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अगर रोज लेते हैं हेल्थ सप्लीमेंट, तो जानें इनके फायदे या नुकसान
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Tue, 28 Aug 2018 05:10 PM IST
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न्यूट्रास्यूटिकल्स
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अगर आप रोजाना हेल्थ सप्लीमेंट लेते हैं, तो सावधान हो जाइए। हो सकता है कि ये आपकी सेहत को फायदा पहुंचाने की बजाए नुकसान पहुंचा रहे हो। कंज्यूमर इंडिया के एक सर्वे के मुताबिक रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने के नाम पर बाजार में बिक रहे ज्यादातर हेल्थ सप्लीमेंट्स यानी न्यूट्रास्यूटिकल्स में पोषक तत्वों की मात्रा रिकमेंडिड डायटरी एलाउंस से कहीं कम या ज्यादा है। जो आपकी सेहत बिगाड़ सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन्हें खरीदने से पहले इनमें मौजद विटामिंस की जांच पड़ताल जरूर कर लें।
कंज्यूमर इंडिया की प्रेसिडेंट डॉक्टर जयाश्री गुप्ता के मुताबिक देश में न्यूट्रास्यूटिकल्स का बाजार 4 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है, जो 2022 तक 10 बिलियन तक पहुंच जाएगा। वहीं बाजार के 60 फीसदी हिस्से पर डाइटरी सप्लीममेंट्स का कब्जा है। कंज्यूमर इंडिया के लिए हिन्दूराव राव अस्पताल के डॉक्टर रविन्द्र नाथ के सर्वे के मुताबिक 40 प्रतिशत भारतीय न्यूट्रास्यूटिकल्स से परिचित हैं, जबकि 60 फीसदी इनका प्रयोग कर रहे हैं।
30 फीसदी लोग हर महीने 500 से 1500 रुपए इन पर खर्च कर रहे हैं, जबकि 9.7 फीसदी ने इनके प्रयोग के दौरान साइड इफैक्ट्स जैसे स्किन एलर्जी और उल्टियों की शिकायत की। 39 फीसदी का मानना है कि शारीरिक थकान में न्यूट्रास्यूटिकल्स की जरूरत होती है। वहीं 32 फीसदी का मानना है कि भोजन के अलावा अलग से न्यूट्रास्यूटिकल्स की आवश्यकता है।
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क्या हैं न्यूट्रास्यूटिकल्स
असल में न्यूट्रास्यूटिकल्स न्यूट्रिशियन और फार्मास्यूटिकल्स प्रॉडक्ट्स का मिश्रण हैं। जिनमें विटामिन्स, मिनरल्स को मिलाकर टेबलेट्स, कैप्सूल्स या सिरप बनाए जाते हैं। मौलाना आजाद मेडिकल कालेज के निदेशक डॉक्टर नरेश गुप्ता के मुताबिक न्यूट्रास्यूटिकल्स को लेकर कोई रिसर्च नहीं की गई है और न ही इनका कोई मेडिकल आधार है।
वहीं दिल्ली यूनिवसिर्टी में न्यूट्रिशियन विभाग में असोसिएट प्रोफेसर सीमा पुरी का कहना है कि एफएसएसएआई की गाइडलाइंस के मुताबिक पैकेजिंग पर न्यूट्रास्यूटिकल्स और उनकी मात्रा के साथ शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों का भी जिक्र होना चाहिए, लेकिन कंपनियां ऐसा नहीं कर रही हैं।
