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दिल्ली के वेंकटेश्वर कॉलेज के स्टूडेंट्स बने ‘पैडमैन’, गरीब महिलाओं के लिए बना रहे सेनेटरी पैड्स

Thu, 20 Sep 2018 12:12 AM IST
हरेन्द्र, नई दिल्ली
हरेन्द्र, नई दिल्ली Updated Thu, 20 Sep 2018 12:12 AM IST
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Padman students of Venkateswara College of Delhi
Padman
एक प्रसिद्ध कहावत है कि हिम्मत-ए-मर्दा तो मदद-ए-खुदा, यानी मेहनत करने वालों की कभी हार नहीं होती। दिल्ली के वेंकटेश्वर कॉलेज के छात्रों पर यह बिल्कुल फिट बैठती है। जिस समाज में आज भी मासिक धर्म को अछूत समझा जाता है, लोग खुलकर इस बारे में बात नहीं करना चाहते। यहां तक कि लगभग 30 करोड़ महिलाओं को सेनेटरी नैपकिन उपलब्ध तक नहीं हो पाते। इस समस्या को समझते हुए कालेज के इन युवाओं ने रियूजेबल सेनेटरी नेपकिन बना कर समाज की सेवा करने की ठानी।
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पैडमैन की लॉन्च से पहले आया आइडिया

बुधवार को दिल्ली के अशोका होटल में सार्क देशों की प्रदर्शनी में स्टॉल लगा कर बेच रहे वेंकटेश्वर कॉलेज के छात्र उनके इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य उन गरीब तबके की महिलाओं तक पहुंचना है, जो  सेनेटरी पैडों को लक्ज़री का साधन समझ कर इनके ऊपर पैसा खर्च करने से हिचकती हैं। इस प्रोजेक्ट की हेड मेहर सिंधू और अन्नया कुमार बताती हैं कि पैडमैन आने से पहले ही पिछले साल के आखिर में उनके ग्रुप में विचार विमर्श चल रहा था कि किस प्रोजेक्ट पर काम किया जाए। तभी उनके किसी साथी ने आइडिया दिया कि रियूजेबल सेनेटरी नेपकिन पर काम किया जा सकता है। जिसके बाद दिसंबर 2017 में द क्रिमसन प्रोजेक्ट की नींव रखी गई। हालांकि इस मुद्दे पर बनी प्रसिद्ध फिल्म पैडमैन साल 2018 में 25 जनवरी को रिलीज हुई थी।
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क्राउड फंडिंग से जुटाया पैसा

इकोनॉमिक्स ऑनर्स सेकेंड ईयर की छात्रा मेहर के मुताबिक इस प्रोजेक्ट के लिए उनके पास जरूरी फंड नहीं था, तो उन्होंने प्रोजेक्ट में जुड़े कुछ साथियों और क्राउड फंडिंग से पैसा जुटाने का आइडिया मिला। मेहर ने बताया कि इस साल अप्रैल में उन्होंने ऑनलाइन क्राउड फंडिंग कंपनी कैटो से संपर्क किया और अपने महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के बारे में बताया। जिसके बाद कैटो ने उन्हें अपना प्लेटफॉर्म यूज करने की मंजूरी दे दी। मात्र तीन महीने में ही उन्होंने ऑनलाइन फंडिंग के जरिए 1 लाख 41 लाख हजार रुपए एकत्र कर लिए।
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फ्री मैं बांटते हैं पैड्स

अन्नया ने बताया कि फंडिंग मिलना उनके लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी। जिसके बाद उन्होंने वसंत विहार स्थित वोकेशनल सेंटर में कुछ सिलाई मशीनों को इंस्टॉल किया और स्लम एरिया से आने वाली कुछ महिलाओं को सिलाई की ट्रेनिंग देकर रियूजेबल सेनेटरी पैड बनाने का काम शुरू कर दिया। इकोनॉमिक्स ऑनर्स सेकेंड ईयर की छात्रा अन्नया का कहना है इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य निचले तबके की महिलाओं को आर्थिक आजादी देने के साथ उनके  लिए दोबारा इस्तेमाल होने वाले सेनेटरी पैड भी मुहैया कराए जाएं। वे हर महीने दिल्ली के स्लम इलाकों में जाकर गरीब महिलाओं को फ्री में पैड्स भी बांटते हैं।  

