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OPS: पुरानी पेंशन क्यों है BJP के लिए सियासी जोखिम? कर्मचारी संगठनों के 10 करोड़ वोटों पर विपक्षी दलों की नजर

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Thu, 29 Feb 2024 07:07 PM IST
सार

अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ (एआईडीईएफ) के महासचिव सी. श्रीकुमार बताते हैं, 'पुरानी पेंशन' बहाल न करना, भाजपा के लिए सियासी जोखिम का सबब बन सकता है। लोकसभा चुनाव से पहले पुरानी पेंशन लागू नहीं होती है, तो भाजपा को उसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा...

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OPS: Why is old pension a political risk for BJP? Opposition parties eyeing on government employees
OPS - फोटो : Amar Ujala/ Sonu Kumar

विस्तार

पुरानी पेंशन बहाली के लिए गठित, नेशनल ज्वाइंट काउंसिल ऑफ एक्शन (एनजेसीए) की संचालन समिति द्वारा गठित सात सदस्यों की कमेटी ने अनिश्चितकालीन स्ट्राइक की घोषणा कर दी है। 19 मार्च को कर्मचारी संगठन, केंद्र सरकार को राष्ट्रव्यापी हड़ताल का नोटिस देंगे। इसके बाद एक मई से हड़ताल पर जाने की घोषणा की गई है। अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ (एआईडीईएफ) के महासचिव सी. श्रीकुमार बताते हैं, 'पुरानी पेंशन' बहाल न करना, भाजपा के लिए सियासी जोखिम का सबब बन सकता है। लोकसभा चुनाव से पहले पुरानी पेंशन लागू नहीं होती है, तो भाजपा को उसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। वजह, सरकारी कर्मियों, पेंशनरों और उनके रिश्तेदारों को मिलाकर यह संख्या दस करोड़ के पार चली जाती है। चुनाव में बड़ा उलटफेर करने के लिए यह संख्या निर्णायक साबित हो सकती है। कर्मचारी संगठनों के 10 करोड़ वोटों पर विपक्षी दलों की नजर है।

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ओपीएस पर विपक्षी दलों से बातचीत

सी. श्रीकुमार के मुताबिक, पुरानी पेंशन को लेकर विपक्षी दलों से बातचीत हो रही है। जो भी पार्टी अपने घोषणा पत्र में पुरानी पेंशन बहाली का वादा करती है, उसे कर्मचारियों का समर्थन मिलेगा। हालांकि कांग्रेस पार्टी सहित अधिकांश विपक्षी दलों ने ओपीएस पर अपनी राय स्पष्ट कर दी है। विपक्षी दल, ओपीएस लागू करने के पक्ष में हैं। कर्मचारी संगठनों से भी इस विषय में बात हो रही है। अगर भाजपा अपने निर्णय पर अड़िग रहती है, तो कर्मचारियों से जुड़े दस करोड़ वोट विपक्ष के खाते में जा सकते हैं। स्टाफ साइड की राष्ट्रीय परिषद 'जेसीएम' के सचिव शिवगोपाल मिश्रा भी कह चुके हैं कि लोकसभा चुनाव से पहले पुरानी पेंशन लागू नहीं होती है, तो भाजपा को उसका नुकसान उठाना पड़ेगा। दस करोड़ वोटों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। केंद्र सरकार के सभी मंत्रालय/विभाग, रक्षा कर्मी (सिविल), रेलवे, बैंक, डाक, प्राइमरी, सेकेंडरी, कालेज एवं यूनिवर्सिटी टीचर, दूसरे विभागों एवं विभिन्न निगमों और स्वायत्तशासी संगठनों के कर्मचारी, ओपीएस पर एक साथ आंदोलन कर रहे हैं।

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कर्मियों को मंजूर नहीं है एनपीएस

श्रीकुमार का कहना है कि वित्त मंत्रालय ने जो कमेटी बनाई है, उसमें 'ओपीएस' का जिक्र ही नहीं है। उसमें तो एनपीएस में सुधार की बात कही गई है। इसका मतलब है कि केंद्र सरकार, ओपीएस लागू करने के मूड में नहीं है। केंद्र सरकार द्वारा एनपीएस में चाहे, जो भी सुधार किया जाए, कर्मियों को वह मंजूर नहीं है। कर्मियों का केवल एक ही मकसद है, बिना गारंटी वाली 'एनपीएस' योजना को खत्म किया जाए और परिभाषित एवं गारंटी वाली 'पुरानी पेंशन योजना' को बहाल किया जाए। अगर सरकार नहीं मानती है, तो देश में कलम छोड़ हड़ताल होगी। रेल के पहिये रोक दिए जाएंगे। रक्षा एवं दूसरे उद्योगों में भी कामकाज नहीं होगा। साथ ही लोकसभा चुनाव में जब कर्मचारियों, पेंशनरों और उनके रिश्तेदारों की संख्या, वोट में बदलेगी तो केंद्र सरकार को कर्मियों की ताकत का अहसास होगा।