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कंज्यूमर इंडिया की प्रेसिडेंट डॉक्टर जयाश्री गुप्ता के मुताबिक देश में न्यूट्रास्यूटिकल्स का बाजार 4 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है, जो 2022 तक 10 बिलियन तक पहुंच जाएगा। वहीं बाजार के 60 फीसदी हिस्से पर डाइटरी सप्लीममेंट्स का कब्जा है। कंज्यूमर इंडिया के लिए हिन्दूराव राव अस्पताल के डॉक्टर रविन्द्र नाथ के सर्वे के मुताबिक 40 प्रतिशत भारतीय न्यूट्रास्यूटिकल्स से परिचित हैं, जबकि 60 फीसदी इनका प्रयोग कर रहे हैं।
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30 फीसदी लोग हर महीने 500 से 1500 रुपए इन पर खर्च कर रहे हैं, जबकि 9.7 फीसदी ने इनके प्रयोग के दौरान साइड इफैक्ट्स जैसे स्किन एलर्जी और उल्टियों की शिकायत की। 39 फीसदी का मानना है कि शारीरिक थकान में न्यूट्रास्यूटिकल्स की जरूरत होती है। वहीं 32 फीसदी का मानना है कि भोजन के अलावा अलग से न्यूट्रास्यूटिकल्स की आवश्यकता है।
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क्या हैं न्यूट्रास्यूटिकल्स
असल में न्यूट्रास्यूटिकल्स न्यूट्रिशियन और फार्मास्यूटिकल्स प्रॉडक्ट्स का मिश्रण हैं। जिनमें विटामिन्स, मिनरल्स को मिलाकर टेबलेट्स, कैप्सूल्स या सिरप बनाए जाते हैं। मौलाना आजाद मेडिकल कालेज के निदेशक डॉक्टर नरेश गुप्ता के मुताबिक न्यूट्रास्यूटिकल्स को लेकर कोई रिसर्च नहीं की गई है और न ही इनका कोई मेडिकल आधार है।
वहीं दिल्ली यूनिवसिर्टी में न्यूट्रिशियन विभाग में असोसिएट प्रोफेसर सीमा पुरी का कहना है कि एफएसएसएआई की गाइडलाइंस के मुताबिक पैकेजिंग पर न्यूट्रास्यूटिकल्स और उनकी मात्रा के साथ शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों का भी जिक्र होना चाहिए, लेकिन कंपनियां ऐसा नहीं कर रही हैं।
मल्टीविटामिन्स खाने के खतरे
क्या है मल्टीविटामिन्स में
बाजार में मल्टीविटामिन्स के नाम पर बिकने वाले उत्पाद 100 रुपए से शुरू हो कर 2500 रुपए तक बिकते हैं। सर्वे के मुताबिक इन उत्पादों में पोषक तत्वों का दावा किया जाता है। लेकिन हमारे भोजन में रोजाना की जरूरत वाले पोषक तत्वों यानी रिकमेंडिड डायटरी एलाउंस की तुलना में यह मात्रा कम या ज्यादा होती है। जैसे शरीर को रोज 600 मिलीग्राम कैल्शियम की जरूरत होती है, लेकिन मल्टीविटामिंस में यह मात्र 200 मिलीग्राम तक होती है। जबकि अकेले एक गिलास दूध (250 एमएल) में 525 मिलीग्राम कैल्शियम होता है। वहीं केले में 364 मिलीग्राम होता है।
वहीं एंजाइम प्रक्रिया के लिए जिम्मेवार मोलीब्डेनम की रोजाना जरूरत 45 माइक्रोग्राम है, जबकि मल्टीविटामिंस टैबलेट्स में यह 75 माइक्रोग्राम तक होता है, जो शरीर के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
कोलोस्ट्रम
