ड्रैगन को चित करने के लिए 4 देशों की विदेश यात्रा पर हैं पीएम नरेंद्र मोदी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार को चार देशों की यात्रा पर रवाना हो गए। पीएम की ये विदेश यात्रा जर्मनी से शुरू हो रही है और फ्रांस में खत्म। वह जर्मनी, स्पेन, रूस और फ्रांस जाएंगे। पीएम कह चुके हैं कि उनकी इस यात्रा का मकसद इन देशों के साथ भारत की आर्थिक भागीदारी को बढ़ाना और निवेश को आकर्षित करना है, लेकिन पीएम की विदेश यात्रा का असल मकसद सिर्फ विदेशी निवेश आर्थिक सहयोग ही नहीं है।
कुछ छिपे हुए कूटनीतिक मुद्दे ऐसे भी हैं जिन्हें साधने के लिए भारतीय पीएम छह दिन के विदेशी दौरों पर हैं। एनएसजी के लिए समर्थन की बात हो या फिर ओबीओआर पर चीन की खिलाफत का मामला, इन कूटनीतिक हितों से भी भारत के पीएम नरेंद्र मोदी का ये चार दिवसीय दौरा जुड़ा हुआ है।
जर्मनी ने ओबीओआर को लेकर चीन का विरोध किया था, वहीं रूस ने भी चीन को इस मामले पर विचार करने के लिए कहा था। ऐसे में ओबीओआर पर ड्रैगन के खिलाफ भारत नया दांव चलने की तैयारी में है।
जर्मनी के दौरे के असल मायने
पीएम के छह दिन के विदेश दौरे की शुरुआत जर्मनी से होगी। वह जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल से भारत-जर्मनी अंतरसरकारी परामर्श (आईजीसी) के तहत वार्ता करेंगे। मोदी जर्मनी के राष्ट्रपति फ्रैंक-वाल्टर स्टाइनमायर से भी मुलाकात करेंगे। नरेंद्र मोदी का ये जर्मनी का दूसरा दौरा है।
पीएम के जर्मनी दौरे में व्यापार और निवेश, सुरक्षा और आतंकवाद से मुकाबला, इनोवेशन और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, कौशल विकास, शहरी बुनियादी ढांचा, रेलवे और नागर विमानन, स्वच्छ उर्जा, विकास सहयोग, स्वास्थ्य और वैकल्पिक चिकित्सा पर जोर रहेगा।
जर्मनी को मूल्यवान सहयोगी बताते हुए पीएम ने कहा कि जर्मनी की दक्षता भारत के ट्रांसफार्मेशन के उनके विजन के साथ सटीक बैठती है। मोदी ने ये भी कहा, मुझे भरोसा है कि इस यात्रा से जर्मनी के साथ हमारे द्विपक्षीय सहयोग में एक नया अध्याय शुरू होगा और हमारी रणनीतिक भागीदारी और प्रगाढ़ होगी।
पर्यावरण की सुरक्षा और पारर्दशिता में कमी दिखने पर जर्मनी ने ओबीओर को लेकर चीन का विरोध किया था। ऐसे में ओबीओआर की खिलाफत में जर्मनी को भारत एक मजबूत साझीदार मानकर चल रहा है।
स्पेन से भारत को क्या होगा फायदा
मंगलवार को मोदी स्पेन जाएंगे। लगभग तीन दशक में स्पेन की आधिकारिक यात्रा पर जाने वाले वह पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं। वह किंग फेलिप षष्ठम से मुलाकात और राष्ट्रपति मारियानो राजोय के साथ बातचीत करेंगे। उन्होंने कहा कि हम द्विपक्षीय संवाद बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा करेंगे।
इसमें आर्थिक क्षेत्र और साझा चिंताओं वाले अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर सहयोग विशेष रूप से आतंकवाद का मुकाबला करना शामिल है। वह स्पेनिश उद्योग के प्रमुख अधिकारियों से भी मिलेंगे और उन्हें ‘मेक इन इंडिया’ पहल में सहयोगी बनने के लिए प्रोत्साहित करेंगे। ऐसे में स्पेन के साथ उद्दोगिक हितों की पूर्ति और आतंकवाद के विरुद्ध अभियान में भारत नया सहयोगी तलाश रहा है।
