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भारत को इमरान जितना जानते हैं, पाकिस्तान का कोई नेता नहीं जानता
बीबीसी हिंदी
Updated Fri, 27 Jul 2018 01:36 AM IST
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imran khan
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पाकिस्तान को 1992 के क्रिकेट वर्ल्ड कप में जीत दिलाने वाले कप्तान और तहरीके इंसाफ पार्टी के प्रमुख इमरान खान ने आम चुनाव में जीत दावा किया है। अब तक आए नतीजों और रुझान में उनकी पार्टी बहुमत से कुछ सीट पीछे है। इमरान खान कुछ छोटी पार्टियों के साथ मिल कर सरकार बना सकते हैं।
पाकिस्तान में बुधवार (25 जुलाई ) को केंद्रीय असेंबली की 270 सामान्य सीटों के लिए मतदान हुए। इमरान खान ने गुरुवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा कि वो पाकिस्तान को उस तरह का मुल्क बनाने चाहते हैं जहां एक कमजोर भी उनके साथ खड़ा हो सके।
उन्होंने पाकिस्तान में कानून का शासन स्थापित करने का भी वादा किया। इमरान खान ने देश में व्यापार और निवेश बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करने की बात की और कहा कि वो चाहते हैं कि पाकिस्तानी मुद्रा की स्थिति को दुरुस्त किया जाए।
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माना जाता है कि पाकिस्तान का पड़ोसी होने के कारण वहां के हालात का सीधा असर भारत पर पड़ सकता है। इमरान खान ने अपने भाषण में ये संकेत दिया है कि भारत और पाकिस्तान के रिश्ते अच्छे होंगे तो ये दोनों देशों के लिए बेहतर होगा।
भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के बाद से दोनों मुल्कों में हमेशा से तनाव रहा है और ऐसे में आने वाले वक्त में भारत के साथ पाकिस्तान के संबंधों की दिशा कैसी रहेगी इस ओर सभी की निगाहें हैं।
इमरान खान ने कहा, "मैं चाहता हूं कि हमारे व्यापारिक संबंध और बेहतर हों। कश्मीर में जो हालात हैं, वहां के लोगों ने जो झेला है, हमारी कोशिश होगी कि दोनों देश एक साथ बैठ कर तय करें कि वहां की स्थिति कैसे बेहतर की जाए।" इमरान खान ने माना कि दोनों देश एक दूसरे को ही जिम्मेदार ठहराते आए हैं, लेकिन ये खत्म होना चाहिए और दोनों मुल्कों में दोस्ती होनी चाहिए।
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पाकिस्तान में बुधवार (25 जुलाई ) को केंद्रीय असेंबली की 270 सामान्य सीटों के लिए मतदान हुए। इमरान खान ने गुरुवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा कि वो पाकिस्तान को उस तरह का मुल्क बनाने चाहते हैं जहां एक कमजोर भी उनके साथ खड़ा हो सके।
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उन्होंने पाकिस्तान में कानून का शासन स्थापित करने का भी वादा किया। इमरान खान ने देश में व्यापार और निवेश बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करने की बात की और कहा कि वो चाहते हैं कि पाकिस्तानी मुद्रा की स्थिति को दुरुस्त किया जाए।