कंज्यूमर इंडिया के मुताबिक इसे फर्स्ट मिल्क भी कहा जाता है। गाय, भैसों या मैमल्स दूध देने से पहले इसी का स्राव करते हैं। लेकिन कंज्यूमर इंडिया इन्हें इस्तेमाल करने की सिफारिश नहीं करती है। उनका कहना है कि इसके फायदों को लेकर कोई रिसर्च सामने नहीं आई है। साथ ही इनमें पेस्टिसाइड्स और रासायनिक तत्वों के मिलावट की संभावना है।
आवंला जूस
सर्वे के अनुसार कंपनियां का दावा है कि 100 ग्राम जूस में 900 मिलीग्राम विटामिन सी होता है। जबकि रिकमेंडिड डायटरी एलाउंस (आरडीए) के मुताबिक शरीर को रोज 40 मिलीग्राम विटामिन सी की जरूरत है। वहीं केवल 50 ग्राम आंवला में 300 मिलीग्राम विटामिन सी होता है।
बाजार में मल्टीविटामिन्स के नाम पर बिकने वाले उत्पाद 100 रुपए से शुरू हो कर 2500 रुपए तक बिकते हैं। सर्वे के मुताबिक इन उत्पादों में पोषक तत्वों का दावा किया जाता है। लेकिन हमारे भोजन में रोजाना की जरूरत वाले पोषक तत्वों यानी रिकमेंडिड डायटरी एलाउंस की तुलना में यह मात्रा कम या ज्यादा होती है। जैसे शरीर को रोज 600 मिलीग्राम कैल्शियम की जरूरत होती है, लेकिन मल्टीविटामिंस में यह मात्र 200 मिलीग्राम तक होती है। जबकि अकेले एक गिलास दूध (250 एमएल) में 525 मिलीग्राम कैल्शियम होता है। वहीं केले में 364 मिलीग्राम होता है।
वहीं एंजाइम प्रक्रिया के लिए जिम्मेवार मोलीब्डेनम की रोजाना जरूरत 45 माइक्रोग्राम है, जबकि मल्टीविटामिंस टैबलेट्स में यह 75 माइक्रोग्राम तक होता है, जो शरीर के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
कोलोस्ट्रम
कंज्यूमर इंडिया के मुताबिक इसे फर्स्ट मिल्क भी कहा जाता है। गाय, भैसों या मैमल्स दूध देने से पहले इसी का स्राव करते हैं। लेकिन कंज्यूमर इंडिया इन्हें इस्तेमाल करने की सिफारिश नहीं करती है। उनका कहना है कि इसके फायदों को लेकर कोई रिसर्च सामने नहीं आई है। साथ ही इनमें पेस्टिसाइड्स और रासायनिक तत्वों के मिलावट की संभावना है।
आवंला जूस
सर्वे के अनुसार कंपनियां का दावा है कि 100 ग्राम जूस में 900 मिलीग्राम विटामिन सी होता है। जबकि रिकमेंडिड डायटरी एलाउंस (आरडीए) के मुताबिक शरीर को रोज 40 मिलीग्राम विटामिन सी की जरूरत है। वहीं केवल 50 ग्राम आंवला में 300 मिलीग्राम विटामिन सी होता है।
फ्रूट वाटर के नाम मीठा पानी
विटामिन या फ्रूट वाटर के नाम बिक रहे फ्लैवर्ड वाटर
सर्वे कराने वाली संस्था का कहना है कि इन पेय उत्पादों को पानी का विकल्प बता कर बाजार में बेचा जा रहा है। जबकि इनमें आर्टिफिशयल फ्लैवर्स, शुगर, स्वीटनर्स, प्रिजरवेटिव, कार्बोनेटेड वाटर, कैफीन या दूसरी नुकसानदेय चीजें मिलाई जा रही हैं। फ्रूट फ्लैवर्ड वाटर में फलों का आर्टिफिशियल स्वाद होता है। इनमें 9 से 13 ग्राम चीनी होती है, जो सवा दो चम्मच से लेकर सवा तीन चम्मच तक हो सकती है। जबकि विश्व स्वास्थ् संगठन का कहना है कि रोजाना केवल 25 ग्राम शुगर काफी है।
