इंसाफ का इंतजार: पसमांदा मुसलमानों को कब मिलेगा सामाजिक न्याय, संगठनों और राजनीति पर विदेशी अशराफ मुस्लिमों का है कब्जा!
इस्लामिक मामलों के जानकार डॉ. फैयाज अहमद फैजी ने अमर उजाला को बताया कि पसमांदा मुसलमानों में अभी तक कोई अंबेडकर, कांशीराम, मायावती और मुलायम सिंह पैदा नहीं हुआ है, लिहाजा पसमांदा मुसलमानों को सामाजिक न्याय कब मिलेगा, कहा नहीं जा सकता। राजनीति में पसमांदा मुसलमानों को धार्मिक भावनाओं के नाम पर भड़काकर इनसे केवल झंडा उठवाने और नारे बुलंद करवाने का काम करवाया जाता है, लेकिन इन्हें जिम्मेदारी नहीं दी जाती...
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मुस्लिम समुदाय में 90 फीसदी आबादी पसमांदा मुसलमानों की है। मुस्लिम समाज में इन्हें निम्नतर दर्जे का माना जाता है। उच्च जाति के अशराफ मुसलमान इनसे रोटी-बेटी का संबंध नहीं रखते। कई जगहों पर इन छोटी जातियों के मुसलमानों को मस्जिदों में प्रवेश तक नहीं करने दिया जाता। इनकी अपनी मस्जिदें होती हैं। लगभग हर शहर में पसमांदा मुसलमानों के लिए अलग-अलग कब्रिस्तान पाए जाते हैं। यह भेदभाव केवल धार्मिक-सामाजिक मामलों तक सीमित नहीं है। आरोप है कि मुसलमानों के शीर्ष संगठनों- ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जामा मस्जिद, जमीयत-उलेमा-ए-हिंद में भी केवल अशराफ मुसलमान ही बैठे हुए हैं।
इस्लामिक मामलों के जानकार डॉ. फैयाज अहमद फैजी ने अमर उजाला को बताया कि पसमांदा मुसलमानों में अभी तक कोई अंबेडकर, कांशीराम, मायावती और मुलायम सिंह पैदा नहीं हुआ है, लिहाजा पसमांदा मुसलमानों को सामाजिक न्याय कब मिलेगा, कहा नहीं जा सकता। राजनीति में पसमांदा मुसलमानों को धार्मिक भावनाओं के नाम पर भड़काकर इनसे केवल झंडा उठवाने और नारे बुलंद करवाने का काम करवाया जाता है, लेकिन इन्हें जिम्मेदारी नहीं दी जाती।
यूपी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने 40 से ज्यादा मुसलमानों को टिकट दिया है, लेकिन इसमें पसमांदा समाज के एक दर्जन उम्मीदवार भी शामिल नहीं हैं। सपा जिस सामाजिक न्याय की बात करती है, उसके अनुसार पसमांदा समुदाय को 35-36 टिकट मिलने चाहिए थे। पसमांदा मुसलमानों के हक पर विदेशी मूल के मुसलमानों ने कब्जा जमाकर रखा हुआ है।
आजम खान समाजवादी पार्टी के बड़े नेता हैं। उन्होंने अपने बेटे और रिश्तेदारों तक सभी को विधायक बना दिया है। रामपुर से वे भारी संख्या में चुनाव जीतते हैं। लेकिन उन्हें वोट देने में रामपुर और आसपास की इलाके में बसे बंजारा समुदाय के मुसलमानों की भागीदारी सबसे ज्यादा होती है। लेकिन पसमांदा मुसलमानों से आने वाले बंजारा समुदाय से कोई नेता आज तक सामने नहीं आया है। डॉ. फैयाज अहमद फैजी का मानना है कि सामाजिक जागृति न होने के कारण पसमांदा मुसलमानों की आवाज अनसुनी रह जाती है।
यहां भी हक नहीं
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड स्वयं को भारत के मुसलमानों का प्रतिनिधि संगठन मानता है। इस संगठन ने फतवा-ए-आलमगीरी के आधार पर मजमूने कवानीने इस्लामी नाम की एक पुस्तक प्रकाशित की है। इसमें एक ‘कुफू का सिद्धांत’ बनाया गया है जिसमें बताया गया है कि किस मुस्लिम जाति के लोग किस मुस्लिम जाति के लोगों से विवाह संबंध स्थापित कर सकते हैं। इसमें अशराफ मुसलमानों और पसमांदा मुसलमानों में भेद किया गया है। पसमांदा मुसलमान अपनी बेटियों की शादी अशराफ मुसलमानों से करने का स्वप्न भी नहीं देख सकते।
