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अपराधी पहचान बिल 2022: 'पैरों की छाप' या 'आंखों की पुतली' जैसे नमूने किसी दूसरे क्राइम सीन पर डाल दिए तो जोखिम में फंसना तय!

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Fri, 08 Apr 2022 03:12 PM IST
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सार
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और साइबर मामलों के विशेषज्ञ पवन दुग्गल कहते हैं, कानून तो अच्छा है, लेकिन इसके दुरुपयोग की संभावना है। पहली बात तो ये है कि भारत के पास अभी तक डाटा प्रोटेक्शन कानून ही नहीं है। साइबर कानूनों का भी अभाव है। सीईआरटी-इन के मुताबिक, 2021 में 1402809 साइबर सुरक्षा घटनाएं हुई हैं। इस साल फरवरी तक इनकी संख्या 212485 है...
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Police investigation will be strengthened by the identification of prisoners bill 2022, but india should strengthen cyber laws, says expert
हथकड़ी - फोटो : अमर उजाला (फाइल फोटो)

विस्तार

दंड प्रक्रिया (शिनाख्त) विधेयक 2022, संसद के दोनों सदनों में पारित हो गया है। इस विधेयक को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष की राय जुदा है। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि समूचा विपक्ष इसके खिलाफ उतर आया हो। जनता दल (यू), अन्नाद्रमुक और वाईएसआर कांग्रेस ने इस विधेयक का समर्थन किया है। आखिर यह विधेयक, जो अब कानून बनने जा रहा है, इतना डरावना क्यों है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और साइबर मामलों के विशेषज्ञ पवन दुग्गल कहते हैं, इस विधेयक के दुरुपयोग की संभावनी बनी रहेगी। वजह, देश में अभी तक डाटा प्रोटेक्शन लॉ एवं साइबर कानून का अभाव है। ऐसे में किसी व्यक्ति के 'पैरों की छाप', या 'आंखों की पुतली' जैसे नमूने किसी दूसरे क्राइम सीन पर डाल दिए तो उसका जोखिम में फंसना तय है।



आईबी के पूर्व स्पेशल डायरेक्टर एवं कैबिनेट सचिवालय में सेक्रेटरी 'सिक्योरिटी' के पद से रिटायर हुए पूर्व आईपीएस यशोवर्धन आजाद कहते हैं, इस विधेयक से पुलिस तंत्र मजबूत होगा। अभी तक पुलिस के पास फोरेंसिक स्पोर्ट तो था ही नहीं। तकनीक को आप बैलगाड़ी में नहीं ढो सकते। बतौर आज़ाद, हां, इस अहम बिल को पहले सेलेक्ट कमेटी में भेजना चाहिए था।

यह नागरिकों की गोपनीयता को जोखिम में नहीं डालता: शाह

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस विधेयक को राज्यसभा में पेश करते हुए कहा था, यह विधेयक आपराधिक मामलों में पहचान और जांच के उद्देश्य से दोषियों व अन्य व्यक्तियों के बायोमेट्रिक विवरण एकत्र करने एवं रिकॉर्ड को संरक्षित करने के लिए अधिकृत करने का प्रयास करता है। विधेयक का मकसद, अभियोजन एजेंसियों को वैज्ञानिक साक्ष्य उपलब्ध कराने के साथ-साथ पुलिस, फोरेंसिक टीम की क्षमता निर्माण करना है। यह नागरिकों की गोपनीयता को जोखिम में नहीं डालता है। हमारा कानून अन्य देशों की तुलना में सख्ती के मामले में 'बच्चा' (कुछ नहीं) है। दक्षिण अफ्रीका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा व अमेरिका जैसे देशों में अधिक कड़े कानून हैं। यही वजह है कि उनकी सजा की दर बेहतर है। वहां पर दोष सिद्धी इसलिए ज्यादा है, क्योंकि वहां जांच एजेंसियों को वैज्ञानिक तरीके से जांच करने का अधिकार मिला हुआ है। पुलिस और फोरेंसिक टीम की कैपेसिटी बिल्डिंग करना, इस बिल का उद्देश्य है। थर्ड डिग्री का इस्तेमाल कम से कम करके दोष सिद्धि के लिए 'साइंटिफिक एविडेंस' प्रॉसिक्यूशन एजेंसी को उपलब्ध कराना इस बिल का मकसद है।