व्हे प्रोटीन में ऐससल्फेम पोटेशियम
कंज्यूमर इंडिया के सर्वे के मुताबिक अक्सर लोग जिम इंस्ट्रक्टर्स या विज्ञापनों के चक्कर में इनके जाल में फंस जाते हैं। ये ज्यादातर विदेश से आते हैं, जिनकी कीमत 2 से 3 हजार रुपए प्रति किलोग्राम तक होती है। ये न केवल महंगे होते हैं बल्कि इनके कई साइड इफैक्ट्स भी होते हैं। व्हे प्रोटीन इतने ज्यादा हाई प्रोसेस्ड होते हैं कि उनमें कोई न्यूट्रिशनल वैल्यू नहीं होती।
वहीं इनमें मिलाया जाने वाला आर्टिफिशियल स्वीटनर ऐससल्फेम पोटेशियम (ऐस के) एक कैंसरकारक तत्व है। कंज्यूमर इंडिया का कहना है कि नेचुरल फूड प्रोडक्ट्स सबसे बेहतर हैं। दूध, मक्खन, मूंगफली, दालें, तोफू, सोया, चिकन, फिश और अंडे प्रोटीन का प्राकृतिक स्रोत हैं। गौरतलब है कि व्हे प्रोटीन को लेकर सरकार ने अभी तक कोई गाइडलाइंस नहीं बनाई है।
प्रोटीन पाउडर
सर्वे करने वाली संस्था का कहना है कि बाजार में तमाम कंपनियों के प्रोटीन ड्रिंक मिल रहे हैं। एक कप प्रोटीन पाउडर में 240 कैलोरी होती हैं। जिसमें 80 कैलोरी फैट से, 25 प्रोटीन से और बची हुई 135 कैलोरी कार्बोहाइड्रेट से मिलती है। जबकि इन कार्बोहाइड्रेट में केवल 1 ग्राम ही फाइबर होता है वहीं इसमें 18 ग्राम शुगर होती है, जो साढ़े चार चम्मच चीनी के बराबर होती है।
सर्वे कराने वाली संस्था का कहना है कि इन पेय उत्पादों को पानी का विकल्प बता कर बाजार में बेचा जा रहा है। जबकि इनमें आर्टिफिशयल फ्लैवर्स, शुगर, स्वीटनर्स, प्रिजरवेटिव, कार्बोनेटेड वाटर, कैफीन या दूसरी नुकसानदेय चीजें मिलाई जा रही हैं। फ्रूट फ्लैवर्ड वाटर में फलों का आर्टिफिशियल स्वाद होता है। इनमें 9 से 13 ग्राम चीनी होती है, जो सवा दो चम्मच से लेकर सवा तीन चम्मच तक हो सकती है। जबकि विश्व स्वास्थ् संगठन का कहना है कि रोजाना केवल 25 ग्राम शुगर काफी है।
व्हे प्रोटीन में ऐससल्फेम पोटेशियम
कंज्यूमर इंडिया के सर्वे के मुताबिक अक्सर लोग जिम इंस्ट्रक्टर्स या विज्ञापनों के चक्कर में इनके जाल में फंस जाते हैं। ये ज्यादातर विदेश से आते हैं, जिनकी कीमत 2 से 3 हजार रुपए प्रति किलोग्राम तक होती है। ये न केवल महंगे होते हैं बल्कि इनके कई साइड इफैक्ट्स भी होते हैं। व्हे प्रोटीन इतने ज्यादा हाई प्रोसेस्ड होते हैं कि उनमें कोई न्यूट्रिशनल वैल्यू नहीं होती।
वहीं इनमें मिलाया जाने वाला आर्टिफिशियल स्वीटनर ऐससल्फेम पोटेशियम (ऐस के) एक कैंसरकारक तत्व है। कंज्यूमर इंडिया का कहना है कि नेचुरल फूड प्रोडक्ट्स सबसे बेहतर हैं। दूध, मक्खन, मूंगफली, दालें, तोफू, सोया, चिकन, फिश और अंडे प्रोटीन का प्राकृतिक स्रोत हैं। गौरतलब है कि व्हे प्रोटीन को लेकर सरकार ने अभी तक कोई गाइडलाइंस नहीं बनाई है।
प्रोटीन पाउडर
