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Oppenheimer: मूवी को पास करने पर सरकार ने क्यों दी कार्रवाई की चेतावनी? जानें CBFC कैसे प्रमाणित करता है फिल्म
Tue, 25 Jul 2023 05:09 PM IST
शिवेंद्र तिवारी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शिवेंद्र तिवारी
Updated Tue, 25 Jul 2023 05:09 PM IST
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ओपेनहाइमर
- फोटो :
AMAR UJALA
विस्तार
परमाणु बम के जनक जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर की कहानी पर बनी फिल्म 'ओपेनहाइमर' विवादों में घिर चुकी है। फिल्म में भगवद्गीता से जुड़े एक सीन को लेकर विवाद है। उसके चलते भारतीय सिनेमाजगत की कई हस्तियां समेत दर्शकों में नाराजगी देखी जा रही है। वहीं, सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने भी फिल्म से उस सीन को हटाने का निर्देश दिया है। साथ ही उन्होंने सेंसर बोर्ड को चेतावनी भी दी है।इस सबके बीच हमें जानना जरूरी है कि आखिर क्या है फिल्म 'ओपेनहाइमर' में? इसका भारत में विरोध क्यों हो रहा है? सूचना प्रसारण मंत्रालय ने इस पर क्या प्रतिक्रिया दी? सेंसर बोर्ड काम क्या करता है? कैसे पास होती है कोई फिल्म? आइए जानते हैं...
ओपेनहाइमर फिल्म
- फोटो :
अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
पहले जानिए 'ओपेनहाइमर' के बारे में
हाल ही में 'ओपेनहाइमर' नाम की एक हॉलीवुड फिल्म रिलीज हुई है। फिल्म 'परमाणु बम के जनक' और मशहूर भौतिक विज्ञानी रॉबर्ट जे. ओपेनहाइमर की कहानी पर आधारित है। फिल्म ब्रिटिश-अमेरिकी फिल्ममेकर क्रिस्टोफर नोलन द्वारा लिखित, निर्मित और निर्देशित है। फिल्म में किलियन मर्फी लीड रोल में है और एमिली ब्लंट उनकी पत्नी बनी हुई हैं। मैट डेमन, रॉबर्ट डाउनी जूनियर, फ्लोरेंस पग, जोश हार्टनेट, केसी एफ्लेक, रामी मालेक और केनेथ ब्रानघ सहायक भूमिकाओं में हैं।
फिल्म का प्रीमियर 11 जुलाई को पेरिस के ल ग्रैंड रेक्स में हुआ और इसे यूनिवर्सल पिक्चर्स द्वारा 21 जुलाई को यूके, अमेरिका और भारत समेत कई देशों में रिलीज किया गया।
हाल ही में 'ओपेनहाइमर' नाम की एक हॉलीवुड फिल्म रिलीज हुई है। फिल्म 'परमाणु बम के जनक' और मशहूर भौतिक विज्ञानी रॉबर्ट जे. ओपेनहाइमर की कहानी पर आधारित है। फिल्म ब्रिटिश-अमेरिकी फिल्ममेकर क्रिस्टोफर नोलन द्वारा लिखित, निर्मित और निर्देशित है। फिल्म में किलियन मर्फी लीड रोल में है और एमिली ब्लंट उनकी पत्नी बनी हुई हैं। मैट डेमन, रॉबर्ट डाउनी जूनियर, फ्लोरेंस पग, जोश हार्टनेट, केसी एफ्लेक, रामी मालेक और केनेथ ब्रानघ सहायक भूमिकाओं में हैं।
फिल्म का प्रीमियर 11 जुलाई को पेरिस के ल ग्रैंड रेक्स में हुआ और इसे यूनिवर्सल पिक्चर्स द्वारा 21 जुलाई को यूके, अमेरिका और भारत समेत कई देशों में रिलीज किया गया।
ओपेनहाइमर
- फोटो :
सोशल मीडिया
इसका भारत में विरोध क्यों हो रहा है?