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माना जाता है कि पाकिस्तान का पड़ोसी होने के कारण वहां के हालात का सीधा असर भारत पर पड़ सकता है। इमरान खान ने अपने भाषण में ये संकेत दिया है कि भारत और पाकिस्तान के रिश्ते अच्छे होंगे तो ये दोनों देशों के लिए बेहतर होगा।
भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के बाद से दोनों मुल्कों में हमेशा से तनाव रहा है और ऐसे में आने वाले वक्त में भारत के साथ पाकिस्तान के संबंधों की दिशा कैसी रहेगी इस ओर सभी की निगाहें हैं।
इमरान खान ने कहा, "मैं चाहता हूं कि हमारे व्यापारिक संबंध और बेहतर हों। कश्मीर में जो हालात हैं, वहां के लोगों ने जो झेला है, हमारी कोशिश होगी कि दोनों देश एक साथ बैठ कर तय करें कि वहां की स्थिति कैसे बेहतर की जाए।" इमरान खान ने माना कि दोनों देश एक दूसरे को ही जिम्मेदार ठहराते आए हैं, लेकिन ये खत्म होना चाहिए और दोनों मुल्कों में दोस्ती होनी चाहिए।
Imran Khan
अभियान में चाहे जो कहें, बात करनी ही पड़ती है
बीबीसी से बात करते हुए वरिष्ठ पत्रकार सुहासिनी हैदर ने उम्मीद जताई कि हो सकता है कि इमरान खान के सत्ता में आने के बाद भारत-पाकिस्तान के रिश्ते एक बार फिर से पटरी पर आ जाएं। हालांकि पुख्ता तौर पर कुछ कहना मुश्किल काम है। वो मानती हैं कि इस बार पाकिस्तान में युवाओं और नए वोटरों ने एक नई सोच और विकास के वादों को चुना है।
यहां धार्मिक रुझान रखने वाली पार्टियों और कट्टरपंथ की तरफ रुझान रखने वाली पार्टियों को चुनाव में अधिक फायदा होता नहीं दिखा है। लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद की नई पार्टी अल्लाह हू अकबर तहरीक पार्टी ने चुनाव में कुल 265 उम्मीदवार खड़े किए थे। लेकिन इनमें से कोई भी जीत हासिल नहीं कर सका।
धार्मिक मानी जाने वाली पार्टियों के गठबंधन मुत्ताहिदा मजलिसे-अमल को भी दस से कम सीटों पर बढ़त मिली है। सुहासिनी के मुताबिक पाकिस्तान में विपक्ष, पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पार्टी मुस्लिम लीग (नवाज) और आसिफ अली जरदारी की पीपुल्स पार्टी पर भारत के करीबी होने का आरोप लगाता रहा है, लेकिन सत्ता संभालने के बाद स्थितियां बदलेंगी।
इमरान खान जब वोट देकर बूथ से बाहर निकले थे तब उन्होंने कहा था, "नवाज शरीफ़ भारतीय प्रधानमंत्री मोदी और भारतीय मीडिया के पसंदीदा हैं।" बुधवार को एक ट्वीट में उनकी पार्टी पीटीआई ने लिखा था, "नवाज शरीफ़ ने हमारे सुरक्षाबलों पर हमले करने वाली बाहरी ताकतों की हरसंभव मदद करने की कोशिश की है। मोदी नवाज शरीफ को पसंद करते हैं लेकिन देश की फौज को नहीं।"
सुहासिनी हैदर ने कहा , "इमरान खान अपने चुनाव अभियान के दौरान कहते रहे हैं कि मैं अगर प्रधानमंत्री बना तो स्वतंत्र पीएम बनूंगा और पाकिस्तान के हक में बात करूंगा। लेकिन प्रधानमंत्री कोई भी बने कुछ वक्त के बाद वो भारत के साथ किसी ना किसी तरीके से बात करता ही है।"
इमरान भारत को बेहतर जानते हैं
अंतरराष्ट्रीय मीडिया में इमरान खान की छवि एक क्रिकेटर के तौर पर अच्छी है लेकिन एक नेता के तौर पर उन्हें 'तालिबानी खान' कहा जाता है। उनकी इस छवि का असर क्या सरकार पर पड़ सकता है?
