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Supreme Court: मतदाता सूची में गड़बड़ी पर सुप्रीम कोर्ट में SIT गठन के लिए याचिका दायर, उठाई गई ये मांगें
Wed, 20 Aug 2025 10:49 PM IST
हिमांशु चंदेल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु चंदेल
Updated Wed, 20 Aug 2025 10:49 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर मतदाता सूची में गड़बड़ियों की जांच के लिए एसआईटी गठन की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि जब तक स्वतंत्र ऑडिट पूरा न हो, तब तक सूची का संशोधन रोका जाए। मामला राहुल गांधी के उन आरोपों से जुड़ा है, जिनमें उन्होंने भाजपा और चुनाव आयोग पर मिलीभगत से वोट चोरी का आरोप लगाया था।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : एएनआई
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट में एक अहम याचिका दायर की गई है जिसमें मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि इस एसआईटी का नेतृत्व किसी पूर्व न्यायाधीश को करना चाहिए ताकि निष्पक्ष जांच हो सके। यह याचिका बेंगलुरु सेंट्रल और अन्य प्रभावित क्षेत्रों में मतदाता सूची में छेड़छाड़ के आरोपों की जांच से जुड़ी है। इस मामले को लेकर सात अगस्त को राहुल गांधी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी, जिसमें उन्होंने चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए थे।
कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने आरोप लगाया था कि भाजपा और चुनाव आयोग की मिलीभगत से मतदाता सूची में भारी आपराधिक धोखाधड़ी की गई है। उन्होंने कहा था कि यह "वोट चोरी" लोकतंत्र पर "एटम बम" है। इन आरोपों के तुरंत बाद कर्नाटक और महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारियों ने राहुल गांधी से उन मतदाताओं के नाम और शपथपत्र मांगे, जिनकी जानकारी को उन्होंने गलत बताया था। वहीं, 17 अगस्त को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने साफ किया कि यदि राहुल गांधी सात दिन के भीतर शपथपत्र देकर अपने दावे का सबूत नहीं देंगे तो उनके आरोप "निराधार और अमान्य" माने जाएंगे।
याचिका में और क्या-क्या?
एडवोकेट रोहित पांडे द्वारा दायर याचिका में सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया गया है कि जब तक मतदाता सूची का स्वतंत्र ऑडिट पूरा नहीं होता और अदालत के निर्देशों का पालन नहीं होता, तब तक मतदाता सूची में कोई नया संशोधन या अंतिम रूप नहीं दिया जाए। याचिका में चुनाव आयोग को बाध्यकारी दिशानिर्देश जारी करने की मांग की गई है, ताकि मतदाता सूची की तैयारी, प्रकाशन और रखरखाव में पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रहे। इसमें डुप्लीकेट या फर्जी नामों की रोकथाम के लिए ठोस तंत्र की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है।
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महाराष्ट्र का मामला और गंभीर सवाल
याचिका में यह भी दावा किया गया है कि महाराष्ट्र में 2024 लोकसभा चुनाव के बाद और विधानसभा चुनाव से पहले मात्र चार महीनों में करीब 39 लाख नए मतदाता सूची में जोड़े गए। जबकि पिछले पांच वर्षों में केवल 50 लाख मतदाता ही जुड़े थे। यह अचानक और असामान्य बढ़ोतरी चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करती है। याचिकाकर्ता ने कहा कि यह मामला अदालत के संज्ञान में लाना जरूरी है क्योंकि यह लोकतंत्र की जड़ों को प्रभावित कर सकता है।
ये भी पढ़ें- ट्रंप के टैरिफ से कैसे निपटेगा भारत, विश्लेषकों ने बताया क्या अब नए दोस्त ढूंढने का समय?
संविधान की मर्यादा और अदालत की भूमिका
याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने हमेशा माना है कि मुफ्त और निष्पक्ष चुनाव संविधान की बुनियादी संरचना का हिस्सा हैं, जिन्हें किसी भी कानून या कार्यपालिका की कार्रवाई से कमजोर नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ता का कहना है कि सर्वोच्च अदालत का हस्तक्षेप जरूरी है ताकि मतदाता सूची की पवित्रता और संविधान की गरिमा को सुरक्षित रखा जा सके। इस हस्तक्षेप के बिना चुनावों की निष्पक्षता और जनता के भरोसे पर आंच आ सकती है।
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कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने आरोप लगाया था कि भाजपा और चुनाव आयोग की मिलीभगत से मतदाता सूची में भारी आपराधिक धोखाधड़ी की गई है। उन्होंने कहा था कि यह "वोट चोरी" लोकतंत्र पर "एटम बम" है। इन आरोपों के तुरंत बाद कर्नाटक और महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारियों ने राहुल गांधी से उन मतदाताओं के नाम और शपथपत्र मांगे, जिनकी जानकारी को उन्होंने गलत बताया था। वहीं, 17 अगस्त को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने साफ किया कि यदि राहुल गांधी सात दिन के भीतर शपथपत्र देकर अपने दावे का सबूत नहीं देंगे तो उनके आरोप "निराधार और अमान्य" माने जाएंगे।
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याचिका में और क्या-क्या?
एडवोकेट रोहित पांडे द्वारा दायर याचिका में सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया गया है कि जब तक मतदाता सूची का स्वतंत्र ऑडिट पूरा नहीं होता और अदालत के निर्देशों का पालन नहीं होता, तब तक मतदाता सूची में कोई नया संशोधन या अंतिम रूप नहीं दिया जाए। याचिका में चुनाव आयोग को बाध्यकारी दिशानिर्देश जारी करने की मांग की गई है, ताकि मतदाता सूची की तैयारी, प्रकाशन और रखरखाव में पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रहे। इसमें डुप्लीकेट या फर्जी नामों की रोकथाम के लिए ठोस तंत्र की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है।
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महाराष्ट्र का मामला और गंभीर सवाल
याचिका में यह भी दावा किया गया है कि महाराष्ट्र में 2024 लोकसभा चुनाव के बाद और विधानसभा चुनाव से पहले मात्र चार महीनों में करीब 39 लाख नए मतदाता सूची में जोड़े गए। जबकि पिछले पांच वर्षों में केवल 50 लाख मतदाता ही जुड़े थे। यह अचानक और असामान्य बढ़ोतरी चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करती है। याचिकाकर्ता ने कहा कि यह मामला अदालत के संज्ञान में लाना जरूरी है क्योंकि यह लोकतंत्र की जड़ों को प्रभावित कर सकता है।
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संविधान की मर्यादा और अदालत की भूमिका
याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने हमेशा माना है कि मुफ्त और निष्पक्ष चुनाव संविधान की बुनियादी संरचना का हिस्सा हैं, जिन्हें किसी भी कानून या कार्यपालिका की कार्रवाई से कमजोर नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ता का कहना है कि सर्वोच्च अदालत का हस्तक्षेप जरूरी है ताकि मतदाता सूची की पवित्रता और संविधान की गरिमा को सुरक्षित रखा जा सके। इस हस्तक्षेप के बिना चुनावों की निष्पक्षता और जनता के भरोसे पर आंच आ सकती है।