मर्डर केस में पुलिस, इसका गलत इस्तेमाल क्यों करेगी

आईबी के पूर्व स्पेशल डायरेक्टर एवं कैबिनेट सचिवालय में सेक्रेटरी 'सिक्योरिटी' के पद से रिटायर हुए पूर्व आईपीएस यशोवर्धन आजाद का कहना है, कानून कोई भी हो, उसके दुरुपयोग की संभावना तो बनी रहती है। अपने देश में तो प्रजातंत्र प्रणाली है, कुछ तो भरोसा करना होगा। सौ साल पुराना एक कानून है। 1920 से वही चला आ रहा है। इतने दशकों से साक्ष्यों का मिलान करने के लिए पुलिस केवल 'हाथ और फिंगर प्रिंट' के आसपास घूम रही है। अब बायोलॉजिकल सबूत एकत्रित करने का युग है। सरकार ने कहा है, 75 साल तक एनसीआरबी में ये सबूत या डाटा सुरक्षित रहेगा। वैसे भी किसी मामले को उसके अंजाम तक पहुंचाने के लिए पुलिस पर दबाव रहता है। कोई क्यूं मर्डर केस में इन नमूनों का गलत इस्तेमाल करेगा और कैसे करेगा। इससे तो पुलिस तंत्र मजबूत होगा। अभी तक पुलिस के पास फोरेंसिक सपोर्ट नहीं रहा है। आज के जमाने में आंखों की पुतली से अगर आरोप सिद्ध हो रहा है तो उसमें गलत क्या है। अमेरिका जैसे देशों में तो बहुत पहले से ये तकनीक इजाद कर ली गई थी। ये जरूर है कि इस बिल को सेलेक्ट कमेटी में जाना चाहिए था। कुछ कमियां हैं, जिनमें सुधार हो सकता था।

ऐसा क्या है जो इस कानून के दुरुपयोग की गारंटी देता है

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और साइबर मामलों के विशेषज्ञ पवन दुग्गल कहते हैं, कानून तो अच्छा है, लेकिन इसके दुरुपयोग की संभावना है। पहली बात तो ये है कि भारत के पास अभी तक डेटा प्रोटेक्शन कानून ही नहीं है। साइबर कानूनों का भी अभाव है। सीईआरटी-इन के मुताबिक, 2021 में 1402809 साइबर सुरक्षा घटनाएं हुई हैं। इस साल फरवरी तक इनकी संख्या 212485 है। अगर वेबसाइट हैकिंग की बात करें तो 2017 में इसके 175, 2018 में 114, 2019 में 61, 2020 में 77, 2021 में 186 और फरवरी 2022 तक ऐसे 28 मामले सामने आए हैं। बतौर पवन दुग्गल, अब ऐसे कानून के दुरुपयोग की गारंटी नहीं है। कठोर प्रावधान क्या हैं, इस पर सरकार चुप हो जाती है। सरकार को इस कानून से ज्यादा पावर मिलेगी। निजता के उल्लंघन की संभावना तो बनी रहेगी। आरोपी कोई जानवर तो हैं नहीं कि उस पर जब चाहो, उन्हीं नमूनों को थोप दो। पहचान के सबूत कहां रखेंगे, क्या एनसीआरबी से काम चल जाएगा। संभाल कर कैसे रखेंगे, ये कौन बताएगा।