इस सवाल पर सुहासिनी हैदर कहती हैं, "ये बात सच है कि उन्हें वामपंथी और पॉपुलिस्ट नेता कहा जाता है। लेकिन फिलहाल इस दौर में दुनिया के कई देशों, जैसे अमरीका, तुर्की, ब्रिटेन में दक्षिणपंथ का उभार देखा जा रहा है। भारत में बीजेपी के उभरने को इसी कड़ी में देखा जा सकता है और इमरान खान भी इसी मॉडल में फिट होते हैं। वो कट्टरपंथियों और युवाओं दोनों को साथ ले कर चलते हैं।"
"लेकिन देखा जाए तो भारत के साथ सबसे लंबा और बेहतर संबंध रखने वाले इमरान खान ही हैं, पहले क्रिकेटर के तौर पर और फिर एक कमेंटेटर के तौर पर वो भारत से जुड़े रहे हैं। ये कहा जा सकता है कि भारत के बारे में वो जितना जानते हैं शायद कोई और पाकिस्तानी नेता नहीं जानता होगा।"
वो कहती हैं कि ये बात भी सच है कि क्रिकेटर और जानकार के तौर पर भारत के साथ संबंध रखना एक मुल्क के नेता के तौर पर संबंध रखने से अलग है। प्रधानमंत्री बनने के बाद एक राजनेता के तौर पर इमरान खान का भारत के प्रति क्या रवैया रह सकता है ?
इस पर सुहासिनी हैदर कहती हैं, "एक नेता के तौर पर वो कोई एजेंडा ले कर काम नहीं कर सकते। मौजूदा वक्त में ये जरूर होना चाहिए कि पहले जानें कि वहां फिलहाल प्रशासन क्या चाहता है। खास कर तब जब पाकिस्तान सरकार हमेशा से कहती आई है कि भारत के साथ उनकी विदेश नीति में सेना की भूमिका अहम होती है।"
ये भी गौर करने वाली बात है कि इस तरह के आरोप पहले से ही लगते रहे हैं कि पाकिस्तान की राजनीति में, खास कर विदेश नीति में सेना का हस्तक्षेप मायने रखता है।"11 दिसंबर 2015 को इमरान खान ने दिल्ली में प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की थी। दोनों के बीच और घनिष्ठ संबंध बनाने पर बात हुई थी।
बीबीसी से बात करते हुए वरिष्ठ पत्रकार सुहासिनी हैदर ने उम्मीद जताई कि हो सकता है कि इमरान खान के सत्ता में आने के बाद भारत-पाकिस्तान के रिश्ते एक बार फिर से पटरी पर आ जाएं। हालांकि पुख्ता तौर पर कुछ कहना मुश्किल काम है। वो मानती हैं कि इस बार पाकिस्तान में युवाओं और नए वोटरों ने एक नई सोच और विकास के वादों को चुना है।
यहां धार्मिक रुझान रखने वाली पार्टियों और कट्टरपंथ की तरफ रुझान रखने वाली पार्टियों को चुनाव में अधिक फायदा होता नहीं दिखा है। लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद की नई पार्टी अल्लाह हू अकबर तहरीक पार्टी ने चुनाव में कुल 265 उम्मीदवार खड़े किए थे। लेकिन इनमें से कोई भी जीत हासिल नहीं कर सका।
धार्मिक मानी जाने वाली पार्टियों के गठबंधन मुत्ताहिदा मजलिसे-अमल को भी दस से कम सीटों पर बढ़त मिली है। सुहासिनी के मुताबिक पाकिस्तान में विपक्ष, पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पार्टी मुस्लिम लीग (नवाज) और आसिफ अली जरदारी की पीपुल्स पार्टी पर भारत के करीबी होने का आरोप लगाता रहा है, लेकिन सत्ता संभालने के बाद स्थितियां बदलेंगी।
इमरान खान जब वोट देकर बूथ से बाहर निकले थे तब उन्होंने कहा था, "नवाज शरीफ़ भारतीय प्रधानमंत्री मोदी और भारतीय मीडिया के पसंदीदा हैं।" बुधवार को एक ट्वीट में उनकी पार्टी पीटीआई ने लिखा था, "नवाज शरीफ़ ने हमारे सुरक्षाबलों पर हमले करने वाली बाहरी ताकतों की हरसंभव मदद करने की कोशिश की है। मोदी नवाज शरीफ को पसंद करते हैं लेकिन देश की फौज को नहीं।"
सुहासिनी हैदर ने कहा , "इमरान खान अपने चुनाव अभियान के दौरान कहते रहे हैं कि मैं अगर प्रधानमंत्री बना तो स्वतंत्र पीएम बनूंगा और पाकिस्तान के हक में बात करूंगा। लेकिन प्रधानमंत्री कोई भी बने कुछ वक्त के बाद वो भारत के साथ किसी ना किसी तरीके से बात करता ही है।"
इमरान भारत को बेहतर जानते हैं
अंतरराष्ट्रीय मीडिया में इमरान खान की छवि एक क्रिकेटर के तौर पर अच्छी है लेकिन एक नेता के तौर पर उन्हें 'तालिबानी खान' कहा जाता है। उनकी इस छवि का असर क्या सरकार पर पड़ सकता है?
