया। इसके अलावा टीएमसी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों के लिए अलग-अलग सेल बनाए हैं, जबकि ओबीसी के लिए भी अलग सेल बनाई गई है।
क्या 'ओबीसी राजनीति' बदल देगी बंगाल की सियासत?
बंगाल की राजनीति में ओबीसी समुदाय की क्या अहमियत रही, इसे समझने के लिए एक किस्सा बेहद मशहूर है। दरअसल, देश में दलित राजनीति की जड़ें 1979 में मंडल कमीशन रिपोर्ट से उगने लगी थीं, लेकिन जब 1990 के दौरान देश में मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू हुईं, तब बंगाल के हालात एकदम अलग थे। उस वक्त तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने कहा था कि बंगाल में सिर्फ दो जातियां हैं। पहली अमीर और दूसरी गरीब। उन्होंने राज्य में ओबीसी का अस्तित्व होने से ही इनकार कर दिया था, लेकिन अब हालात एकदम अलग हैं। दरअसल, बंगाल की दलितों का राजनीतिक बदलाव 2010 में शुरू हुआ। उस वक्त राज्य सरकार ने कुछ मुस्लिम समुदायों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का एलान किया। इसके लिए रंगनाथ मिश्रा आयोग की सिफारिशों को आधार बनाया गया।
बंगाल में ऐसा है ओबीसी समीकरण
गौर करने वाली बात यह है कि जिस ओबीसी कार्ड को भुनाने के चक्कर में भाजपा और टीएमसी दोनों जुटी हुई हैं, उसमें बंगाल के 90 फीसदी मुस्लिम आते हैं। दरअसल, माकपा ने ओबीसी को आरक्षण दिया, लेकिन ममता बनर्जी ने इसे अपने पाले में खींच लिया। ममता बनर्जी ने ओबीसी की दो श्रेणियां बनाईं। श्रेणी ए में अति पिछड़ा वर्ग को रखा गया, जिसे 10 फीसदी का आरक्षण दिया गया। वहीं, श्रेणी बी में पिछड़ा वर्ग रखा गया और उसे सात फीसदी आरक्षण दिया गया। इस तरह बंगाल में ओबीसी आरक्षण 17 फीसदी पहुंच चुका है। इसके अलावा ममता बनर्जी मई 2012 में 35 जातियों को ओबीसी सूची में जोड़ चुकी हैं, लेकिन ये सभी 35 जातियां मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखती हैं। वहीं, ए और बी श्रेणी में कुल 80 जातियां आती हैं, जिनमें 72 मुस्लिम समुदाय की ही हैं। ऐसे में भाजपा इस कैटिगरी को भी हिंदुत्व के मुद्दे से भुनाने की कोशिश में लगी हुई है।
इतनी सीटों पर ओबीसी का असर
बता दें कि पश्चिम बंगाल में महिष्य समुदाय का असर करीब 50 सीटों पर है। दरअसल, पूर्वी मिदिनापुर इलाके में महिष्य समुदाय का काफी दबदबा है। वहीं, ममता बनर्जी जिस नंदीग्राम सीट से चुनावी मैदान में हैं, वहां भी महिष्य जाति के मतदाताओं की संख्या काफी ज्यादा है। गौरतलब है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने हिंदू ओबीसी जातियों पर फोकस किया था, जिसके चलते भाजपा ने 18 सीटें जीती थीं। ऐसे में ममता की नजरें भी इन्हीं वोटर्स पर बनी हुई हैं।