हाइजेनिक होते हैं रियूजेबल पैड्स

इस प्रोजेक्ट से जुड़ी जूलॉजी की थर्ड ईयर की छात्रा शिखा मोहिनी बताती हैं कि हमारे लिए सबसे बड़ी चिंता की बात थी कि कैसे सस्ता और बार-बार इस्तेमाल होने वाले पैड बनाए जाएं। साथ ही वे हाइजेनिक होने के साथ उनसे रैशेज न पड़ते हों। इसके अलावा पर्यावरण के अनुकूल भी हों। शिखा के मुताबिक उनके बनाए पैड्स 100 प्रतिशत कॉटन से बने हैं और उनमें तीन लेयर हैं, सोखने के साथ-साथ लीक प्रूफ भी हैं।

30  साल में 60 हजार रुपए के पैड्स

मेहर के मुताबिक उनके बनाए सेनेटरी पेड्स की लाइफ 60-70 वॉश है, जो आराम से 2 से 3 साल चल जाते हैं और इन्हें ज्यादा मैंटिनेंस की जरूरत नहीं पड़ती। वह बताती हैं कि एक महिला को 30 साल तक मासिक धर्म होता है, और डिस्पोजेबल सेनेटरी पैड्स का खर्च हर महीने 165 रुपए आता है। तकरीबन साल में दो हजार रुपए वे डिस्पोजेबल पैड्स पर ही खर्च कर देती हैं, जिससे रैशेज के साथ पर्यावरण के लिए भी नुकसानदायक है। इस लिहाज से वे मासिक धर्म खत्म होने तक 60 हजार रुपए के पैड्स इस्तेमाल कर लेती हैं। वहीं रियूजेबल पैड्स की कीमत मात्र 200 रुपए पड़ती है, तीस साल में मात्र 10 हजार रुपए ही खर्च होते हैं।

स्वास्थ्य के लिए हानिकारक

मेहर ने बताया कि कंपनियां सेनेटरी पैड्स बनाने में डायोक्सिन कैमिकल का इस्तेमाल करती हैं, जो लीवर के लिए नुकसानदायक है और लंबे समय तक इस्तेमाल करने से यह उनके शरीर में जमा होता रहता है, जो बाद में डायबिटीज, हार्मोन असंतुलन, ओवेरियन कैंसर समेत कई स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर देता है। वहीं हर साल अकेले दिल्ली में 433 मिलियन नेपकिंस फैंके जाते हैं, जो 800 साल तक खराब हुए बिना रह सकते हैं।


लग्जरी आयटम नहीं हैं सेनेटरी पैड

शिखा बताती हैं कि मासिक धर्म में हाइजीन के विषय में जानकारी के अभाव के चलते सेनेटरी पैडों के विकल्प के रूप में ग्रामीण क्षेत्र में महिलाओं की कुल आबादी में से लगभग 75% आज भी बिना कीटाणुरहित किये हुए कपडे, बालू, और राख का उपयोग करने के लिए विवश हैं। वह कहती हैं कि निचले तबके के समाज में अधिकांश महिलाएं सेनेटरी पैडों को लक्ज़री का आइटम समझ कर उनपर पैसा खर्च करने से हिचकती हैं। उनका ये तर्क होता है कि इन्हें खरीदने का मतलब है रोजमर्रा की आधारभूत (बेसिक) जरूरत की चीजों जैसे भोजन और दूध इत्यादि के लिए पैसे नहीं बचा पाना, और इसलिए वो मासिक धर्म के समय सैनिटरी पैडों का प्रयोग करने की बजाय अस्वास्थ्यकर अवस्था में रह लेना ही बेहतर समझती हैं।
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