इस सवाल पर सुहासिनी हैदर कहती हैं, "ये बात सच है कि उन्हें वामपंथी और पॉपुलिस्ट नेता कहा जाता है। लेकिन फिलहाल इस दौर में दुनिया के कई देशों, जैसे अमरीका, तुर्की, ब्रिटेन में दक्षिणपंथ का उभार देखा जा रहा है। भारत में बीजेपी के उभरने को इसी कड़ी में देखा जा सकता है और इमरान खान भी इसी मॉडल में फिट होते हैं। वो कट्टरपंथियों और युवाओं दोनों को साथ ले कर चलते हैं।"
"लेकिन देखा जाए तो भारत के साथ सबसे लंबा और बेहतर संबंध रखने वाले इमरान खान ही हैं, पहले क्रिकेटर के तौर पर और फिर एक कमेंटेटर के तौर पर वो भारत से जुड़े रहे हैं। ये कहा जा सकता है कि भारत के बारे में वो जितना जानते हैं शायद कोई और पाकिस्तानी नेता नहीं जानता होगा।"
वो कहती हैं कि ये बात भी सच है कि क्रिकेटर और जानकार के तौर पर भारत के साथ संबंध रखना एक मुल्क के नेता के तौर पर संबंध रखने से अलग है। प्रधानमंत्री बनने के बाद एक राजनेता के तौर पर इमरान खान का भारत के प्रति क्या रवैया रह सकता है ?
इस पर सुहासिनी हैदर कहती हैं, "एक नेता के तौर पर वो कोई एजेंडा ले कर काम नहीं कर सकते। मौजूदा वक्त में ये जरूर होना चाहिए कि पहले जानें कि वहां फिलहाल प्रशासन क्या चाहता है। खास कर तब जब पाकिस्तान सरकार हमेशा से कहती आई है कि भारत के साथ उनकी विदेश नीति में सेना की भूमिका अहम होती है।"
ये भी गौर करने वाली बात है कि इस तरह के आरोप पहले से ही लगते रहे हैं कि पाकिस्तान की राजनीति में, खास कर विदेश नीति में सेना का हस्तक्षेप मायने रखता है।"11 दिसंबर 2015 को इमरान खान ने दिल्ली में प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की थी। दोनों के बीच और घनिष्ठ संबंध बनाने पर बात हुई थी।
इमरान खान और कपिल देव एक कार्यक्रम में बात करते हुए
व्यापार बढ़ान चाहते थे इमरान खान
ये भी नहीं भूला जा सकता है कि 2015 में जब इमरान खान भारत आए थे और उन्होंने मोदी से मुलाकात की थी उन्होंने दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ाने और द्विपक्षीय बातचीत बढ़ाने पर जोर दिया था। सुहासिनी हैदर कहती हैं, "इससे पहले इमरान ने एक बार ये भी कहा था कि पूर्व प्रधानमंत्री परवेज मुशर्रफ़ के शासन के दौरान भारत-पाकिस्तान रिश्तों को भी एक बार फिर से देखा जाना चाहिए।"
माना जाए तो मुशर्रफ़ के शासनकाल के दौरान दोनों देशों के बीच दोस्ती बढ़ी थी। दोनों देशों के बीच तनाव होने के बावजूद इस दौरान कई बार बातचीत हुई थी। मुशर्रफ इस दौरान आगरा में दो दिवसीय सम्मेलन के लिए भी पहुंचे थे। "रही बात पाकिस्तानी सेना का तो ये बात याद रखनी पड़ेगी कि वहां जो भी चुनाव जीत के आएगा उसे कहीं ना कहीं सेना का समर्थन होगा ही। वहां पर सेना की भूमिका काफी अहम मानी जाती है।"
