Opposition meet: विपक्ष में खटपट की 'नो टेंशन', तैयार है 'बफर जोन', एकता को टूटने नहीं देगी 5 नेताओं की ये टीम
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विस्तार
'विपक्षी कुनबा' अब लंबी पारी खेलने के लिए खुद को तैयार कर रहा है। बेंगलुरु में 26 पार्टियों के नेता एक साथ बैठकर चर्चा कर रहे हैं। कुछ दलों के बीच मन की दूरी है, मगर उसे कम करने का भी तंत्र विकसित किया जा रहा है। विपक्षी कुनबे में अगर कभी कोई 'खटपट' होती है तो चिंता की बात नहीं होगी। ऐसे दलों के चलते विपक्षी एकता को नुकसान न हो, इसके लिए एक 'बफर जोन' तैयार किया गया है। जो नेता किसी वजह से खुद को आम सहमति के दायरे से बाहर रखना चाहते हैं, तो उनके लिए यह 'बफर जोन' मददगार साबित होगा। यानी वे विपक्षी कुनबे को छोड़कर जाने की बजाए अपने तर्क को बफर जोन में छोड़ दें। कोई दल 'जिद' करता है, तो उसे भी कुछ समय इसी जोन का हिस्सा बनाया जा सकता है। जो दल या नेता बफर जोन में रहेगा, उसकी बात पर विचार करने के लिए पांच नेताओं की 'एक्शन' टीम बनाई गई है। इसमें मल्लिकार्जुन खरगे, ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, शरद पवार और लालू प्रसाद यादव शामिल हैं।
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विभिन्न दलों के बीच पूर्ण सहमति का अभाव
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, विपक्षी एकता के लिए भले ही तमाम प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन कुछ मुद्दों पर अभी तक विभिन्न दलों के बीच पूर्ण सहमति नहीं बन सकी है। केंद्रीय जांच एजेंसियों का दुरुपयोग, महंगाई या संसद में विपक्ष को बोलने का पूरा मौका न दिया जाना, इन मुद्दों पर विपक्षी कुनबा एकमत है। इसके बाद जो सबसे बड़ी चुनौती बचती है, वह है लोकसभा चुनाव में सीटों का बंटवारा। जम्मू कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने विपक्षी दलों को सलाह दी है कि वे गंभीरता के साथ भाजपा को टक्कर देना चाहते हैं, तो उन्हें 'एक सीट, एक उम्मीदवार' का फॉर्मूला अपनाना पड़ेगा। विपक्षी दलों का इस फॉर्मूले पर काम करना आसान नहीं है। संभव है कि आने वाले समय में सीटों के बंटवारे को लेकर ही विपक्ष में अनबन हो जाए। उस स्थिति से निपटने के लिए विपक्षी कुनबे ने पांच ऐसे नेताओं की एक्शन टीम तैयार की है, जो सभी लोगों से बातचीत कर सकते हैं।
एक्शन टीम में खास हैं मल्लिकार्जुन खरगे
सोनिया गांधी को इस टीम पर कोई ऐतराज नहीं है। बेंगलुरु की बैठक से पहले कई विपक्षी नेताओं की नाराजगी सामने आ रही थी। कहा जा रहा था कि कई नेता, बैठक से गैर हाजिर रहेंगे। हालांकि ऐसा हुआ नहीं। ममता बनर्जी के बारे में कहा गया कि वे स्वास्थ्य कारणों के चलते बैठक में नहीं आ सकेंगी। आप संयोजक अरविंद केजरीवाल भी बैठक में आने के लिए 48 घंटे पहले तक अपनी सहमति नहीं दे सके थे। शरद पवार को लेकर भी आशंका जाहिर की गई थी। कांग्रेस पार्टी की राजनीति को करीब से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक रशीद किदवई कहते हैं, देखिये इस बार विपक्षी नेता बहुत सोच विचारकर कदम रख रहे हैं। उन्हें मालूम है कि ये राह आसान नहीं है। मल्लिकार्जुन खरगे को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया, तो इसके पीछे एक बड़ा कारण है। वे सभी दलों के नेताओं से बात कर सकते हैं। अगर किसी नेता की राहुल या सोनिया गांधी से पटरी नहीं बैठ रही, तो उनसे खरगे बात करते हैं। खरगे के पास करीब छह दशक का लंबा अनुभव है। इसका लाभ न केवल कांग्रेस को मिल रहा है, बल्कि विपक्षी एकता के लिए तैयार हुए कुनबे को भी उनकी रणनीति असरदार दिखाई दे रही है। मंगलवार को खरगे ने बेंगलुरु में कह दिया कि हमें सत्ता का लोभ नहीं है।
