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म्यांमारः सैन्य शासन विरोधी अभियान के ये अभिनव तरीके

Fri, 26 Feb 2021 10:13 PM IST
गौरव पाण्डेय डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, यंगून
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, यंगून Published by: गौरव पाण्डेय Updated Fri, 26 Feb 2021 10:13 PM IST
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people taking new ways of protest against army rule in Myanmar
म्यांमार में प्रदर्शन - फोटो : पीटीआई (फाइल)

म्यांमार में तख्तापलट के चार हफ्ते पूरे होने को हैं, लेकिन सैनिक शासक देशभर में हो रहे जन विरोध पर काबू नहीं पा सके हैं। सैन्य अधिकारियों ने सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबंध लगा दिया है, लेकिन नागरिक संगठनों ने इस दौरान विरोध जताने के नए-नए तरीके ईजाद किए हैं। एक फरवरी को तड़के सेना ने सत्ता हथिया ली थी। उसके अगले ही दिन से देश में विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए थे। तब से लगातार जारी सिविल नाफरमानी आंदोलन के दौरान लोगों ने अपनी ड्यूटी पर जाने से इनकार किया है, सैनिक जनरलों के मालिकाने वाले बिजनेस घरानों का वे बहिष्कार कर रहे हैं और लगातार सड़कों पर आ कर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हैं।

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विश्व मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक विरोध की शुरुआत मेडिकल कर्मचारियों ने की। पहले ही हफ्ते में बड़ी संख्या में स्वास्थ्य कर्मियों ने अपने पदों से इस्तीफे दे दिए। बहुत से कर्मियों ने अस्पतालों में काम करना जारी रखा, लेकिन विरोध जताने के लिए उन्होंने अपनी बांह पर लाल फीते बांधे रखे। इसके बाद लोगों ने अपने-अपने मोहल्लों में विरोध जताया। उन्होंने बर्तन बजा कर विरोध जताया। म्यांमार में आम मान्यता के मुताबिक बर्तन बजाने से भूत-प्रेत भाग जाते हैं। विरोध जताने का ये तरीका इस बार खूब लोकप्रिय हुआ है। यह आज भी जारी है। रोज रात लोग आठ से सवा आठ बजे तक अपने घरों से बाहर आकर बर्तन बजाते हैं। इस तरीके से बड़ी संख्या में उन लोगों की भी सैनिक शासन विरोधी अभियान में भागीदारी बनी है, जो इसके लिए अपने घरों से निकल कर बाहर नहीं जा सकते।
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म्यांमार के प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार इरावाडी के संपादक क्याव जवा मोये ने लिखा है कि इस आंदोलन के दौरान शिक्षकों, स्वास्थ्य कर्मियों और वन अधिकारियों जैसे सरकारी कर्मचारियों की बड़े पैमाने पर भागीदारी देखी गई है। प्रदर्शनकारियों ने इस दौरान ट्रैफिक रोका है और सरकारी कर्मचारियों को काम पर न जाने देने के कार्यक्रम आयोजित किए हैं। मोये के मुताबिक ट्रैफिक रोकने के लिए प्रदर्शनकारियों ने नए-नए तरीके अपनाए हैं। जैसे, एक चौराहे पर किसी ने जानबूझ कर चावल और प्याज गिरा दिए। उसके बाद वहां भीड़ इकट्ठी हो गई, जिसके सदस्यों ने प्याज और चावल के एक-एक दाने को चुना। ऐसा करने के पीछे उनका मकसद ट्रैफिक जाम करना था। पुलिस इस दौरान चुपचाप देखती रही।
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इसके अलावा सड़क पर कार ब्रेकडाउन कर देने या धीमी गति से ड्राइविंग करने के उपाय भी सैनिक शासन विरोधी समूहों ने अपनाए हैं। तिपहिया वाहनों का उपयोग भी इस अभियान में किया गया है। कुछ जगहों पर प्रदर्शनकारियों ने अपना विरोध दिखाने के लिए नौका यात्राएं भी निकाली हैं। एक जगह ट्रैफिक रोकने के लिए अनगिनत लोग अचानक सड़क पर बैठ कर अपने जूते के फीते बांधने लगे। इसी तरह सड़कों पर अचानक नुक्कड़ नाटक और संगीत कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं, जिससे यातायात रोक दिया जाता है।

इसके अलावा लॉटरी बायकॉट की मुहिम खासी प्रभावी रही है। लॉटरी टिकटों की बिक्री से होने वाली आमदनी सरकार के खजाने में जाती है। पत्रकारों ने सैनिक अधिकारियों की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बहिष्कार की मुहिम छेड़ रखी है। कुछ जगहों पर स्थानीय पत्रकारों को इन प्रेस कॉन्फ्रेंसों में जाने को मजबूर किया गया। इस पर कई पत्रकारों ने अपनी नौकरी छोड़ दी है। सैनिक शासकों के अपशकुन की कामना के लिए धार्मिक आयोजन किए गए हैँ। उधर सैना समर्थक फेसबुक पेजों की शिकायत फेसबुक से करने का संगठित अभियान चलाया गया है।


सड़कों पर हो रहे प्रदर्शनों की चर्चा दुनिया में खूब हुई है। लेकिन छोटे-छोटे स्तरों पर और बिल्कुल नए तरीकों से जताए जा रहे विरोध पर बाहरी दुनिया का ज्यादा ध्यान नहीं गया है। लेकिन जानकारों का कहना है कि यह विरोध बताता है कि सैन्य शासन विरोधी भावना कितने व्यापक रूप से फैली हुई है। 

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