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अनिश्चितकालीन हड़ताल एक मात्र विकल्प

सी. श्रीकुमार के मुताबिक, पुरानी पेंशन बहाली के लिए केंद्र एवं राज्यों के कर्मचारी एक साथ आ गए हैं। लगभग देश के सभी कर्मचारी संगठन इस मुद्दे पर एकमत हैं। केंद्र और राज्यों के विभिन्न निगमों और स्वायत्तता प्राप्त संगठनों ने भी ओपीएस की लड़ाई में शामिल होने की बात कही है। बैंक एवं इंश्योरेंस सेक्टर के कर्मियों से भी बातचीत हुई है। कर्मचारियों ने हर तरीके से सरकार के समक्ष पुरानी पेंशन बहाली की गुहार लगाई है, लेकिन उनकी बात सुनी नहीं गई। अब उनके पास अनिश्चितकालीन हड़ताल ही एक मात्र विकल्प बचता है। कर्मचारियों ने कहा था कि वे सरकार को वह फार्मला बताने को तैयार हैं, जिसमें सरकार को ओपीएस लागू करने से कोई नुकसान नहीं होगा। अगर इसके बाद भी सरकार, पुरानी पेंशन लागू नहीं करती है तो राष्ट्रव्यापी हड़ताल जैसे कई कठोर कदम उठाए जाएंगे।

पेंशन न तो एक इनाम है और न ही अनुग्रह

भारत के सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय पीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश बीडी चंद्रचूड, जस्टिस बीडी तुलजापुरकर, जस्टिस ओ. चिन्नप्पा रेड्डी एवं जस्टिस बहारुल इस्लाम शामिल थे, के द्वारा भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत रिट पिटीशन संख्या 5939 से 5941, जिसको डीएस नाकरा एवं अन्य बनाम भारत गणराज्य के नाम से जाना जाता है, में दिनांक 17 दिसंबर 1981 को दिए गए प्रसिद्ध निर्णय का उल्लेख करना आवश्यक है। इसके पैरा 31 में कहा गया है, चर्चा से तीन बातें सामने आती हैं। एक, पेंशन न तो एक इनाम है, और न ही अनुग्रह की बात है, जो कि नियोक्ता की इच्छा पर निर्भर हो। यह 1972 के नियमों के अधीन, एक निहित अधिकार है, जो प्रकृति में वैधानिक है, क्योंकि उन्हें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 148 के खंड '50' का प्रयोग करते हुए अधिनियमित किया गया है। पेंशन, अनुग्रह राशि का भुगतान नहीं है, बल्कि यह पूर्व सेवा के लिए भुगतान है। यह उन लोगों के लिए सामाजिक, आर्थिक न्याय प्रदान करने वाला एक सामाजिक कल्याणकारी उपाय है, जिन्होंने अपने जीवन के सुनहरे दिनों में, नियोक्ता के इस आश्वासन पर लगातार कड़ी मेहनत की है कि उनके बुढ़ापे में उन्हें ठोकरें खाने के लिए नहीं छोड़ दिया जाएगा।

एनपीएस में रिटायर्ड कर्मियों को मिली इतनी पेंशन

एनपीएस में कर्मियों जो पेंशन मिल रही है, उतनी तो बुढ़ावा पेंशन ही है। एनपीएस स्कीम में शामिल कर्मी, 18 साल बाद रिटायर हो रहे हैं, उन्हें क्या मिला है। एक कर्मी को एनपीएस में 2417 रुपये मासिक पेंशन मिली है, दूसरे को 2506 रुपये और तीसरे कर्मी को 4,900 रुपये प्रतिमाह की पेंशन मिली है। अगर यही कर्मचारी पुरानी पेंशन व्यवस्था के दायरे में होते तो उन्हें प्रतिमाह क्रमश: 15250 रुपये, 17150 रुपये और 28450 रुपये मिलते। एनपीएस में कर्मियों द्वारा हर माह अपने वेतन का दस फीसदी शेयर डालने के बाद भी उन्हें रिटायरमेंट पर मामूली सी पेंशन मिलती है। इस शेयर को 14 या 24 फीसदी तक बढ़ाने का कोई फायदा नहीं होगा। एआईडीईएफ के महासचिव सी. श्रीकुमार के मुताबिक, एनपीएस में पुरानी पेंशन व्यवस्था की तरह महंगाई राहत का भी कोई प्रावधान नहीं है। जो कर्मचारी पुरानी पेंशन व्यवस्था के दायरे में आते हैं, उन्हें महंगाई राहत के तौर पर आर्थिक फायदा मिलता है। एनपीएस में सामाजिक सुरक्षा की गारंटी भी नहीं रही। रिटायरमेंट के बाद सरकारी कर्मियों को जानबूझकर कष्टों में धकेला जा रहा है।

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