ममता और सोनिया के बीच मधुर संबंध रहे हैं
ममता बनर्जी और सोनिया के बीच हमेशा से सौहार्दपूर्ण संबंध रहा है। गत विधानसभा चुनाव में जब दीदी ने जीत हासिल की तो उसके बाद वे दिल्ली में सोनिया से मिली थीं। राजीव गांधी के समय से ही ममता और सोनिया के बीच मधुर संबंध रहे हैं। स्व. राजीव गांधी उन्हें अपनी छोटी बहन मानते थे। उन्होंने दीदी को यूथ कांग्रेस के महासचिव पद की जिम्मेदारी सौंपी। उन्हें मंत्री बनाया और मुसीबत के वक्त साथ दिया। नब्बे के दशक में जब ममता पर बेरहमी से हमला किया गया, तो राजीव गांधी ने उनके इलाज की व्यवस्था की थी। वे कई दिनों तक वुडलैंड्स अस्पताल में भर्ती रहीं। गांधी परिवार ने उनकी खूब देखभाल की। इसके बाद उनके रिश्ते और ज्यादा मजबूत हो गए। राजीव गांधी की हत्या के बाद 1996 में उन्होंने कांग्रेस पार्टी छोड़ी थी। इसके बाद भी सोनिया के साथ उनके रिश्ते कायम रहे। अब विपक्षी एकता के मामले में जब सोनिया गांधी ने पहल की है तो ममता बनर्जी, बेंगलुरु की बैठक में आ गईं।
बफर जोन में पांच नेताओं की एक्शन टीम
विपक्षी एकता के लिए जो बफर जोन तैयार किया गया है, उसका सीधा मतलब है कि अंदर के विवाद बाहर न जाएं। वे नेता मीडिया में कोई बयान न दें। जिस बात पर विवाद है, उस पर चुप रहें और एक्शन टीम के निर्णय का इंतजार करें। मल्लिकार्जुन खरगे, शरद पवार, लालू प्रसाद यादव, ममता बनर्जी और नीतीश कुमार, सुलझे हुए नेता हैं। विपक्षी खेमें में इन नेताओं की सबके साथ बातचीत है। जब केजरीवाल इस बैठक में शामिल होने को लेकर आनाकानी कर रहे थे, तो नीतीश कुमार और ममता बनर्जी ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई। इस बाबत सोनिया गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे से बात की गई। कांग्रेस पार्टी ने केजरीवाल की बात मानकर उन्हें अध्यादेश को लेकर समर्थन दे दिया। राहुल गांधी और लालू प्रसाद यादव के बीच रिश्ते अच्छे रहे हैं। वे किसी भी मुद्दे पर राहुल से बात कर सकते हैं।
रशीद किदवई कहते है, विपक्षी एकता को आगे बढ़ाने के लिए जो प्लेटफार्म तैयार होगा, संभव है कि उसकी जिम्मेदारी सोनिया गांधी को मिल जाए। आरजेडी, पीडीपी व डीएमके सहित कई पार्टियों को कांग्रेस साधेगी। जिन दलों के साथ कांग्रेस पार्टी के नेता, खुद को असहज महसूस करते हैं, उनसे ममता बनर्जी और नीतीश कुमार बातचीत करेंगे। के. चंद्रशेखर राव से नीतीश कुमार बात कर रहे हैं। बीजू जनता दल के संस्थापक एवं उड़ीसा के सीएम नवीन पटनायक से भी चर्चा हो रही है। राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनावी नतीजे, विपक्षी एकता के लिए आगे की राह तय करेंगे। भाजपा को विपक्षी कुनबे का आभास हो गया है, इसलिए एनडीए को लेकर बैठक शुरू की गई है। अभी जो दल एनडीए की तरफ जा रहे हैं, उनमें से कुछ पार्टियों के साथ बातचीत की जाएगी।