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'काबुल और देहात' में बहुत फर्क है: 'तालिबान' के शरिया कानून, वार लॉर्ड्स व 'पाकिस्तानी देवबंदी' से भयभीत हैं लोग!

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Wed, 18 Aug 2021 04:52 PM IST
सार

2001 से पहले अफगानिस्तान के 90 प्रतिशत क्षेत्र पर जब तालिबान का कब्जा था तो शरिया कानून को सख्ती से लागू किया गया। महिलाओं को बुर्का पहनना पड़ा तो पुरुषों को दाढ़ी छोटी रखने पर उन्हें जेल में डाल दिया जाता था। तालिबान ने दो दिन पहले कहा था कि महिलाओं को आजादी मिलेगी। वे सरकार के साथ मिलकर काम करें...

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People of afghanistan are dreaded about the Sharia law of the 'Taliban', the War Lords and the Pakistani Deobandi
तालिबान - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

अफगानिस्तान में तालिबान ने सत्ता संभाल ली है। वहां की स्थिति को बयान करतीं जो तस्वीरें देखने को मिल रही हैं, वे ज्यादातर 'काबुल' या उसके आसपास की हैं। वजह, अंतरराष्ट्रीय मीडिया का जमावड़ा वहीं पर है। अफगानिस्तान को करीब से जानने वाले लोगों का कहना है कि वहां 'काबुल और देहात' में बहुत फर्क है। 'तालिबान' के शरिया कानून, वार लॉर्ड्स व पाकिस्तानी देवबंदी को लेकर लोग आशंकित हैं। महिलाएं और बच्चे भयभीत हैं। महिलाओं के लिए बुर्का पहनने की पाबंदी तो पुरुषों की दाढ़ी छोटी हो सकती है। फेहरिस्त में यौन शोषण जैसे अपराध भी हैं। अफगानिस्तान की सामान्य आबादी के सामने 'भरोसे' का संकट है। मौजूदा परिस्थितियों में तालिबान वही बयान जारी कर रहा है, जैसा अंतरराष्ट्रीय जगत चाहता है।

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अफगानिस्तान में लंबे समय तक स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर काम कर चुकी एक महिला पत्रकार जो अब भी विदेश में है, उन्होंने अपना नाम न छापने की शर्त पर कई बातों का खुलासा किया है। सवाल पूछा गया था कि क्या अफगानिस्तान में महिलाएं और बच्चे, सुरक्षित रह सकेंगे। दूसरा, सामान्य आदमी की तालिबान के आतंक को लेकर कैसी सोच है। तालिबान पर कितना भरोसा करेगा अफगानिस्तान, आदि सवाल किए गए थे। महिला पत्रकार ने कहा, इसके लिए अफगानिस्तान में तालिबान को शुरू से जानना होगा। इतना तो जानते हैं कि 1990 में जब रूस, अफगानिस्तान में था तो यूएस की 'सीआईए' ने मुजाहिदीन ग्रुप के बीच से ही तालिबान को तैयार करना शुरू किया था।
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नब्बे के दशक में यह संगठन अस्तित्व में आ गया। ऐसा नहीं है कि अफगानिस्तान में केवल तालिबान समर्थित लोग ही हैं। वहां अनेक जातीय समूह रहे हैं। उनमें अफगान नेशनल, पश्तून, ताजिक, उजबेक, किरीग, हजारा व सियाज आदि शामिल हैं। इनके ट्राइबल कोड भी अलग-अलग होते हैं। पश्तून की बड़ी संख्या है। खासतौर पर, दक्षिणी और पूर्वी क्षेत्रों में उनका दबदबा है।

