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राम धर्मविशेष नहीं, संस्कृति के प्रतीक, पीएम का अयोध्या से मुस्लिमों को संदेश

Fri, 07 Aug 2020 07:29 AM IST
Jeet Kumar हिमांशु मिश्र, नई दिल्ली
हिमांशु मिश्र, नई दिल्ली Published by: Jeet Kumar Updated Fri, 07 Aug 2020 07:29 AM IST
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pm modi gave messages to muslims of the country during ram mandir bhoomi pujan
प्रसाद वितरण - फोटो : अमर उजाला

राममंदिर निर्माण के भूमिपूजन के दौरान संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  देश के मुसलमानों को कई संदेश दिए। उनके भाषण में इस्तेमाल साझी विरासत, सबमें राम-सबके राम जैसे शब्द और खासकर जय श्रीराम की जगह जय सियाराम का उद्घोष इसकी बानगी हैं।

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पीएम ने इस्लामी देशों इंडोनेशिया, मलयेशिया और ईरान जैसे देशों में भगवान राम की स्वीकार्यता के जिक्र से संदेश साफ था कि राम किसी धर्म के नहीं बल्कि दुनिया में राष्ट्र और राष्ट्र की साझी संस्कृति के प्रतीक हैं।
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दरअसल बीते साल नौ नवंबर को अयोध्या विवाद पर फैसले के दिन और बुधवार को भूमिपूजन में पीएम के संबोधन का सार लगभग एक ही था। फैसले के लिए पीएम ने नौ नवंबर को ही बर्लिन की दीवार गिरने और दो विपरीत विचारधाराओं के एकजुट होकर नया संकल्प लेने की बात कही थी।
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पीएम ने कहा था कि बीती बातों को भुलाते हुए यह जुड़ने और जोड़ने का समय है। भूमिपूजन में  पीएम ने इसी संदेश को विस्तार रूप दिया।

संबोधन में सर्वाधिक मुस्लिम जनसंख्या वाले इंडोनेशिया, मलयेशिया, ईरान में राम की स्वीकार्यता की चर्चा की। यह भी बताया कि राम का जिक्र और स्वीकार्यता चीन, थाईलैंड, कंबोडिया, लाओस और नेपाल में भी है।

पीएम ने इन देशों का जिक्र यूं ही नहीं किया। इसके जरिये पीएम संदेश दे रहे थे कि राम किसी धर्मविशेष के नहीं, बल्कि दुनिया में देश की  साझी और समृद्ध विरासत के प्रतिनिधि हैं। अनेकता में एकता के सूत्र हैं।

इकबाल अंसारी और मोहम्मद शरीफ के जरिये भी संदेश
बाबरी मस्जिद के मुद्दई इकबाल अंसारी और लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करने वाले पद्मश्री मोहम्मद शरीफ के जरिये भी पीएम ने समरसता का संदेश दिया। दोनों को कार्यक्रम में निमंत्रित किया गया था।

अंसारी के दिवंगत पिता हामिद अंसारी बाबरी मस्जिद के मुख्य पक्षकारों में से एक थे, उनके निधन के बाद इकबाल बाबरी मस्जिद के मुद्दई बने। सुप्रीम कोर्ट फैसलेे के बाद अंसारी ने बीती बातें भुला कर मिलजुल कर आगे बढ़ने का आह्वान किया था। अंसारी मुस्लिमों में साझी विरासत और साझी संस्कृति के पैरोकार के तौर पर उभरे।

जय श्रीराम नहीं जय सियाराम
संबोधन की खास बात जयश्री राम के उद्घोष की जगह कई बार जय सियाराम के उद्घोष की है। पीएम ने यह भी कहा कि राम सबके-सबमें हैं। राम सबके-सबमें राम के जरिए पीएम ने फिर राम को धर्म की सीमाओं से परे हटाते हुए देश और देश की संस्कृति से जोड़ा। जयश्री राम की जगह जय सियाराम का उद्घोष किया।

दरअसल जयश्री राम का उद्घोष नब्बे के दशक में राममंदिर आंदोलन के दौरान शुरू किया गया। जिसमें भगवान राम के उग्र रूप की ही व्याख्या हुई। इस आंदोलन से पहले देश में लोग राम-राम, जय सियाराम, जय रामजी की, सीता-राम जैसे शब्दों से एक दूसरे का अभिवादन करते थे।


अयोध्या विवाद पर फैसला आने के बाद पीएम ने कटुता को पीछे छोड़ एकजुटता से आगे बढऩे की अपील की थी। संभवत: इसी दृष्टि से पीएम ने जय श्रीराम की जगह जय सियाराम के रूप में सहज और सर्वस्वीकार्य शब्द का इस्तेमाल किया।

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