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कानों देखी: ये हार्दिक कैसे मानेगा

Tue, 04 Sep 2018 11:40 PM IST
शशिधर पाठक
शशिधर पाठक Updated Tue, 04 Sep 2018 11:40 PM IST
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Patidar leader Hardik Patel how will satisfied in Kano Dekhi

गुजरात के युवा पटेल नेता हार्दिक को मनाने की पहले सभी कोशिशें बेकार हो चुकी थी। नतीजतन भाजपा के हाथ में पैर का पसीना सिर पर चढ़ने के बाद गुजरात बस आते-आते आ पाया। अब एक बार फिर हार्दिक पटेल ने मुश्किल बढ़ा दी है। हार्दिक पटेल अनशन पर बैठ हैं। जल भी त्याग दिया है। पटेल समुदाय लगातार हार्दिक के साथ सहानुभूति रखकर चल रहा है। दूसरी तरफ इस मामले को एक बार फिर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह देख रहे हैं। 

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शाह प्रधानमंत्री मोदी से भी चर्चा कर रहे हैं और मुख्यमंत्री विजय रुपाणी के भी संपर्क में हैं। गुजरात सरकार ने हार्दिक के आवास के बाहर कड़ा पहरा लगा दिया है। किसी को मिलने की इजाजत नहीं है। इसके जवाब में हार्दिक ने आमरण अनशन शुरू कर दिया है।
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सूत्र बताते हैं कि भाजपा आलाकमान को इसका समाधान नजर ही नहीं आ रहा है। क्योंकि जैसे जैसे समय बीत रहा है, गुजरात में लोगों पर हार्दिक का बुखार चढ़ने की भी सूचना आ रही है। बलपूर्वक अनशन तुड़वाना ही एक उपाय है और भाजपा इसके बाद आने वाले नतीजे की तपिश भी महसूस कर रही है।

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खोदा नोटबंदी का पहाड़, निकली चुहिया

पिछले साल तक रिजर्व बैंक नई करेंसी की छपाई पर 11,396 करोड़ रुपये खर्च कर चुका है। इस साल का खर्च जोड़ ले तो इसके 13 हजार करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर जाने का अनुमान है। जबकि पुराने 500 और 1000 के नोटों की जारी करेंसी में से 11 हजार करोड़ रुपये से भी कम आने हैं। नेपाल, भूटान, म्यामांर जैसे सहयोगी पड़ोसी देशों से भी पुरानी करेंसी आनी है। ऐसे में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस मुद्दे को जरा मजबूती से पकड़ लिया है। वह लगातार हमलावर है। 

कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रभारी रणदीप सुरजेवाला जहर बुझे तीर छोड़ रहे हैं तो पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम का हमला जारी है। वहीं भाजपा के पास बचाव के लिए कुछ नहीं है। पार्टी के प्रखर प्रवक्ता सांबित पात्रा रोज लकीर की फकीर पीट रहे हैं। इतना ही नहीं मोदी सरकार के कुछ रणनीतिकार भी परेशान हैं। हालांकि भाजपा नेताओं का कहना है कि एक दिन तो यह होना ही था। अच्छा है लोकसभा चुनाव से सात-आठ महीने पहले ऐसा हो गया। कम से कम जनता का नोटबंदी को लेकर गुस्सा तो निकल जाएगा।

राहुल बाबा शरद जी को मनाओ

राहुल गांधी रह रहकर कुछ ऐसा कर जाते हैं कि सहयोगी चिढ़ जाते हैं। कद्दावर नेता शरद यादव को भी राहुल गांधी के कुछ तरीके कभी कभी परेशान कर देते हैं। जब शरद जी का नीतीश कुमार से टकराव चल रहा था और राज्यसभा की सदस्यता पर खतरा मंडराया था तो राहुल गांधी ने शरद जी के पास अलवर से उपचुनाव लड़ने का प्रस्ताव भेज दिया था। तब शरद जी ने राहुल का शुक्रिया अदा करते हुए इसे मानने से इनकार कर दिया था। लेकिन इधर शरद जी थोड़ा तंग चल रहे हैं।

तालकटोरा स्टेडियम में शरद जी ने सांझी विरासत का आयोजन किया था। कार्यक्रम में राहुल गांधी, सीताराम येचुरी समेत कई नेता पहुंचे। उसी दिन अटल जी के देहावसान की खबर आनी शुरू हुई। किन्ही कारणों से तालकटोरा की कुर्सियां खाली थी।

