किसानों के लिए स्थाई कमाई का जरिया बन सकती है सौर ऊर्जा योजना, सरकार दे रही भारी-भरकम छूट!
- पीएम-कुसुम योजना के अंतर्गत सोलर पैनल पंप लगाने पर 66 से 90 फीसदी तक की मिल सकती है छूट, सिंचाई के साथ-साथ खेती के अन्य कार्यों को करना भी संभव
- सोलर पैनल से बनी अतिरिक्त बिजली बेचकर स्थाई कमाई का जरिया बना सकते हैं किसान
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किसानों को सस्ती बिजली उपलब्ध कराने के मुद्दे पर सरकार, बिजली कंपनियां और स्वयं किसान असमंजस में हैं। अगर किसानों को मुफ्त बिजली उपलब्ध कराई जाती है, तो इससे बिजली कंपनियों और अंततः सरकार पर लगातार वित्तीय बोझ बढ़ता जाता है, जो पहले ही प्रति वर्ष 80 हजार करोड़ रुपये की सीमा पार कर चुका है। वहीं अगर किसानों को मुफ्त बिजली उपलब्ध नहीं कराई जाती है, तो इससे किसानों की कृषि लागत बढ़ती है, जो पहले ही कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं। ऐसे में विकल्प क्या हो सकता है, जो सरकारों को वित्तीय बोझ से राहत देने के साथ-साथ किसानों को मुफ्त बिजली भी प्रदान करा सके।
शून्य मेंटेनेंस पर 25 से 30 साल तक टेंशन खत्म
पूर्व सचिव और ऊर्जा विशेषज्ञ अजय शंकर के अनुसार सौर ऊर्जा से संचालित सोलर पंप इस समस्या का उचित समाधान बन सकते हैं। एक बार सोलर पंप लगाकर इससे लगभग 25-30 साल तक निर्बाध सिंचाई के लिए बिजली प्राप्त की जा सकती है। इनकी लागत एक हॉर्स पॉवर की मशीन के लिए लगभग एक लाख रुपये से 10 हॉर्स पॉवर की मशीन के लिए अलग-अलग कंपनियों के अनुसार 6 लाख रुपये तक हो सकती है। सोलर पैनल से बनी बिजली का उपयोग सिंचाई के साथ-साथ अन्य सभी कृषि कार्यों के लिए किया जा सकता है। इस प्रकार किसान की बिजली पर निर्भरता खत्म हो जाती है।अगर किसान इन सोलर पंप्स की स्कीम का लाभ पीएम-कुसुम (PM-KUSUM) योजना के अंतर्गत लेते हैं, तो किसान को इसकी केवल एक तिहाई कीमत तक चुकानी पड़ती है, जबकि एक तिहाई कीमत राज्य सरकार और शेष एक तिहाई कीमत केंद्र सरकार चुकाती है। कुछ राज्य सरकारें अपने किसानों को ज्यादा छूट उपलब्ध कराती हैं, जिससे किसानों को केवल 10 फीसदी तक ही खर्च वहन करना पड़ता है।
एक बार इस योजना का लाभ ले लेने के बाद सरकार को किसान के ऊपर बिजली सब्सिडी का वहन नहीं करना पड़ता है। इससे राज्य सरकारों को स्थाई लाभ मिलता है। एक मशीन लगभग शून्य मेंटेनेंस पर 25 से 30 साल तक कार्य करती रहती है। बीच-बीच में केवल बैटरी बदलने की आवश्यकता पड़ती है।
कुछ सोलर पंप को हाइब्रिड तकनीकी से भी बनाया जाता है, जिन्हें आवश्यकता पड़ने पर बिजली से भी चलाया जा सकता है, लेकिन बैटरी आधारित होने के कारण इन सोलर पंप्स से दिन-रात कभी भी सिंचाई की जा सकती है।
बिजली कंपनियों को बचत
दरअसल, बिजली कंपनियां चार से 4.50 रुपये तक प्रति यूनिट का भुगतान करती हैं। इसे ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचाने के समय परिचालन लागत और प्रशासनिक खर्च मिलाकर यह सात रुपये से 8.50 रुपये तक पहुंच जाता है। लेकिन सरकार के दिशा-निर्देशों के कारण इसे किसान को लगभग मुफ्त या नाममात्र की लागत पर उपलब्ध कराया जाता है। लेकिन अगर यही बिजली ग्रामीण स्तर पर ही पैदा की जा सके, तो इसकी परिचालन लागत और प्रशासनिक खर्च नगण्य हो जाएगा।
किसानों की स्थाई कमाई का जरिया
किसानों को कृषि कार्यों के लिए बिजली की आवश्यकता बहुत सीमित समय के लिए होती है। लेकिन सोलर पैनल से वे लगातार बिजली पैदा करते हैं। इस तरह वे अतिरिक्त बिजली कंपनियों को बेचकर स्थाई कमाई का साधन तैयार कर सकते हैं। अगर सरकार और बिजली कंपनियां किसानों की बिजली खरीदने की गारंंटी दें, तो इससे एक तरफ तो किसान बिजली बेचकर स्थाई आय का साधन बना सकते हैं, तो दूसरी तरफ सरकार को भी स्वच्छ ईंधन की स्थाई सप्लाई मिल सकती है जो देश को ऊर्जा संकट में बड़ी मदद कर सकती है।
चुनौतियां
सौर ऊर्जा पैनल के लिए सब्सिडी उपलब्ध कराने के लिए फंड देना केंद्र-राज्य सरकारों के लिए बड़ी चुनौती है। किसानों की भारी संख्या सब्सिडी के लिए भारी-भरकम बजट की मांग करती है। वर्तमान समय में यह सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण है। इसके प्रति किसानों के मन में जागरूकता पैदा करना भी बड़ी चुनौती है जो पारंपरिक सोच से अलग जाने में संकोच का भाव रखते हैं।