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कब आएगा पीएम-सीएम को पद से हटाने वाला बिल?: संसदीय समिति की मुहर जल्द संभव, जानें क्या है मामला

Thu, 02 Jul 2026 12:59 AM IST
अमन तिवारी पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली Published by: अमन तिवारी Updated Thu, 02 Jul 2026 12:59 AM IST
सार

प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों की गिरफ्तारी के बाद पद छोड़ने से जुड़े विधेयकों पर संसदीय समिति 17 जुलाई को अपनी रिपोर्ट स्वीकार कर सकती है। प्रस्ताव के अनुसार, गंभीर अपराध में 30 दिन तक हिरासत में रहने पर संबंधित पद स्वतः समाप्त हो जाएगा, जबकि विपक्ष ने इसका विरोध किया है।

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संसदीय समिति - फोटो : ANI

विस्तार

संसदीय समिति उन विधेयकों पर अपनी रिपोर्ट 17 जुलाई को स्वीकार कर सकती है, जिनमें आपराधिक आरोपों में गिरफ्तार प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों को पद से हटाने का प्रावधान है। सूत्रों के मुताबिक, समिति इस रिपोर्ट को संसद के मानसून सत्र में लोकसभा में पेश करेगी। मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होने की संभावना है। अगर सरकार चाहे तो संसद में पेश करने से पहले केंद्रीय कैबिनेट इन विधेयकों को मंजूरी दे सकती है।
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क्या है नया प्रावधान?
इन विधेयकों में एक बड़ा बदलाव प्रस्तावित है। अगर प्रधानमंत्री, कोई केंद्रीय मंत्री या मुख्यमंत्री गिरफ्तार होते हैं और लगातार 30 दिनों तक हिरासत में रहते हैं, तो उन्हें अपना पद छोड़ना होगा। यह नियम उन अपराधों पर लागू होगा जिनमें कम से कम पांच साल की जेल की सजा का प्रावधान है। ऐसे मामलों में गिरफ्तारी के 31वें दिन संबंधित व्यक्ति की कुर्सी अपने आप चली जाएगी।
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समिति की तैयारी और बैठक
भाजपा सांसद अपराजिता सारंगी इस संयुक्त संसदीय समिति की अध्यक्षता कर रही हैं। समिति ने अपनी रिपोर्ट तैयार करने से पहले कानूनी विशेषज्ञों, रिटायर्ड जजों, वकीलों, सरकारी अधिकारियों और राजनीतिक नेताओं से लंबी चर्चा की है। अपराजिता सारंगी ने पहले कहा था कि राजनीति को अपराध मुक्त करने की जरूरत पर समिति में सभी की राय एक जैसी थी।
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विपक्ष ने उठाए सवाल
विपक्ष के कई दलों ने इस समिति से दूरी बना ली है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि ये विधेयक कानून के उस बुनियादी सिद्धांत के खिलाफ हैं, जिसमें किसी व्यक्ति को तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक उसका दोष साबित न हो जाए। विपक्ष का आरोप है कि इन विधेयकों का मकसद उन राज्यों को अस्थिर करना है जहां एनडीए की सरकार नहीं है।

एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि संविधान में यह बदलाव सरकारों को अस्थिर करने के लिए किया जा रहा है। कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने भी इसे आपराधिक न्याय प्रणाली के खिलाफ बताया। उन्होंने कहा कि इससे राजनीतिक दुरुपयोग के दरवाजे खुल जाएंगे और संवैधानिक सुरक्षा खत्म हो जाएगी। वहीं, आरएसपी सांसद एन के प्रेमचंद्रन ने इन विधेयकों को जल्दबाजी में लाने पर सवाल उठाए।

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केंद्र शासित प्रदेशों के नियमों में बदलाव
सरकार ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश सरकार (संशोधन) विधेयक भी पेश किए हैं। मौजूदा नियमों के मुताबिक, केंद्र शासित प्रदेशों में गिरफ्तार मुख्यमंत्री या मंत्री को हटाने का कोई स्पष्ट कानूनी प्रावधान नहीं है। इसलिए सरकार 1963 के अधिनियम की धारा 45 में बदलाव करना चाहती है ताकि ऐसे मामलों में कानूनी ढांचा तैयार किया जा सके।

31 सदस्यों वाली इस समिति में भाजपा और उसके सहयोगियों का बहुमत है। विपक्ष की ओर से केवल सुप्रिया सुले, असदुद्दीन ओवैसी और एस निरंजन रेड्डी ही इसमें शामिल हैं। पिछले साल अगस्त में केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने ये विधेयक लोकसभा में पेश किए थे, जिसके बाद इन्हें समिति के पास भेजा गया था।
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