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पाकिस्तान ने किया दोहा वार्ता के साथ 'खेल': तालिबान के तख्तापलट के बाद इस सच्चाई से छूटे कई देशों के पसीने!

Fri, 10 Sep 2021 11:38 AM IST
Ashish Tiwari आशीष तिवारी
Updated Fri, 10 Sep 2021 11:38 AM IST
सार

भारत के साथ हर तरीके के समझौते को लेकर आगे बढ़ने वाले तालिबानी नेता शेर मोहम्मद अब्बास स्तानिकजई को पाकिस्तान की शह पर ही सरकार में किनारे लगा दिया गया। विदेश मामलों के जानकार एलएन राव कहते हैं कि सिर्फ स्तानिकजई ही नहीं बल्कि मुल्ला बरादर को भी पाकिस्तान की शह पर ही पहले से तय पद नहीं दिया गया...

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Pakistan isi chief Faiz Hameed kabul visit make worries to India, russia, US and british spy agencies
दोहा में जलमय खलीलजाद और तालिबान नेता मुल्ला अब्दुल गनी बारादर - फोटो : PTI (File Photo)

विस्तार

बीते कुछ सालों से कतर में तालिबान के मुख्यालय में दुनिया के तमाम ताकतवर मुल्क शांति वार्ता कर रहे थे। मकसद सिर्फ यही था अगर अफगानिस्तान में तख्तापलट होता है तो तालिबानी कैसे वहां पर मानवाधिकारों की रक्षा करते हुए नई सरकार का गठन करेंगे और कोई भी जुल्म और ज्यादती नहीं करेंगे। इसके अलावा तालिबानियों के कुछ बड़े नेताओं के साथ मिलकर अमेरिका, रूस समेत ईरान जैसे देशों के जिम्मेदार अधिकारियों ने इस बात की भी सहमति कर ली थी कि अफगानिस्तान की जमीन से आतंकवाद और आतंकवादी देशों को कोई भी पनाह नहीं दी जाएगी। लेकिन दुनिया के तमाम देशों की गुजारिशों के बाद भी पाकिस्तान ने ऐसा खेल कर दिया तालिबान अपनी पुरानी राह पर ही चल रहा है। नतीजतन रूस, अमेरिका और ब्रिटेन की सुरक्षा और खुफिया एजेंसी सतर्क हो गई हैं। अफगानिस्तान के पड़ोसी मुल्क भारत में इन एजेंसियों के प्रमुखों ने आकर बातचीत की। जबकि भारत ने तालिबान और पाकिस्तान के गठजोड़ को भी उजागर किया। पाकिस्तान की शह पर ही तालिबान के उन नेताओं को भी सत्ता में महत्वपूर्ण जगह नहीं मिली, जो दुनियाभर में नए रिश्ते बनाकर चीजों को सामान्य करने की फिराक में लगे हुए थे।

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अमेरिकी भारतीय दूतावास में काम कर चुके रिटायर्ड भारतीय विदेश सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से लेकर ट्रंप के कार्यकाल में तालिबानियों से शुरू हुई बातचीत जब शांति समझौते के दौर में टेबल पर पहुंची, तो तय यही हुआ था कि अगर तालिबान सत्ता में आकर शासन करते हैं तो वहां पर न तो मानवाधिकारों का उल्लंघन होगा और न ही अफगानिस्तान की जमीन को आतंकवादियों की शरणगाह बनने दिया जाएगा। वह बताते हैं दुनिया के ताकतवर मुल्कों को इस बात का अंदाजा तो था कि अफगानिस्तान में तालिबानियों की सत्ता आते ही पाकिस्तान सबसे ज्यादा सक्रिय हो जाएगा और हुआ भी वही।
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उक्त अधिकारी का कहना है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई चीफ का काबुल दौरा दुनिया के ज्यादातर मुल्कों के लिए चिंता का विषय बन गया है। खासकर अमेरिका, ब्रिटेन और रूस को इस बात की खुफिया जानकारियां भी मिली कि पाकिस्तान ने सीधे तौर पर तालिबानियों की सत्ता में दखल देना शुरू कर दिया है। जो न सिर्फ तालिबान में खून खराबा करने के लिए काफी है, बल्कि पूरी दुनिया में अफगानिस्तान की जमीन पर आतंकवादियों की नर्सरी को बढ़ाने में पाकिस्तान पूरी तरह खाद-पानी देने की तैयारी करने लगा है। विदेश मामलों के जानकार और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अनिरुद्ध सिंह कहते हैं, आईएसआई चीफ फैज हमीद के काबुल पहुंचने के बाद से ही भारत में ब्रिटेन, अमेरिका और फ्रांस की सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों के प्रमुख का दौरा हो चुका है। वह कहते हैं इसका मतलब स्पष्ट है कि यह तीनों देश पाकिस्तान की मंशा को न सिर्फ भांप चुके हैं बल्कि उनको आने वाले दिनों में किसी बड़े खतरे की आहट भी नजर आ रही है।