इस फिल्म के एक दृश्य की वजह से सारा विवाद शुरू हुआ है। 'ओपेनहाइमर' के एक सीन में अपने निजी पलों के दौरान लीड हीरो (सिलियन मर्फी) संस्कृत में लिखा एक वाक्य पढ़ते नजर आ रहे हैं। ऐसा दावा किया जा रहा है कि हीरो द्वारा पढ़ी गईं ये लाइनें भगवद्गीता से हैं। इसे लेकर सोशल मीडिया पर विरोध के सुर गूंज रहे हैं और फिल्म से इस दृश्य को हटाए जाने की मांग की जा रही है। इस मामले पर कई सेलेब्स ने भी चुप्पी तोड़ी है।
इस फिल्म के एक दृश्य की वजह से सारा विवाद शुरू हुआ है। 'ओपेनहाइमर' के एक सीन में अपने निजी पलों के दौरान लीड हीरो (सिलियन मर्फी) संस्कृत में लिखा एक वाक्य पढ़ते नजर आ रहे हैं। ऐसा दावा किया जा रहा है कि हीरो द्वारा पढ़ी गईं ये लाइनें भगवद्गीता से हैं। इसे लेकर सोशल मीडिया पर विरोध के सुर गूंज रहे हैं और फिल्म से इस दृश्य को हटाए जाने की मांग की जा रही है। इस मामले पर कई सेलेब्स ने भी चुप्पी तोड़ी है।
अनुराग ठाकुर और ओपेनहाइमर
- फोटो :
सोशल मीडिया
सूचना प्रसारण मंत्रालय ने इस पर क्या प्रतिक्रिया दी?
फिल्म को लेकर उठे विवाद के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी। अनुराग ठाकुर ने न सिर्फ फिल्म से उस सीन को हटाने का निर्देश दिया है, बल्कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) को भी आड़े हाथों लिया है। अनुराग ठाकुर ने इस आपत्तिजनक सीन पर सीबीएफसी से जवाब मांगा है। खबरों की मानें तो अनुराग ठाकुर ने सीबीएफसी सदस्यों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की चेतावनी भी दी है।
फिल्म को लेकर उठे विवाद के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी। अनुराग ठाकुर ने न सिर्फ फिल्म से उस सीन को हटाने का निर्देश दिया है, बल्कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) को भी आड़े हाथों लिया है। अनुराग ठाकुर ने इस आपत्तिजनक सीन पर सीबीएफसी से जवाब मांगा है। खबरों की मानें तो अनुराग ठाकुर ने सीबीएफसी सदस्यों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की चेतावनी भी दी है।
ओपेनहाइमर फिल्म
- फोटो :
अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
क्या हो सकती है सेंसर बोर्ड पर कार्रवाई?
दरअसल, फिल्म की रिलीज से पहले एक्टर सिलियन मर्फी ने खुद खुलासा किया था कि इस फिल्म की तैयारी के लिए उन्होंने भगवद्गीता का पाठ किया। एक्टर की इस बात को सुनकर सभी ने खुशी मनाई। कहा जाता है कि खुद वैज्ञानिक जे रॉबर्ट ओपेनहाइमर गीता से प्रभावित थे और उन्होंने संस्कृत सीखी थी। ऐसे में इस फिल्म को सर्टिफिकेट देते हुए सेंसर बोर्ड को अतिरिक्त सतर्क रहने की जरूरत थी, लेकिन बोर्ड की तरफ से फिल्म पर कोई आपत्ति नहीं दर्ज कराई गई। अब जब दर्शकों की तरफ से विरोध के सुर गूंज रहे हैं तो देखना दिलचस्प होगा कि सेंसर बोर्ड क्या यूटर्न लेता है और सफाई में क्या कहता है!
दरअसल, फिल्म की रिलीज से पहले एक्टर सिलियन मर्फी ने खुद खुलासा किया था कि इस फिल्म की तैयारी के लिए उन्होंने भगवद्गीता का पाठ किया। एक्टर की इस बात को सुनकर सभी ने खुशी मनाई। कहा जाता है कि खुद वैज्ञानिक जे रॉबर्ट ओपेनहाइमर गीता से प्रभावित थे और उन्होंने संस्कृत सीखी थी। ऐसे में इस फिल्म को सर्टिफिकेट देते हुए सेंसर बोर्ड को अतिरिक्त सतर्क रहने की जरूरत थी, लेकिन बोर्ड की तरफ से फिल्म पर कोई आपत्ति नहीं दर्ज कराई गई। अब जब दर्शकों की तरफ से विरोध के सुर गूंज रहे हैं तो देखना दिलचस्प होगा कि सेंसर बोर्ड क्या यूटर्न लेता है और सफाई में क्या कहता है!
