कारगिल में परवेज मुशर्रफ की इस धमकी ने भारतीय वायुसेना को दिला दी थी जंग में उतरने की इजाजत
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कारगिल की लड़ाई के दौरान कई ऐसी परिस्थितियां बन गई थीं, जिनके बीच भारत के राजनीतिक नेतृत्व और सेना को अहम निर्णय लेने में देरी का सामना करना पड़ा। जांबाज सैनिक अपने अदम्य साहस के बलबूते धीरे-धीरे पाकिस्तानी सेना द्वारा कब्जाई गई चोटियों को खाली करा रहे थे। भारत के पास शक्तिशाली वायुसेना थी, लेकिन उसके इस्तेमाल को लेकर सहमति नहीं बन पा रही थी।
तर्क दिया गया, अगर वायुसेना कारगिल में उतरती है तो स्थिति बिगड़ जाएगी। अंतिम निर्णय यह हुआ कि पहले एलओसी से घुसपैठ हटाई जाए। यह बात परवेज मुशर्रफ तक पहुंच गई। उसने सीधी धमकी दे दी कि भारत ने कोई बड़ा कदम यानी एयर मारक क्षमता का इस्तेमाल या मिसाइल जैसा कुछ दागा तो पाकिस्तान उसका जवाब देगा। मुशर्रफ की यही धमकी हमारे लिए रामबाण साबित हुई। मौजूदा परिस्थितियों और इस धमकी को सामने रखकर हमने राजनीतिक नेतृत्व को वायुसेना के सीमित इस्तेमाल के लिए राजी कर लिया।
कारगिल की लड़ाई में भारतीय वायु सेना की भूमिका को लेकर कई सवाल उठते रहे हैं। इनमें ज्यादातर सवाल यही थे कि वायुसेना का इस्तेमाल देरी से क्यों हुआ। समय रहते वायुसेना का साथ मिल जाता तो थलसेना के इतने अफसर और जवान शहीद न होते। क्या राजनीतिक नेतृत्व और सेना के तीनों अंगों में तालमेल नहीं था, आदि सवाल लोगों के जेहन में उठते रहे हैं।
उस दौरान भारतीय सेना के अध्यक्ष रहे वेद प्रकाश मलिक ने ऐसे कई सवालों से पर्दा हटाया है। उन्होंने अपनी किताब 'फ्रॉम सरप्राइज टू विक्टरी' में लिखा है, पाकिस्तानी फौज के जनरल परवेज मुशर्रफ के नापाक इरादों में बारे में कोई नहीं जानता था। खुद पाकिस्तानी हुक्मरान भी उनकी कई बातों से अनभिज्ञ थे। कारगिल की घटना के कई साल बाद खुद नवाज शरीफ ने यह स्वीकार किया था कि उन्होंने परवेज मुशर्रफ को सेना सौंपकर बड़ी गलती की थी। दोनों तरफ फर्क इतना रहा कि हमें राजनीतिक नेतृत्व और अंतरराष्ट्रीय जनमत को भी ध्यान में रखना था।
पड़ोसी मुल्क में सेना के दुस्साहस को रोकने वाला कोई नहीं था। वहां की चुनी हुई सरकार के हाथ से सेना करीब करीब निकल चुकी थी। यहां तक कि पाकिस्तानी नौसेना और एयरफोर्स को भी मुशर्रफ के आपरेशन की ज्यादा भनक नहीं थी। बतौर मलिक, परवेज एक हेलीकॉप्टर में सवार होकर आपरेशन बदर की अग्रिम पंक्ति जो एलओसी पार कर चुकी थी, से मिलने के लिए चला आया। यह उनका निजी दुस्साहस था।
भारत, कारगिल की स्थिति को क्या मानकर कार्रवाई करे, इस सवाल ने सभी को बांध दिया
पाकिस्तान की छद्म रणनीति के बारे में किसी को कोई नहीं जानकारी नहीं थी। भारत कारगिल की स्थिति को क्या मानकर कार्रवाई करे, इस सवाल ने सभी को बांध कर रख दिया। लड़ाई शुरू होने के बाद यह एक अहम वजह रही कि हम वायुसेना की मारक क्षमता का इस्तेमाल करने जैसा बड़ा निर्णय समय पर नहीं ले सके। 18 मई 1999, कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) की बैठक चल रही थी।
तत्कालीन वाइस चीफ ऑफ एयरस्टाफ चंद्रशेखर ने कारगिल में वायुसेना की मदद की बात कही। उन्होंने कहा, इस अपमानजनक स्थिति में वायुसेना की मारक क्षमता का इस्तेमाल जरूरी है।सीसीएस ने उनके प्रपोजल को नकार दिया।तर्क यह दिया गया कि इससे स्थिति बिगड़ सकती है।ऐसे में भारत-पाक के बीच ट्रैक-2 डायलाग की संभावना खत्म हो जाएगी।
