तालिबानी मायाजाल: 'आधा तीतर आधा बटेर' के चक्कर में 'पड़ोसी' भूल रहा है कि यूएस की खुफिया उड़ान का वक्त खत्म
विदेश मामलों के विशेषज्ञ सुशांत सरीन की एक मीडिया रिपोर्ट बताती है कि तालिबान की जीत के बाद पाकिस्तान अपनी खुशी नहीं छुपा पा रहा है। पाकिस्तान भी चाहता था कि अफगानिस्तान में जल्द से जल्द तालिबान का कब्जा हो जाए। अगर लड़ाई लंबी चलती तो उससे पाकिस्तान को नुकसान होता...
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अफगानिस्तान में जब से तालिबान का कब्जा हुआ है, पाकिस्तान सबसे ज्यादा खुश हो रहा है। उसे लगता है कि पिछले 20 साल तक उसने तालिबान की जो मदद की है, अब उसकी वसूली का समय आ गया है। चीन उसका साथ दे रहा है, रूस से भी रिश्ते खराब नहीं हैं। ईरान और अमेरिका जैसे देश भी दूरी बनाकर या निकटता से (अंतरराष्ट्रीय माहौल के मुताबिक) पाकिस्तान को देखते रहेंगे। पाकिस्तान को लगता है कि अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता के बाद वह अमेरिका, चीन, तालिबान और दूसरे कई देशों का चहेता बन जाएगा।
जानकारों के अनुसार, पाकिस्तान इस बात को बहुत तवज्जो देता है कि उसने लंबे समय तक अमेरिका की खुफिया उड़ानों को एयरस्पेस मुहैया कराया है। कराची बंदरगाह का भी अमेरिकी हितों के लिए इस्तेमाल हुआ है। राजनीतिक एवं सुरक्षा मामलों के जानकार कैप्टन अनिल गौर (रिटायर्ड) कहते हैं, ये 'तालिबान' का मायाजाल है। 'आधा तीतर आधा बटेर' के चक्कर में 'पड़ोसी' देश भूल रहा है कि 'पाक' से 'यूएस' की खुफिया उड़ान का वक्त अब खत्म हो गया है।
अमेरिका से विशेष आर्थिक मदद की उम्मीद अब पाक छोड़ दे
अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता को समझना आसान नहीं है। कई बातों को लेकर अभी इंतजार करना होगा। एक सप्ताह पहले तालिबान ने दोहा में जो कुछ कहा, वह उससे पलट गया है। महिलाओं की आजादी को लेकर दिए गए बयान पर भी तालिबान टिक नहीं पा रहा है। तालिबान, खुद को लेकर अभी विश्व राजनीति का माहौल तय होने की प्रतीक्षा में है। वह चाहता है कि दूसरे देशों की तरह उसे मान्यता मिले। भय का माहौल और आतंकवाद का समर्थन, इन मुद्दों को तालिबान ज्यादा गंभीरता से नहीं ले रहा है। तालिबान का मानना है कि अमेरिका को जब उससे कोई गुरेज नहीं है तो वह दूसरे देशों की ज्यादा परवाह नहीं करेगा। चीन ने तो ये बयान दे ही दिया है कि उसे तालिबान के साथ काम करने में कोई दिक्कत नहीं है। इसे दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं कि चीन, देर-सवेर तालिबान को मान्यता देने के लिए तैयार है। पाकिस्तान तो वैसे ही जश्न में डूबा है। रूस और मध्य एशियाई देश भी तालिबान के साथ शत्रुता का व्यवहार नहीं रखेंगे। रही बात, पश्चिमी देशों की, तो वे महिलाओं व अल्पसंख्यकों के साथ तालिबान के व्यवहार पर अपनी राय तय करेंगे।
विदेश मामलों के विशेषज्ञ सुशांत सरीन की एक मीडिया रिपोर्ट बताती है कि तालिबान की जीत के बाद पाकिस्तान अपनी खुशी नहीं छुपा पा रहा है। पाकिस्तान भी चाहता था कि अफगानिस्तान में जल्द से जल्द तालिबान का कब्जा हो जाए। अगर लड़ाई लंबी चलती तो उससे पाकिस्तान को नुकसान होता। वजह, पाकिस्तान और चीन की कई योजनाओं में बाधा खड़ी हो सकती थी। इनमें 'चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा' भी शामिल है। भविष्य में जो चुनौतियां आएंगी, उससे पाकिस्तान निपट लेगा। उसे उम्मीद है कि अपनी रणनीति से 'ग्रे लिस्ट' के खतरे से भी बाहर हो जाएगा। चीन और रूस के साथ उसके अच्छे संबंध हैं। अमेरिका को लेकर पाकिस्तान की सोच आज भी पहले जैसी है। वह समझता है कि अमेरिका अपनी खुफिया उड़ानों के लिए पाकिस्तान के एयरस्पेस का इस्तेमाल करता रहेगा। इससे वह अमेरिका की नजरों में कम से कम शत्रु वाली श्रेणी में तो नहीं आएगा। ऐसा संभव है कि अमेरिका आगे भी अफगानिस्तान पर नजर रखने के लिए पाकिस्तान के सैन्य स्पेस का इस्तेमाल करे।