सीबीएफसी क्या है?
सिनेमा पर कुछ भी प्रसारित करने से पहले बेहद सावधानी बरतनी आवश्यक होती है। फिल्म में क्या दिखाया जाए और क्या नहीं। यह तय करने के लिए एक संस्था बनाई गई है, जिसको कहा जाता है, सीबीएफसी या सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन। छोटे शब्दों में इसे ही सेंसर बोर्ड कहा जाता है। यानी यह कहना गलत नहीं होगा कि एक फिल्म निर्माता की सारी मेहनत एक संस्था के हाथ में होती है।
सीबीएफसी सूचना और प्रसारण मंत्रालय के तहत एक वैधानिक संस्था है। इसे सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 के प्रावधानों के तहत फिल्मों के सार्वजनिक प्रदर्शन को विनियमित करने का काम सौंपा गया है। बोर्ड द्वारा प्रमाणित होने के बाद ही फिल्में भारत में दिखाई जा सकती हैं।
बोर्ड में सदस्य और एक अध्यक्ष होते हैं जिनको केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है। इसका मुख्यालय मुंबई में है। अध्यक्ष और बोर्ड के सदस्यों का कार्यकाल तीन साल का होता है। सीईओ, अध्यक्ष के अधीन, प्रशासनिक कामकाज का प्रभारी होता है। सीबीएफसी के नौ क्षेत्रीय कार्यालय हैं। इनको फिल्मों की जांच में सलाहकार पैनल द्वारा सहायता प्रदान की जाती है जिसमें कई सदस्य हो सकते हैं। इन पैनल सदस्यों को केंद्र सरकार द्वारा दो साल के लिए नामित किया जाता है।
सिनेमा पर कुछ भी प्रसारित करने से पहले बेहद सावधानी बरतनी आवश्यक होती है। फिल्म में क्या दिखाया जाए और क्या नहीं। यह तय करने के लिए एक संस्था बनाई गई है, जिसको कहा जाता है, सीबीएफसी या सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन। छोटे शब्दों में इसे ही सेंसर बोर्ड कहा जाता है। यानी यह कहना गलत नहीं होगा कि एक फिल्म निर्माता की सारी मेहनत एक संस्था के हाथ में होती है।
सीबीएफसी सूचना और प्रसारण मंत्रालय के तहत एक वैधानिक संस्था है। इसे सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 के प्रावधानों के तहत फिल्मों के सार्वजनिक प्रदर्शन को विनियमित करने का काम सौंपा गया है। बोर्ड द्वारा प्रमाणित होने के बाद ही फिल्में भारत में दिखाई जा सकती हैं।
बोर्ड में सदस्य और एक अध्यक्ष होते हैं जिनको केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है। इसका मुख्यालय मुंबई में है। अध्यक्ष और बोर्ड के सदस्यों का कार्यकाल तीन साल का होता है। सीईओ, अध्यक्ष के अधीन, प्रशासनिक कामकाज का प्रभारी होता है। सीबीएफसी के नौ क्षेत्रीय कार्यालय हैं। इनको फिल्मों की जांच में सलाहकार पैनल द्वारा सहायता प्रदान की जाती है जिसमें कई सदस्य हो सकते हैं। इन पैनल सदस्यों को केंद्र सरकार द्वारा दो साल के लिए नामित किया जाता है।
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सेंसर बोर्ड काम क्या करता है?
सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन यानी सेंसर बोर्ड को इस बात पर खास ध्यान देना होता है कि किसी फिल्म में संवाद या फिर किसी दृश्य के द्वारा कोई भी ऐसा संदेश लोगों तक न पहुंचे, जिससे धार्मिक उन्माद भड़क सकता हो, देश की शांति भंग हो या फिर किसी दृश्य से कोई विचलित हो सकता हो। सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन एक वैधानिक संस्था है, जो सूचना प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आती है। सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति भी केंद्र सरकार के द्वारा की जाती है। हर फिल्म निर्माता के लिए यह जरूरी होती है कि वह रिलीज से पहले सेंसर बोर्ड से सर्टिफिकेट प्राप्त करे।
सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन यानी सेंसर बोर्ड को इस बात पर खास ध्यान देना होता है कि किसी फिल्म में संवाद या फिर किसी दृश्य के द्वारा कोई भी ऐसा संदेश लोगों तक न पहुंचे, जिससे धार्मिक उन्माद भड़क सकता हो, देश की शांति भंग हो या फिर किसी दृश्य से कोई विचलित हो सकता हो। सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन एक वैधानिक संस्था है, जो सूचना प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आती है। सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति भी केंद्र सरकार के द्वारा की जाती है। हर फिल्म निर्माता के लिए यह जरूरी होती है कि वह रिलीज से पहले सेंसर बोर्ड से सर्टिफिकेट प्राप्त करे।
सेंसर बोर्ड
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amar ujala
कैसे पास होती है कोई फिल्म?
