अभिभावक नहीं चाहते खुलें स्कूल, विशेषज्ञ जता रहे मनोवैज्ञानिक नुकसान की आशंका
- बच्चों के घर पर रहने से उनमें पैदा हो रही मानसिक तनाव की समस्या,
- टीवी, मोबाइल पर ज्यादा समय बिताने से भी हो रहा नुकसान
विस्तार
स्कूलों के सामान्य सत्र में अप्रैल माह तक नई कक्षाएं शुरू हो जाती हैं और जुलाई-अगस्त तक पहली टर्मिनल परीक्षाएं हो जाती हैं। इस प्रकार अब तक शिक्षा सत्र का न्यूनतम तीन महीने का नुकसान हो चुका है। कोरोना संकट के कारण आधा अगस्त बीत जाने के बाद भी अभी तक साफ नहीं हो पाया है कि स्कूलों को दुबारा खोलने का निर्णय कब तक लिया जा सकेगा।
सरकार ऑनलाइन और ऑफलाइन मोड में कुछ बदलावों के साथ स्कूलों को खोलने पर विचार कर रही है, लेकिन अभिभावक स्कूलों को खोलने के पक्ष में नहीं हैं। ज्यादातर अभिभावकों का कहना है कि जब तक कोरोना संकट टल नहीं जाता है, स्कूलों को खोलने का फैसला लेना सही नहीं होगा।
ऑल इंडिया पेरेंट्स एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष अधिवक्ता अशोक अग्रवाल का कहना है कि शिक्षा हमारी जिंदगी का बहुत महत्वपूर्ण पक्ष है, लेकिन किसी भी स्थिति में यह बच्चे की जिंदगी से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है। अब तक कोरोना के इलाज की कोई ठोस व्यवस्था नहीं हो सकी है और देश में कोरोना के मामले रोज रिकॉर्ड गति से बढ़ रहे हैं। ऐसे में स्कूल खोलना किसी भी तरह सही नहीं होगा।
ऑनलाइन माध्यम से बच्चों की शिक्षा आगे बढ़ाने की कोशिश अवश्य की जा रही है, कुछ मामलों में यह सफल भी हो रही है, लेकिन इसकी शुरुआत से ही अनेक समस्याएं सामने आ रही हैं। गरीबों, दिव्यांग छात्रों, सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले छात्रों तक अभी भी स्मार्ट क्लास से शिक्षा लेने की व्यवस्था नहीं है। ऐसे में यह सिस्टम भी कुछ बच्चों के लिए बहुत सीमित लाभ देने वाला साबित हो रहा है।
वहीं, ऑनलाइन क्लास के कारण छात्र मोबाइल या कंप्यूटर पर ज्यादा समय गुजार रहे हैं जो उनके लिए अतिरिक्त समस्याएं पैदा कर रहा है। विशेषकर छोटे बच्चों में इसे लेकर बोरियत देखी जा रही है। इन समस्याओं को देखते हुए क्लास शुरू करने का निर्णय उचित नहीं माना जा सकता।
एक्सपर्ट बता रहे होगा नुकसान
सर गंगाराम अस्पताल के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉक्टर मनीष जैन के मुताबिक कोरोना से बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उपाय करके स्कूल खोलने पर विचार करना चाहिए। स्कूल न जाने से भी बच्चों के शारीरिक, मानसिक विकास पर असर पड़ रहा है।
जहां तक कोरोना संक्रमण की बात है, अगर परिवार का एक भी सदस्य घर के बाहर जाता है और उसके बाद वापस आता है, तो उसके जरिए भी बच्चे तक संक्रमण फैलने का उतना ही खतरा रहता है, जितना कि बच्चे के स्कूल जाने से हो सकता है।
ऐसी स्थिति में विभिन्न पक्षों पर विचार करते हुए स्कूलों को खोलने की कोशिश की जानी चाहिए। कक्षा में बच्चों की संख्या, कई चरणों में स्कूल चलाना, ऑनलाइन और ऑफलाइन मिक्स्ड सिस्टम से पढ़ाई कराना विकल्प हो सकता है।
कोरोना के मामले में अब तक देखा गया है कि बहुत सुरक्षित वातावरण में रहने वाले उच्चस्तरीय लोग, पीपीई किट पहने रहने वाले डॉक्टर तक कोरोना संक्रमण की चपेट में आ रहे हैं। वहीं, दिल्ली के सीरो सर्वे के नतीजे बताते हैं कि लाखों लोग बिना इलाज के ही इसकी चपेट में आकर ठीक भी हो रहे हैं।
इन मामलों में मौत का आंकड़ा भी बेहद कम है, इसलिए तमाम पहलुओं पर विचार करते हुए और सुरक्षा के उचित उपाय करते हुए सरकार को स्कूलों को खोलने का निर्णय करना चाहिए।