संवैधानिक अधिकार का हनन, इसकी पूरी गुंजाइश बनी रहेगी। निशान तो ले लिए, लेकिन यह गारंटी कौन देगा कि उन्हीं निशानों को किसी दूसरे क्राइम सीन पर इस्तेमाल करें तो क्या होगा। पुलिस तो यह कह सकती है कि आप तो वहां थे, हमारे पास सबूत हैं। ऐसी स्थिति में इससे बचना मुश्किल होगा। डेटा प्रोटेक्शन कानून है नहीं, तो ऐसे में जो थोड़े बहुत हल्के फुल्के प्रावधान हैं, उनमें सरकार कह देगी कि ये हम पर तो लागू ही नहीं होते। इन कानूनों को लागू करने से पहले इनका गहराई से विश्लेषण करना चाहिए था। साइबर लॉ व डेटा प्रोटेक्शन कानून अस्तित्व में आने से पहले इसे लागू करना ठीक नहीं है। 

दोषसिद्धि दर में वृद्धि करने में सहायक होगा ये कानून

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, मौजूदा सरकार का मानना है कि अपराध की जांच 'थर्ड डिग्री' के आधार पर नहीं, बल्कि तकनीक एवं सूचना के आधार पर होनी चाहिए। उनके भी मानवाधिकार हैं, जो अपराधियों से पीड़ित हैं, जिनके परिवार के उस सदस्य की हत्या हो जाती है, जो घर चलाता है। हमें सिर्फ गुनहगारों की ही नहीं, अपितु उनसे पीड़ित लोगों के मानवाधिकारों की भी चिंता करनी चाहिए। इस विधेयक में दोषियों और अपराध के मामले में गिरफ्तार लोगों का विभिन्न प्रकार का ब्यौरा एकत्र करने की अनुमति देने की बात कही गई है। इसमें अंगुली एवं हथेली की छाप या प्रिंट, पैरों की छाप, फोटो, आंखों की पुतली, रेटिना और लिखावट के नमूने आदि शामिल हैं। दंड प्रक्रिया पहचान विधेयक 2022 ऐसे व्यक्तियों का समुचित शरीरिक माप लेने का विधिक उपबंध करता है। यह अपराध की जांच को अधिक दक्ष बनाएगा और दोषसिद्धि दर में वृद्धि करने में सहायता करेगा।

कई विपक्ष दलों ने इसे जोखिम भरा कानून बताया है

तृणमूल कांग्रेस के सुखेंदु शेखर रॉय ने कहा, आजादी के 75 साल बाद यह सरकार एक ऐसा कानून बनाने जा रही है, जो अंग्रेजों के समय के कानून से भी एक कदम आगे है। सरकार का विरोध करने वाले के खिलाफ इसका दुरुपयोग हो सकता है। यह निजता के अधिकारों का भी उल्लंघन करता है। इस विधेयक को प्रवर समिति में भेजना चाहिए था। वाईएसआर कांग्रेस के विजय साई रेड्डी ने विधेयक का समर्थन किया था। यह कानून पुलिस, वकील और न्यायाधीशों को मजबूती प्रदान करता है। द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) के तिरूची शिवा ने इसे दमनकारी बताया है। इसे प्रवर समिति में भेजना आवश्यक था। बीजू जनता दल के सुजीत कुमार ने विधेयक की वैधता पर सवाल उठाए हैं। इसमें जैविक नमूनों की माप के संबंध में स्पष्ट व्याख्या नहीं है। यह विधेयक न्यायिक जांच में फेल हो सकता है। अन्नाद्रमुक के ए.नवनीत कृष्णन ने कहा, यह बिल संवैधानिक दायरे में है। यह किसी कानून या अधिकार का उल्लंघन नहीं करता। सपा के रामगोपाल यादव ने कहा, यह देश में मौजूदा कई प्रचलित कानूनों का उल्लंघन करता है। यह विधेयक नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। राष्ट्रीय जनता दल के एडी सिंह ने विधेयक को मौलिक अधिकारों का हनन करने वाला बताया है। जनता दल (यू) के रामनाथ ठाकुर ने विधेयक का समर्थन किया है। 102 वर्षों के बाद जांच प्रक्रिया में बदलाव के बारे में विधि आयोग की सिफारिशों के बाद यह विधेयक लाया गया है। इसके जरिए अपराध पर लगाम कसने में मदद मिलेगी।

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