‘भारत को दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए’: खनिजों पर पीएम मोदी का बड़ा दांव, सरकार की क्या तैयारी?
केंद्र सरकार ने लिथियम और निकेल के प्रसंस्करण के लिए 2,814 करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दी है। इसके तहत पांच साल में चार संयंत्र लगाए जाएंगे और कंपनियों को 30 प्रतिशत तक पूंजीगत सब्सिडी मिलेगी। इसका लक्ष्य इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा क्षेत्र की जरूरतें पूरी करना है। लेकिन क्या इससे भारत की विदेशी निर्भरता घटेगी? क्या देश भविष्य की तकनीक खुद विकसित कर पाएगा? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
विस्तार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने महत्वपूर्ण खनिजों के प्रसंस्करण को बढ़ावा देने के लिए 2,814 करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दी है। इसका नाम ‘महत्वपूर्ण खनिज प्रसंस्करण को बढ़ावा देने के लिए पूंजीगत सहायता योजना’ रखा गया है। यह योजना वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक पांच साल के लिए लागू होगी। इसके तहत देश में लिथियम और निकेल के प्रसंस्करण के लिए चार संयंत्र स्थापित किए जाएंगे। सरकार का मकसद इन खनिजों को देश में ही साफ करके उच्च गुणवत्ता वाले पदार्थों में बदलना है, ताकि आयात पर निर्भरता घटे और भारत भविष्य की तकनीक बनाने की अपनी क्षमता बढ़ा सके।
Do you feel India should depend on other countries for processing the critical minerals that power our future? I certainly don’t! Lithium, nickel, cobalt…these are essential for EVs, batteries, electronics and defence. Yet, we remain heavily dependent on imports of refined materials. To address this, the Cabinet has approved a scheme to change this. Key highlights: New critical mineral processing plants. Capital subsidy to boost investment. Greater domestic value addition. Stronger supply chains. The principle is clear...India must have capabilities to build technologies of the future! https://t.co/deencvjivt
— Narendra Modi (@narendramodi) November 4, 2026
भारत को लिथियम, निकेल और कोबाल्ट की जरूरत क्यों है?
लिथियम, निकेल और कोबाल्ट ऐसे खनिज हैं, जिनका इस्तेमाल कई आधुनिक तकनीकों में होता है। इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी बनाने में इनकी अहम भूमिका है। इसके अलावा मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, ऊर्जा भंडारण प्रणाली, रक्षा क्षेत्र और विशेष प्रकार के इस्पात के निर्माण में भी इनकी जरूरत पड़ती है। आने वाले समय में इलेक्ट्रिक वाहनों और बैटरी की मांग बढ़ने के साथ इन खनिजों का महत्व भी बढ़ेगा। फिलहाल भारत में इनका प्रसंस्करण करने की क्षमता सीमित है। कच्चे खनिजों को उपयोग लायक बनाने के लिए जरूरी तकनीक, बड़ी पूंजी और कच्चे माल की उपलब्धता भी चुनौती बनी हुई है। इसलिए सरकार देश के भीतर ही प्रसंस्करण की पूरी व्यवस्था विकसित करना चाहती है।
योजना के तहत कितने संयंत्र लगाए जाएंगे और कितनी मिलेगी मदद?
इस योजना के तहत कुल चार प्रसंस्करण संयंत्र स्थापित किए जाएंगे। इनमें दो संयंत्र लिथियम और दो निकेल के लिए होंगे। प्रत्येक लिथियम संयंत्र की न्यूनतम क्षमता 30 हजार टन और प्रत्येक निकेल संयंत्र की न्यूनतम क्षमता 50 हजार टन रखी गई है। सरकार पात्र निवेश पर 30 प्रतिशत पूंजीगत सब्सिडी देगी। हालांकि, लिथियम संयंत्र लगाने वाले प्रत्येक लाभार्थी को अधिकतम 500 करोड़ रुपये और निकेल संयंत्र लगाने वाले प्रत्येक लाभार्थी को अधिकतम 900 करोड़ रुपये की सहायता ही मिलेगी। इस तरह सरकार निजी निवेश को प्रोत्साहित करके देश में प्रसंस्करण की नई क्षमता तैयार करना चाहती है।
कंपनियों का चयन कैसे होगा और पैसा कब मिलेगा?
योजना के तहत कंपनियों का चयन दो चरणों में किया जाएगा। पहले चरण में आवेदन करने वाली कंपनियों की तकनीकी क्षमता की जांच होगी। इसमें सफल होने वाली कंपनियां ही दूसरे चरण में वित्तीय बोली लगा सकेंगी। प्रत्येक खनिज के लिए दो कंपनियों का चयन किया जाएगा। चयन में उस कंपनी को प्राथमिकता मिलेगी, जो सरकार से सबसे कम पूंजीगत सहायता मांगते हुए संयंत्र स्थापित करने की पेशकश करेगी। सहायता की रकम एक साथ नहीं दी जाएगी। इसे तय किए गए काम और लक्ष्यों को पूरा करने के आधार पर तीन किस्तों में जारी किया जाएगा। इससे यह सुनिश्चित करने की कोशिश होगी कि सरकारी सहायता का इस्तेमाल वास्तव में संयंत्र लगाने और उन्हें चालू करने में हो।
क्या इससे भारत की आयात पर निर्भरता और रणनीतिक जोखिम घटेंगे?
फिलहाल महत्वपूर्ण खनिजों के प्रसंस्करण का काम दुनिया के कुछ ही देशों और क्षेत्रों में केंद्रित है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय तनाव, कीमतों में उतार-चढ़ाव या किसी देश की ओर से आपूर्ति रोकने का असर भारत पर भी पड़ सकता है। सरकार के मुताबिक, इस निर्भरता से देश की आर्थिक सुरक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा के लक्ष्य प्रभावित हो सकते हैं। नई योजना से भारत में खनिजों का मूल्य बढ़ाने, आयात का विकल्प तैयार करने और आपूर्ति व्यवस्था मजबूत करने में मदद मिलने की उम्मीद है। निकेल के प्रसंस्करण के दौरान कोबाल्ट को भी उप-उत्पाद के रूप में प्राप्त किया जा सकेगा। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि भारत भविष्य की तकनीक के लिए जरूरी क्षमताएं खुद विकसित करे, न कि इसके लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहे। यह योजना आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को आगे बढ़ाने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है।