खाली कुर्सियां राहुल गांधी को असहज कर रही थी और राहुल गांधी की यह असहजता शरद जी के करीबी और पूर्व राज्यसभा सांसद अली अनवर को तंग कर रही थी। अली अनवर की जानकारी पर शरद भी तंग हो गए। बताते हैं सांझी विरासत के बाद से शरद यादव ने खुद की भूमिका को पहले की तुलना में थोड़ा सा सिकोड़ लिया है। हालांकि कांग्रेस के अन्य वरिष्ठ नेताओं से उनकी चर्चा भी हो रही है।



 

फूले जम्मू-कश्मीर का गुब्बारा तो फोड़ें

जम्मू-कश्मीर को नया राज्यपाल मिल गया है। राज्यपाल सत्यपाल मलिक पूरे राजनीतिक जीवन में सत्ता से करीब का रिश्ता रखने के लिए जाने जाते हैं। भाजपा को उनसे काफी उम्मीद है। भजपा महासचिव राम माधव की उम्मीद भी बढ़ गई है। संघ के प्रचार अरुण कुमार को भी लग रहा है कि नई नजीर लिखी जा सकती है। नई नजीर यह है कि बन सके तो जम्मू-कश्मीर में भाजपा की सरकार बन जाए। मुख्यमंत्री कवीन्द्र गुप्ता या निर्मल सिंह जैसा कोई हिंदू बन जाए। ऐसा हो गया तो पूरे देश में भाजपा को अपना डंका बजने का अनुमान है। एक नारा भी-पहली बार, जम्मू में हिन्दू सीएम की सरकार। 

यह आइडिया भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह के कान तक लगातार पहुंचाया जा रहा है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस लाइन पर बहुत सावधानी से आगे बढ़ना चाहते हैं। भाजपा ने जम्मू-कश्मीर में सज्जाद लोन को तैयार किया है। सज्जाद लोन नेशनल कांफ्रेस और पीडीपी के विधायकों से लगातार चर्चा कर रहे हैं। लोन को लग रहा है कि सबकुछ ठीक-ठीक रहा तो भाजपा के साथ वह बहुमत वाले विधायकों की संख्या को छूकर सरकार बना ले जाएंगे।  

लोन लगातार भाजपा नेताओं के संपर्क में हैं। वह मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा भी रखते हैं। वहीं इस पूरे प्लान पर फारुख अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती और गुलाम नबी आजाद की लगातार नजर बनी हुई है। बताते हैं सत्ता पक्ष की तरह ही विपक्ष भी जम्मू-कश्मीर में भाजपा का गुब्बारा फूलने का इंतजार कर रहा है। पीडीपी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है पहले गुब्बारे में हवा तो भरने दीजिए। थोड़ी भरेगी तभी तो फूटेगा। यह जम्मू-कश्मीर है।


साथियों का टोटा
लोकसभा चुनाव होने में एक साल से कम समय बचा है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह लगातार साथियों की संख्या बढ़ाने में कड़ी मेहनत कर रहे हैं। वह कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना में लगातार मेहनत कर रहे हैं। पिछले सप्ताह हैदराबाद गए थे। 

तमिलनाडु में एस गुरुमूर्ति, उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू, खुद भाजपा अध्यक्ष भी सक्रिय हैं। प्रधानमंत्री भी पहल कर रहे हैं। कर्नाटक में जेडी(एस), कांग्रेस गठबंधन पर तनाव बढ़ाने की भी कोशिश हो रही है, लेकिन अभी नतीजा सिफर है। तमिलनाडु में ओपीएस, ईपीएस और टीटीवी दिनाकरण के खेल में एआईएडीएमके सिमटती जा रही है। वहीं स्टालिन की डीएमके भाई अलागिरी के विरोध के बावजूद राज्य में मजबूत पकड़ बना रही है। कलैइनार(एम करुणानिधि) के जाने के बाद सहानुभूति भी है।

 लिहाजा भाजपा लगातार हाथ बढ़ा रही है, लेकिन स्टालिन हाथ छिपा ले रहे हैं। यही स्थिति तेलंगाना में भी है केसीआर भी लोकसभा चुनाव तक पत्ते नहीं खोलना चाहते। वह पहले से केंद्र में गैर भाजपा और गैर कांग्रेस की सरकार के पक्षधर हैं। केसीआर के करीबियों का अनुमान है कि 2019 में भाजपा बड़ा मुकसान उठा सकती है। लिहाजा वह चुनाव बाद नई सरकार से ही अच्छा रिश्ता रखेंगे। ताकि उनके नये और छोटे से राज्य को संसाधनों की कमी न पड़े।
 
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