आजमगढ़ उत्तर प्रदेश में मुसलमानों का बड़ा गढ़ है। यहीं पर बैतुल उलूम मदरसा है, जिसे मुसलमान समुदाय के बीच बेहद सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। इस तरह यहां इस्लाम के जातिवाद विरोधी सिद्धांत को सबसे आदर्श रूप में सामने आना चाहिए था, लेकिन यहां के सरायमीर इलाके में निचली जाति के मुसलमानों धोबिया मुसलमानों और गियाने की मस्जिद बनी हुई है। वे उच्च जाति के मुसलमानों के मस्जिदों में प्रवेश नहीं कर सकते।
यहीं के निजामाबाद तहसील में सीधा सुल्तानपुर गांव है। गैरकानूनी होने के बाद भी यहां के निचली जाति के पसमांदा मुसलमान अछूत सा जीवन बिताते हैं। उन्हें गांव से बाहर बसाया गया है। आरोप है कि वे उच्च जाति के अशराफ मुसलमानों के गांव के अंदर जाने की भी हिम्मत नहीं कर सकते। ऊंची जाति के विदेशी मुसलमानों की मस्जिदों में जाने की तो बात ही नहीं की जा सकती।
हलवाई मुसलमानों के लिए अलग कब्रिस्तान
लखीमपुर खीरी के गोला गोकरननाथ का पवित्र स्थान है। यहां पसमांदा मुसलमान भी भारी संख्या में रहते हैं। लेकिन इनसे भेदभाव का रोग इतना गंभीर है कि यहां के हलवाई मुसलमानों के लिए अलग कब्रिस्तान बनाया गया है। पसमांदा मुसलमान उच्च जाति के कब्रिस्तान में जाने का साहस नहीं कर सकते। कुछ कब्रिस्तान सबके लिए खुले भी होते हैं, लेकिन कई कब्रिस्तानों में केवल सैयद, पठान का कब्रिस्तान लिख दिया जाता है जिससे पसमांदा मुसलमान उनमें प्रवेश तक न करें।
डॉ. फैयाज अहमद फैजी कहते हैं कि विदेशी मूल से आए मुसलमान आज भी अपनी श्रेष्ठता के दंभ से निकल नहीं सके हैं। ईरान के शेरवान नामक स्थान से आए मुसलमान अपने नाम के साथ शेरवानी लगाते हैं, किरमान से आए मुसलमान खुद को किरमानी बताते हैं, बुखारा से आए मुसलमान अपने नाम के साथ बुखारी लगाते हैं, पठान-पख्तून अपने नाम के साथ ज्यादातर खान लगाते हैं। सैयद मुसलमान अपने को पैगंबर मोहम्मद का वंशज मानते हैं और खुद को सबसे ऊंचा समझते हैं।
फैजी का आरोप है कि यदि अपनी प्रतिभा से उस्ताद बिस्मिल्लाह खान या वीर अब्दुल हमीद जैसे पसमांदा मुसलमान राष्ट्रीय स्तर पर बड़े बन भी जाते हैं तो अशराफ मुसलमान उनको सम्मान नहीं देते। उन्होंने कहा कि कबीर पसमांदा मुसलमान ही थे। दुर्भाग्य है कि कबीरपंथी समुदाय में हिंदू समुदाय के लोग सबसे ज्यादा संख्या में शामिल होते हैं, कबीरपंथी समुदाय में मुसलमान न के बराबर हैं। उनका आरोप है कि कबीर दास को उच्च जाति के अशराफ मुसमान आज भी सम्मान नहीं देते क्योंकि उन्होंने हिंदू धर्म के साथ-साथ मुसलमानों में व्याप्त जातीय बुराई पर भी करारा प्रहार किया था।
हमें गुलाम समझते हैं अशराफ मुसलमान
पसमांदा मुसलमानों के बड़े राजनीतिक संगठन ऑल इंडिया यूनाइटेड मुस्लिम मोर्चा के राष्ट्रीय प्रवक्ता हाफिज गुलाम सरवर ने अमर उजाला से कहा कि उच्च जाति के अशराफ मुसलमान न केवल हमें विवाह और रोटी के संबंधों सें दूर रखते हैं, बल्कि राजनीतिक रूप से भी भागीदारी देने के लिए तैयार नहीं होते। वे राजनीतिक सभाओं में हमसे झंडे उठवाते हैं, धार्मिक नारे लगवाते हैं, लेकिन कहीं भागीदारी देने को तैयार नहीं होते।
उन्होंने कहा कि मुसलमानों की राजनीतिक पार्टी होने का दावा करने वाली ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम में भी पसमांदा मुसलमानों को जगह नहीं दी जाती। दारूल उलूम देवबंद और जमीयत उलेमा ए हिंद में पसमांदा मुसलमानों की भागीदारी के बिना सबका विकास नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि पसमांदा मुसलमानों में जागृति के अभाव में अशराफ मुसलमान उनका हक मार रहे हैं। वे आज भी उन्हें मुगल काल की तरह अपना गुलाम समझते हैं और उनकी भागीदारी देने को तैयार नहीं हैं।