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बोडो समझौते में शामिल पक्षों ने मांगी क्षेत्रीय परिषद में जगह, कहा- शांति के लिए आवश्यक है ऐसा करना

Wed, 19 Feb 2020 04:46 AM IST
Mohit Mudgal अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: Mohit Mudgal Updated Wed, 19 Feb 2020 04:46 AM IST
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parties involved in the Bodo agreement sought land for regional council
बोडो समझौते - फोटो : ani

केंद्र सरकार के साथ कुछ दिन पहले बोडो समझौते पर हस्ताक्षर करने के साथ ही असम में चल रहे दशकों पुराने सशस्त्र विद्रोह का हल निकालने वाले पक्षों ने अब एक नई मांग रखी है। इन पक्षों का कहना है कि उन्हें बोडो प्रादेशिक परिषद (बीटीसी) के प्रशासनिक ढांचे में जगह दी जाए ताकि क्षेत्र में शांति सुनिश्चित की जा सके।

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बीटीसी के चुनाव आगामी 8 अप्रैल को होने हैं। समझौते में शामिल एनडीएफबी के तीन सशस्त्र घटकों के नेताओं समेत सभी पक्षों का कहना है कि उन लोगों ने दशकों तक अपने समुदाय के लिए संघर्ष किया है और वे अपने लोगों की जरूरतों को समझते हैं। इस कारण उन्हें बोडो राजनीति में शामिल करने के प्रावधान से बोडो प्रादेशिक क्षेत्र में बहुत बदलाव लाएगा। एनडीएफबी (प्रोग्रेसिव) धड़े के अध्यक्ष गोविंदा बासुमात्रे ने कोकराझार से फोन पर कहा, यह हम थे, जो अपने लोगों के लिए लड़े।
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सरकार को हम जैसे असली नेताओं को बोडो प्रशासन में शामिल करने की जरूरत है, क्योंकि हम अपने लोगों की जरूरत बेहतर जानते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि बोडोलैंड की स्वायत्तता की राह प्रशस्त करने वाले दो पूर्व समझौते के बावजूद सत्ता कुछ लोगों के हाथों में केंद्रित है, जो बीटीसी के गठन के समय से इसका सुख भोग रहे हैं। अखिल बोडो छात्र परिषद के पूर्व अध्यक्ष प्रमोद बोरो ने भी कुछ ऐसी ही मांग की। बोडो वुमंस जस्टिस फोरम की अध्यक्ष अंजलि दायमैरी ने भी एक उचित राजनीतिक तंत्र की आवश्यकता जताई।
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तीन समझौते हो चुके हैं अब तक

 इससे पहले 1993 और फिर 2003 में समझौता हुआ था, जिससे बीटीसी अस्तित्व में आई थी। इसके बाद केंद्र सरकार ने 27 जनवरी को असम के विद्रोही समूह नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एनडीएफबी) के विभिन्न घटकों के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते के तहत अलग बोडोलैंड राज्य या केंद्र शासित प्रदेश बनाने की उग्रवादी संगठनों की मुख्य मांग के बजाय केंद्र सरकार ने उन्हें राजनीतिक व आर्थिक लाभ देने का वादा किया था।

राज्य में 1972 में अलग बोडोलैंड के गठन की मांग को लेकर शुरू हुए आंदोलन के बाद पिछले तीन दशक में यह तीसरा बोडो समझौता था। समझौते के बाद 30 जनवरी को 1550 उग्रवादियों ने अपने हथियार रख दिए थे। इस समझौते के तहत अगले तीन साल में केंद्र व राज्य सरकार मिलकर बोडो क्षेत्रों में 1500 करोड़ रुपये का आर्थिक कार्यक्रम चलाएगी। साथ ही केंद्र सरकार की तरफ से सभी बोडो जिलों में मेडिकल कॉलेज, एनआईटी, साई केंद्र, आर्गेनिक यूनिवर्सिटी, खेल विश्वविद्यालय भी बनाए जाएंगे।


क्या है बीटीसी

केंद्र सरकार, राज्य सरकार और बोडो संगठनों के बीच 2003 के समझौते के तहत असम के कोकराझार, चिरांग, बक्सा और उडालगिरि जिलों को मिलाकर बोडो प्रादेशिक परिषद (बीटीसी) स्वायत्त क्षेत्र का गठन किया गया था। बोडो पीपुल्स फ्रंट पार्टी के संस्थापक हगरामा मोहिलारे का इस परिषद की राजनीति में दबदबा है और इसके गठन के बाद से वह ही इसके मुखिया बनते रहे हैं।

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