राजनीतिक एवं सुरक्षा मामलों के जानकार कैप्टन अनिल गौर (रिटायर्ड) ने बताया, ये बात सही है कि अमेरिका की फौज जब तक अफगानिस्तान में रही, उसके लिए सामान पहुंचाने की सप्लाई चेन पाकिस्तान के जरिए संभव होती थी। दुनिया को यह भी पता है कि पाकिस्तान ने तालिबान को हर तरह की मदद दी है। अगर हम कुछ खास शब्दों में कहें तो अमेरिका ने कराची बंदरगाह का दोहन किया है। पाकिस्तान अब खुश है कि तालिबान के आने से वह फायदे में रहेगा। अफगानिस्तान में खनिज हैं, पाकिस्तान की कोशिश रहेगी कि वह उन पर कब्जा कर ले। वह खनिज निकालकर अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का प्रयास कर सकता है।
अमेरिका में पाकिस्तान का समर्थन करने के लिए कुछ लोग लॉबिंग करते हैं। उन्हें पाकिस्तान से कुछ मिलता है। अमेरिका का राजनीतिक सिस्टम इस बात से वाकिफ है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रूख तो पाकिस्तान को लेकर ठीक नहीं रहा था। कुल मिला कर देखें, तो अब अमेरिका को पाकिस्तान की उतनी जरूरत नहीं पड़ेगी। अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना 31 अगस्त तक पूरी तरह वापस लौट जाएगी। उसके बाद अमेरिका अपनी खुफिया उड़ानों के लिए पाकिस्तान के एयरस्पेस का नियमित इस्तेमाल नहीं करेगा। जब यह सब नहीं होगा तो वह पाकिस्तान को आर्थिक सहायता भी पहले की तरह नहीं देगा।
अमेरिका और रूस, दोनों देश हथियार लॉबी हैं। इन्हें तो अपने हथियार बेचने हैं। पड़ोसी देश पाकिस्तान अभी खुश हो रहा है, लेकिन लंबे समय में उसे परेशानी उठानी पड़ सकती है। हो सकता है कि आने वाले समय में पाकिस्तान में भी 'शरिया कानून' लागू करने की मांग जोर पकड़ने लगे। अगर ऐसा हुआ तो उसके लिए एक नई मुसीबत खड़ी हो जाएगी। एयरफोर्स की खुफिया उड़ान या ड्रोन, अब अमेरिका इन सबसे किसकी मदद करेगा। उसकी सेना तो वहां से जा रही है। अमेरिका अब दक्षिण चीन की तरफ ध्यान देगा। पाकिस्तान को अमेरिका से इसलिए पैसा मिलता था, क्योंकि वह अफगानिस्तान में उसकी मदद कर रहा था। अमेरिका ने उसे बीस साल तक कई तरह से बचाए रखा। उत्तरी पाकिस्तान में तालिबान वाले छिपे रहते थे। अमेरिका यह बात जानता था। ओसामा बिन लादेन भी वहीं मारा गया था। तालिबान के कब्जे के बाद अब वह कारण ही नहीं बचा है, जिसके लिए अमेरिका, अफगानिस्तान में खुफिया अड्डे बचाकर रखेगा। दो दशक तक पाकिस्तान और तालिबान ने एक दूसरे की मदद की है।
बतौर अनिल गौर, तालिबान के साथ पाकिस्तान के संबंधों की अब नए तरह से रचना होगी। पाकिस्तान में रह रहे आतंकी, जिन्होंने तालिबान का समर्थन किया है, आगे उन्हें तालिबान का कितना सहयोग मिल पाता है, ये दोनों देशों के बीच संबंधों की रूपरेखा तय करने में एक अहम फैक्टर के तौर पर काम करेगा। आने वाले दिनों में पाकिस्तान और तालिबान के संबंधों की डोर का पता चलेगा। संभव है कि तालिबान के अफगानिस्तान में, पाकिस्तान खुद के लिए जिस तरह की मनमर्जी वाली स्थिति चाहेगा, वह तालिबान को असहज अवस्था में ला सकता है।