किसी भी फिल्म के सर्टिफिकेट के लिए पूरी प्रक्रिया का पालन करना होता है। इसके लिए सबसे पहले आवेदन किया जाता है, जिसकी जांच में तकरीबन एक सप्ताह का समय लग सकता है, इसके बाद फिल्म को जांच समिति के पास भेजा जाता है, जहां 15 दिनों के बाद इसे सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष के पास भेज दिया जाता है। फिल्म को देखने और जांच करने में तकरीबन दस दिनों का समय लग सकता है और इसके बाद सेंसर बोर्ड के द्वारा फिल्म निर्माता को दृश्यों और संवादों में की गई काट-छांट के बारे में जानकारी दी जाती है। इस प्रक्रिया में भी तकरीबन 30 से 35 दिनों का समय जा सकता है और इस तरह से एक फिल्म को पास करवाने के लिए 68 दिन लग सकते हैं। हालांकि, कई बार यह प्रक्रिया कम दिनों की भी हो सकती है।
किसी भी फिल्म के सर्टिफिकेट के लिए पूरी प्रक्रिया का पालन करना होता है। इसके लिए सबसे पहले आवेदन किया जाता है, जिसकी जांच में तकरीबन एक सप्ताह का समय लग सकता है, इसके बाद फिल्म को जांच समिति के पास भेजा जाता है, जहां 15 दिनों के बाद इसे सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष के पास भेज दिया जाता है। फिल्म को देखने और जांच करने में तकरीबन दस दिनों का समय लग सकता है और इसके बाद सेंसर बोर्ड के द्वारा फिल्म निर्माता को दृश्यों और संवादों में की गई काट-छांट के बारे में जानकारी दी जाती है। इस प्रक्रिया में भी तकरीबन 30 से 35 दिनों का समय जा सकता है और इस तरह से एक फिल्म को पास करवाने के लिए 68 दिन लग सकते हैं। हालांकि, कई बार यह प्रक्रिया कम दिनों की भी हो सकती है।
सेंसर बोर्ड
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अमर उजाला
इतने तरह के मिलते हैं सर्टिफिकेट
भारत में सेंसर बोर्ड की तरफ से फिल्मों को चार तरह के सर्टिफिकेट प्रदान किए जाते हैं. 'यू' यानी ऐसी फिल्मों को हर कोई देख सकता है। वहीं 'ए' कैटेगरी की फिल्में केवल वयस्कों के होती हैं। जबकि यू/ए फिल्मों को देखने के लिए 12 साल से छोटे बच्चों के साथ अभिभावकों का होना जरूरी है। जबकि 'एस' कैटगरी की फिल्में कुछ खास वर्ग के लोगों को दिखाने की अनुमति नहीं होती है और इस तरह से पूरी प्रक्रिया का पालन करने और कई चरणों से गुजरने के बाद फिल्म को सिनेमाघरों में रिलीज के लिए सर्टिफिकेट प्रदान किया जाता है।
भारत में सेंसर बोर्ड की तरफ से फिल्मों को चार तरह के सर्टिफिकेट प्रदान किए जाते हैं. 'यू' यानी ऐसी फिल्मों को हर कोई देख सकता है। वहीं 'ए' कैटेगरी की फिल्में केवल वयस्कों के होती हैं। जबकि यू/ए फिल्मों को देखने के लिए 12 साल से छोटे बच्चों के साथ अभिभावकों का होना जरूरी है। जबकि 'एस' कैटगरी की फिल्में कुछ खास वर्ग के लोगों को दिखाने की अनुमति नहीं होती है और इस तरह से पूरी प्रक्रिया का पालन करने और कई चरणों से गुजरने के बाद फिल्म को सिनेमाघरों में रिलीज के लिए सर्टिफिकेट प्रदान किया जाता है।