"इमरान खान पर भी सेना की पसंदीदा उम्मीदवार होने का आरोप लगा है। लेकिन फिर भी भारत को प्रशासन और सेना दोनों से ही बातचीत आगे बढ़ानी होगी।" 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अफगानिस्तान से लौटते हुए नवाज शरीफ से मिलने के लिए अचानक लाहौर में उतर गए थे
मोदी के चुनावी अभियान को याद करें तो अभियान में उन्होने पाकिस्तान के बारे में कई बातें कहीं और सरकार की विदेश नीति की भी आलोचना की।
लेकिन जब वो नेता बन कर आए तो उन्होंने एक अलग तरह की कूटनीत दिखाई। कभी वो अचानक पाकिस्तान जा कर नवाज शरीफ से मिले तो कभी उन्होंने अंतरराष्ट्रीय बैठकों के दौरान उनसे बात नहीं की। फिलहाल नहीं कहा जा सकता कि दोनों रिश्ते किस करवट बैठेंगे लेकिन काफी कुछ नेता के अपने रवैये पर भी निर्भर होता है।
ये भी नहीं भूला जा सकता है कि 2015 में जब इमरान खान भारत आए थे और उन्होंने मोदी से मुलाकात की थी उन्होंने दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ाने और द्विपक्षीय बातचीत बढ़ाने पर जोर दिया था। सुहासिनी हैदर कहती हैं, "इससे पहले इमरान ने एक बार ये भी कहा था कि पूर्व प्रधानमंत्री परवेज मुशर्रफ़ के शासन के दौरान भारत-पाकिस्तान रिश्तों को भी एक बार फिर से देखा जाना चाहिए।"
माना जाए तो मुशर्रफ़ के शासनकाल के दौरान दोनों देशों के बीच दोस्ती बढ़ी थी। दोनों देशों के बीच तनाव होने के बावजूद इस दौरान कई बार बातचीत हुई थी। मुशर्रफ इस दौरान आगरा में दो दिवसीय सम्मेलन के लिए भी पहुंचे थे। "रही बात पाकिस्तानी सेना का तो ये बात याद रखनी पड़ेगी कि वहां जो भी चुनाव जीत के आएगा उसे कहीं ना कहीं सेना का समर्थन होगा ही। वहां पर सेना की भूमिका काफी अहम मानी जाती है।"
"इमरान खान पर भी सेना की पसंदीदा उम्मीदवार होने का आरोप लगा है। लेकिन फिर भी भारत को प्रशासन और सेना दोनों से ही बातचीत आगे बढ़ानी होगी।" 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अफगानिस्तान से लौटते हुए नवाज शरीफ से मिलने के लिए अचानक लाहौर में उतर गए थे
मोदी के चुनावी अभियान को याद करें तो अभियान में उन्होने पाकिस्तान के बारे में कई बातें कहीं और सरकार की विदेश नीति की भी आलोचना की।
लेकिन जब वो नेता बन कर आए तो उन्होंने एक अलग तरह की कूटनीत दिखाई। कभी वो अचानक पाकिस्तान जा कर नवाज शरीफ से मिले तो कभी उन्होंने अंतरराष्ट्रीय बैठकों के दौरान उनसे बात नहीं की। फिलहाल नहीं कहा जा सकता कि दोनों रिश्ते किस करवट बैठेंगे लेकिन काफी कुछ नेता के अपने रवैये पर भी निर्भर होता है।