सेनाध्यक्ष मलिक चाहते थे कि कारगिल में वायुसेना की उपस्थिति जरूरी है
मलिक के मुताबिक, चंद्रशेखर ने मुझे विश्वास दिलाया कि कारगिल में वायुसेना की उपस्थिति जरूरी है।वायुसेना और नेवी के मामले में हम पाक पर भारी हैं।इस मसले को लेकर लगातार बैठकें और तर्क-वितर्क चलते रहे, मगर हमें अपने फाइटर जहाजों को उड़ाने की मंजूरी नहीं मिली।सीसीएस अपनी बात पर अड़ी थी कि वायुसेना कारगिल नहीं जाएगी। हमें पाक के इरादों का पता नही है।हमारी छोटी सी गलती भयानक युद्ध को बुलावा दे सकती है। उन्हें चिंता थी कि ऐसी हालत में भारत सरकार अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था को कैसे और क्या जवाब देगी।
23 मई 1999 को फिर बैठक हुई। इसमें नौसेना प्रमुख सुशील कुमार भी शामिल हुए।उन्होंने वायुसेना के इस्तेमाल का समर्थन किया। हालांकि वायुसेना अध्यक्ष अनिल यशवंत टिपनिस ने उस वक्त तक खुद भी इस पहल को खास तवज्जो नहीं दी। उनका तर्क था कि ज्यादा ऊंचाई पर हेलीकॉप्टर ले जाना जोखिम भरा है।
टिपनिस ने जनरल मलिक को पत्र लिखकर हवाई मारक क्षमता और राजनीतिक एवं सामरिक बाध्यता के बारे में बताया। अंत में लिखा, एक बार फिर सोचें। मलिक ने जवाब दिया कि कारगिल व लद्दाख में लड़ रही सेना को वायुसेना का सहयोग जरूरी है। मैं इसके लिए सीसीएस के सामने आपका यानी टिपनिस का विरोध करूंगा।
फिर सीसीएस की बैठक हुई।इस बार एनएसए ब्रजेश मिश्र, रॉ-आईबी, आर्मी इंटेलीजेंस और रक्षा मंत्रालय के अफसर भी बैठक में उपस्थित थे। वायुसेना को कारगिल भेजने पर सबकी सहमति बन ही रही थी कि विदेश मंत्री जसवंत सिंह अड़ गए।
परवेज मुशर्रफ ने जब धमकी दी तो वायुसेना के हाथ खुल गए
मलिक ने अपनी किताब में इस बात का उल्लेख करते हुए लिखा है कि यही धमकी वायुसेना को कारगिल तक ले आई। मलिक के अनुसार, इसे सामने रखकर और मौजूदा स्थिति का हवाला देकर हमने राजनीतिक नेतृत्व को वायुसेना के सीमित इस्तेमाल के लिए राजी कर लिया। शुरुआत में नुकसान उठाया, मगर बाद में वायुसेना ने अचूक बमबारी कर पाक सेना को भागने के लिए मजबूर कर दिया।
उस वक्त ऐसा लगा कि वायुसेना को कारगिल बुलाने का निर्णय गलत था
24 मई को राजनीतिक नेतृत्व की स्वीकृति मिलते ही वायुसेना कारगिल पहुंच गई। सभी को लग रहा था कि अब चोटियों पर जो थोडे बहुत पाकिस्तानी बचे हैं, उन्हें मार भगाने में मदद मिलेगी। वायुसेना के आपरेशन के पहले ही दिन एमआई-35 हेलिकॉप्टर मौसम खराब होने के कारण उड़ नहीं सका। दो दिन बाद एक एमआई-17 हेलीकॉप्टर गिर गया। इसके बाद दो मिग मार गिराए गए।चिंता होने लगी कि वायुसेना को कारगिल भेजना कहीं गलत निर्णय तो नहीं था।
दिल्ली में बैठकों का दौर शुरु हो गया। कमी तलाशी गई तो पता चला कि वायुसेना के लड़ाकू जहाज अपने टारगेट पर ठीक तरह से निशाना नहीं लगा पा रहे थे। इस कमी को दूर कर वायुसेना ने लगातार एक हजार से ज्यादा स्ट्राइक की। लड़ाकू जहाजों ने 250-1000 किलोग्राम तक के बमों की वर्षा कर दी।नतीजा, पाकिस्तानी सेना को भागना पड़ा। थलसेना ने कारगिल की जीत को आपरेशन विजय का नाम दिया तो वायुसेना ने आपरेशन सफेद सागर कहा। हालांकि इसमें नौसेना का सीधा रोल नहीं था, लेकिन वह हर पल तैयार थी। उसकी इसी भूमिका को आपरेशन तलवार कहा गया।