गांवों में अधिक आबादी रहती है। वहां के लिए अलग से शरिया कोर्ट स्थापित की गई हैं। वार लॉर्ड्स यानी ट्राइबल लीडर को बड़ा माना जाता है। जैसे ताजिक लीडर या उजबेक लीडर आदि। ये लीडर जो कहते हैं, वह बात सभी को माननी पड़ती है। नब्बे के दशक में वहां अस्थिरता का माहौल रहा है। कोई छह माह के लिए शासन में रहा तो कोई 12 महीने। इसी दौरान तालिबान पनपने लगा। अफगान गुरिल्ला लड़ाकों ने इस संगठन को खड़ा किया था। अफगान लड़ाकों के साथ पश्तो आदिवासी स्टूडेंट भी आ गए। इस संगठन से जुड़े बहुत लोगों का संबंध पाकिस्तानी देवबंदी से रहा है। वजह, बहुत से अफगानी रिफ्यूजी बनकर पाकिस्तानी मदरसों में पढ़े थे। उनके दिमाग पर इस्लामिक विचारधारा का प्रभाव पड़ा। तालिबान ने शुरुआत में इस्लामिक शरिया को अफगानिस्तान में ले जाने का मकसद तय किया था। वर्तमान में अफगानिस्तान के ज्यादातर मदरसे पाकिस्तानी देवबंदी विचारधारा वाले हैं। भारतीय देवबंद तालिबान को स्पोर्ट नहीं करता, जबकि पाकिस्तानी देवबंद खुले तौर पर तालिबान को मदद देता रहा है। यहां बता दें कि अफगानिस्तान में पूर्व सोवियत संघ की मौजूदगी '1980 से 1997' तक मर्डर, रेप और लूटपाट की घटनाएं आम हो गई थी।

महिला पत्रकार के मुताबिक, अफगानिस्तान में 2007 से तालिबानी मूवमेंट चल रहा है। इस संगठन ने अलग-अलग क्षेत्रों में ताकत बढ़ा ली। गांवों में शरिया अदालतों का चलन बढ़ गया। यहीं पर पहली बार लोगों को तालिबान की पुरुष प्रधानता की कट्टरता का अहसास हुआ। ग्रामीण परिवेश में महिलाओं को बहुत कम स्वतंत्रता दी गई। महिलाओं के अलावा अल्पसंख्यकों को दबाकर रखा गया। अंतरराष्ट्रीय मीडिया की कवरेज वहां तक नहीं पहुंच पाती थी। अब तालिबान का मकसद 'इस्लामिक एमिरेट ऑफ अफगानिस्तान' बनाना है। 2001 से पहले तालिबानी हुकूमत के दौरान देश का यही नाम रखा गया था। इस्लामिक लॉ बेस्ड ऑन शरिया, इस पर भविष्य के तालिबान की व्यवस्था खड़ी होगी।

2001 से पहले अफगानिस्तान के 90 प्रतिशत क्षेत्र पर जब तालिबान का कब्जा था तो शरिया कानून को सख्ती से लागू किया गया। महिलाओं को बुर्का पहनना पड़ा तो पुरुषों को दाढ़ी छोटी रखने पर उन्हें जेल में डाल दिया जाता था। तालिबान ने दो दिन पहले कहा था कि महिलाओं को आजादी मिलेगी। वे सरकार के साथ मिलकर काम करें। इसके अगले ही दिन यह आदेश जारी कर दिया कि महिलाएं टीवी एंकर का काम नहीं करेंगी। बतौर महिला पत्रकार, तालिबान अपनी बात से तुरंत मुकर जाता है।

अफगानिस्तान में तालिबान के सामने अब अपनी स्थिति को मजबूत करना है। उसे वैश्विक स्तर पर मान्यता चाहिए। इसी के चलते वह अभी कुछ दिन तक वही बात कहेगा, जो उसे मान्यता दिलाने में मदद करेगी। दोहा की बैठक में जो कुछ कहा गया, उसे तालिबान ने पूरा नहीं किया। वह कितने दिन तक अपने स्टैंड पर टिकेगा, ये कोई नहीं बता सकता। काबुल और देहात के अफगानिस्तान में जमीन आसमान का फर्क है। उस अंतर को पाटना आसान नहीं है। इस्लामिक लॉ बेस्ड ऑन शरिया, ने लोगों को भयभीत कर दिया है। वॉर लॉर्ड्स की मनमर्जी और पाकिस्तानी देवबंदी में ग्रामीण लोगों, खासतौर से महिलाओं का पिसना जारी रहेगा। दो तीन माह बाद जब यह साफ हो जाएगा कि कौन से देश तालिबान के साथ हैं और कौन से नहीं, तभी तालिबान का असली चेहरा दुनिया के सामने आएगा।

तालिबान के प्रवक्ता और तालिबानी संस्कृति परिषद के प्रमुख जबीउल्लाह मुजाहिद ने मंगलवार को कहा था 'हम किसी के प्रति नफरत की भावना नहीं रखेंगे। हमें बाहरी या अंदरूनी दुश्मन नहीं चाहिए। अफगानिस्तान की जमीन से किसी देश पर हमला नहीं होने देंगे। उनकी ये बातें अभी तो ठीक हैं, लेकिन भविष्य में वे कहां स्टैंड करेंगी, कोई नहीं जानता।

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