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रामपुर में किसी ने चंदा दिया, किसी ने श्रमदान किया और बन गया पुल

Mon, 27 Feb 2017 04:44 AM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, टांडा (रामपुर)
ब्यूरो/ अमर उजाला, टांडा (रामपुर) Updated Mon, 27 Feb 2017 04:44 AM IST
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people of Fifty villages Build the bridge in rampur
सांकेतिक चित्र - फोटो : Getty Images
नेताओं और अफसरों से एक अदद पुल के निर्माण की मांग कर थक चुके पचास गांवों के लोगों ने सहकारिता की मिसाल कायम की है। उन्होंने बहल्ला नदी पर लकड़ी का पुल बनाकर अपने आवागमन को सुगम बनाया है। किसी ने चंदा दिया, तो किसी ने श्रमदान कर अपनी परेशानी दूर करने में मदद की। ग्रामीण इस बात पर खुश हैं कि खेती बाड़ी का काम हो या बच्चों के स्कूल आने-जाने की टेंशन, उन्होंने सभी समस्याओं का खुद निदान कर दिया है। ग्रामीणों का कहना है कि ऐसा पुल वो हर वर्ष बनाते हैं।
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 नगर के मोहल्ला मरघटी पश्चिम में बहल्ला नदी बहती है। टांडा के  मोहल्ला मरघटी, मस्जिद कोहना, मोहल्ला रांड, मोहल्ला बरगद, ईद वाली बगिया सहित कई मोहल्लों वासियों की खेती की जमीन नदी के पार भी है। बरसात शुरू होते ही वहां जाना मुश्किल हो जाता है। ग्राम करखेड़ा, करखेड़ी, मल्हूपुरा, रैनटावाला, भगतपुर, केशोनगली, बहादुर का मझरा, रोशनपुर, आदि दर्जनों गांव के किसान टांडा से जुड़े हैं। 
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बच्चे जान जोखिम में डाल नदी पार करके आते थे

people of Fifty villages Build the bridge in rampur
सांकेतिक चित्र - फोटो : Getty Images

पुल न होने की दशा में उन्हें कई किलोमीटर लंबा रास्ता तय करना पड़ता था। साथ ही ग्रामीणों के बच्चे अपनी जान को जोखिम में डाल टांडा पढ़ने के लिए नदी पार करके आते थे। गांव वालों ने बताया कि पुल के लिए लंबे समय से मांग की जा रही है। नेताओं ने तो आंखें ही बंद कर ली।

कई बार नेताओं से मांग की, लेकिन उन्होंने जल्द पुल बनाने का वादा किया था मगर कुछ नहीं हुआ। जो अफसर कभी गांव आए भी तो वे जनता का पत्र जेब में रखकर चले गए। इस बार फिर परेशानी से बचने के लिए ग्रामीणों ने खुद ही कमर कसने का मन बनाया। 

लकड़ी का पुल बनाने के लिए लोगों ने जैसे तैसे चंदा किया और पुल बनाने के लिए खुद जुट गए और बहल्ला नदी पर लकड़ी का अस्थायी पुल बना दिया। अब पुल पर बाइक भी दौड़ रही हैं। स्कूल जाने वाले बच्चों को भी सुविधा हो रही है, लेकिन गर्मी करीब आने तथा बारिश होने के कारण लकड़ी का पुल बह जाता है। जिसके बाद ग्रामीणों को मजबूरन अपनी जान जोखिम में डाली जाती है या फिर आठ किलोमीटर लंबा अतिरिक्त सफर तय करना पड़ता है।

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