इसके अलावा भारत के साथ कारोबार करने की इच्छुक स्पेन की हल्के कोच बनाने वाली कंपनी के अधिकारियों से पीएम मुलाकात कर सकते हैं। पिछले साल तीन चरण के परीक्षण के दौरान टैल्गो ने मथुरा-पलवल मार्ग पर 180 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार दर्ज की और दिल्ली से मुंबई तक का रेल सफर सिर्फ 11.48 घंटे में पूरा किया। इसलिए पीएम की ये मुलाकात टेल्गो ट्रेन के संबंध में भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
रूस से भारत क्यों बढ़ाना चाहता है नजदीकी
मोदी 31 मई से दो जून के बीच रूस में सेंट पीटर्सबर्ग की यात्रा पर रहेंगे। वह 18वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन में शिरकत करेंगे। उन्होंने कहा, मैं राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ विस्तृत चर्चा करूंगा ताकि अक्टूबर 2016 में गोवा के शिखर सम्मेलन में हुई बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाया जा सके।
दो जून को मोदी और पुतिन सेंट पीटर्सबर्ग इंटरनेशनल इकोनॉमिक फोरम को संबोधित करेंगे। इसमें भारत अतिथि देश है। यूएन में रूस की मजबूत स्थिति की वजह से उससे दोस्ती भारत के लिए फायदे का सौदा साबित होगी। चीन का ओबीओआर प्रोजेक्ट भारत के लिए चिंता की वजह है। वहीं रूस के साथ दोस्ती इस ओबीआर के खिलाफ भारत का विरोध और मजबूत होगा। रूस के राष्ट्रपति ने भी ओबीओर की समिट के पहले दिन ही इसको लेकर विचार करने पर जोर दिया था।
इसके अलावा भारत चाहता है कि रूस अपने दोस्त चीन को भारत को एनएसजी सदस्यता के लिए समर्थन देने के लिए मनाए। भारत को लग रहा है कि रूस इस मामले में अपनी क्षमताओं का पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं कर रहा है।
फ्रांस से करीबी बढ़ाने की ये है असल वजह
अपनी यात्रा के अंतिम चरण में मोदी दो जून को फ्रांस जाएंगे। वह यहां नव निर्वाचित राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से मुलाकात करेंगे। मोदी ने कहा कि फ्रांस हमारे महत्वपूर्ण सामरिक सहयोगियों में से एक है। बीते साल ही फ्रांस के साथ भारत ने राफेल लड़ाकू विमानों के सौदे को अंतिम रूप दिया था।
मैक्रों का नजरिया भारत के लिए सकारात्मक रहा है। खास बात यह है कि वह भी पीएम मोदी की तरह सबका साथ - सबका विकास की बात कहते हैं। इसीलिए मैक्रों ने चुनाव प्रचार के दौरान यूरोपीयन यूनियन के साथ बने रहने की अपनी नीति भी स्पष्ट कर दी थी।
मैक्रों की जीत के वक्त मोदी ने कहा था कि वह भारत और फ्रांस के रिश्तों को और मजबूत बनाने के लिए मैक्रों से मुलाकात का इंतजार कर रहे हैं। मोदी ने कहा कि फ्रांसीसी राष्ट्रपति से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार और भारत की स्थायी सदस्यता, विभिन्न बहुपक्षीय निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाओं में भारत की सदस्यता, आतंकवाद रोधी अभियान में सहयोग, जलवायु परिवर्तन और अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन पर विचारों का आदान-प्रदान होगा।