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पाकिस्तान की हद से ज्यादा अफगानिस्तान में दखलअंदाजी के बाद मध्य एशिया में अस्थिरता बढ़ने की आशंका है। इसी के मद्देनजर रूस की सिक्योरिटी काउंसिल के प्रमुख जनरल निकोलाई पेत्रुशेव और भारत के सुरक्षा और खुफिया विभागों के प्रमुख जिम्मेदारों के साथ हुई बैठक में पाकिस्तान की इसी दखलअंदाजी को लेकर खुलकर चर्चा भी हुई। जानकारी के मुताबिक भारत और रूस ने अफगानिस्तान में तालिबानी सत्ता के दिखने और होने वाले दुष्प्रभाव से निपटने के लिए साझा रणनीति भी बनाई है। भारत ने रूस के सुरक्षा परिषद के प्रमुख जनरल को इस बात से भी अवगत कराया है कि पाकिस्तान का सीधा हस्तक्षेप अफगानिस्तान में तालिबानियों के साथ है। भारत ने चिंता जाहिर करते हुए रूस, अमेरिका और ब्रिटेन के सुरक्षा और खुफिया विभाग के साथ स्पष्ट तौर पर कहा है कि पाकिस्तान के दखल के साथ अफगानिस्तान की जमीन पर आतंकवाद को न सिर्फ बढ़ावा मिलेगा बल्कि मध्य एशिया समेत दक्षिण एशिया में भी अफगानिस्तान की जमीन में पनपने वाले पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का सामना करना पड़ेगा। इसके अलावा इस्लामिक चरमपंथियों विषय पर आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए अफगानिस्तान की सीमाओं से ना सिर्फ हथियार और आतंकवादियों का दूसरे मुल्कों के खिलाफ इस्तेमाल किया जाएगा, बल्कि पूरी दुनिया में अफीम और चरस की भी तस्करी शुरू हो जाएगी। जो नारको टेररिज्म को बढ़ावा देगी।

भारत के साथ हर तरीके के समझौते को लेकर आगे बढ़ने वाले तालिबानी नेता शेर मोहम्मद अब्बास स्तानिकजई को पाकिस्तान की शह पर ही सरकार में किनारे लगा दिया गया। विदेश मामलों के जानकार एलएन राव कहते हैं कि सिर्फ स्तानिकजई ही नहीं बल्कि मुल्ला बरादर को भी पाकिस्तान की शह पर ही पहले से तय पद नहीं दिया गया। राव कहते हैं कि यह तो तालिबानी नेता अमेरिका और अन्य देशों के साथ कतर में हुई शांति समझौते की बैठकों में न सिर्फ अहम भूमिका निभा रहे थे, बल्कि तालिबान के बदले हुए स्वरूप को लेकर भी आगे चलने को राजी थे। लेकिन यह बात पाकिस्तान को बर्दाश्त नहीं हुई और उसने तालिबानियों को 'पंजशीर' पर कब्जा करने के लिए न सिर्फ अपने सैन्य उपकरण उपलब्ध कराए बल्कि पंजशीर में हमले तक किए। यही वजह रही कि तालिबानियों ने पाकिस्तान पर और ज्यादा भरोसा करना शुरू कर दिया, इसी के साथ पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में अपना नया खेल करना शुरू कर दिया।
 

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