सर्वे करने वाली संस्था का कहना है कि बाजार में तमाम कंपनियों के प्रोटीन ड्रिंक मिल रहे हैं। एक कप प्रोटीन पाउडर में 240 कैलोरी होती हैं। जिसमें 80 कैलोरी फैट से, 25 प्रोटीन से और बची हुई 135 कैलोरी कार्बोहाइड्रेट से मिलती है। जबकि इन कार्बोहाइड्रेट में केवल 1 ग्राम ही फाइबर होता है वहीं इसमें 18 ग्राम शुगर होती है, जो साढ़े चार चम्मच चीनी के बराबर होती है।
डेली हेल्थ सप्लीमेंट कैप्सूल
‘बढ़ते’ बच्चों के हेल्थ ड्रिंक
संस्था के मुताबिक बाजार में कई कंपनियां बच्चों की लंबाई को लेकर दावा करती हैं। कंपनियों के दावे के मुताबिक इनमें जरूरी 23 न्यूट्रियंट और 100 प्रतिशत गाय का दूध होता है। संस्था का कहना है कि लंबाई बढ़ाने का दावा बिल्कुल गलत है। लंबाई या बौनेपन के लिए हमारे जींस या आनुवांशिक कारण जिम्मेदार हैं। इन हेल्थ ड्रिंक में केवल प्रोसेस्ड जंक शुगर, ऑक्सीडाइजेबल फैट, आर्टिफिशियल विटामिंस और आर्टिफिशियल मिनरल्स होते हैं।
डेली हेल्थ सप्लीमेंट कैप्सूल
कंज्यूमर इंडिया का कहना है कि बाजार में रोजाना एक कैप्सूल के जरिए 11 विटामिन और मिनरल्स देने का दावा करने वाली कंपनियां आक्रामक विज्ञापनों के जरिए लोगों को गुमराह कर रही हैं। विटामिंस और मिनरल्स की जरूरत उम्र के मुताबिक होती है। जैसे कैप्सूल में विटामिन ए की 2000 इंटरनेशनल यूनिट्स (आईयू) की मात्रा होती है। वहीं 14 साल के बच्चों में 3 हजार आईयू और एक व्यस्क में 10 हजार आईयू की जरूरत होती है।
जबकि नेचुरल सोर्सेज जैसे एक कप पालक (उबला/फ्रोजन) में 11 हजार 458 आईयू होती है, गाजर (आधा कप) में 9,189 आईयू होती हैं। कैप्सूल में 200 आईयू विटामिन डी की मात्रा होती है, वहीं अगर किसी में विटामिन डी की कमी हो तो डाक्टर इलाज के दौरान 60 हजार आईयू हर सप्ताह देने की सिफारिश करते हैं।
संस्था के मुताबिक बाजार में कई कंपनियां बच्चों की लंबाई को लेकर दावा करती हैं। कंपनियों के दावे के मुताबिक इनमें जरूरी 23 न्यूट्रियंट और 100 प्रतिशत गाय का दूध होता है। संस्था का कहना है कि लंबाई बढ़ाने का दावा बिल्कुल गलत है। लंबाई या बौनेपन के लिए हमारे जींस या आनुवांशिक कारण जिम्मेदार हैं। इन हेल्थ ड्रिंक में केवल प्रोसेस्ड जंक शुगर, ऑक्सीडाइजेबल फैट, आर्टिफिशियल विटामिंस और आर्टिफिशियल मिनरल्स होते हैं।
डेली हेल्थ सप्लीमेंट कैप्सूल
कंज्यूमर इंडिया का कहना है कि बाजार में रोजाना एक कैप्सूल के जरिए 11 विटामिन और मिनरल्स देने का दावा करने वाली कंपनियां आक्रामक विज्ञापनों के जरिए लोगों को गुमराह कर रही हैं। विटामिंस और मिनरल्स की जरूरत उम्र के मुताबिक होती है। जैसे कैप्सूल में विटामिन ए की 2000 इंटरनेशनल यूनिट्स (आईयू) की मात्रा होती है। वहीं 14 साल के बच्चों में 3 हजार आईयू और एक व्यस्क में 10 हजार आईयू की जरूरत होती है।
जबकि नेचुरल सोर्सेज जैसे एक कप पालक (उबला/फ्रोजन) में 11 हजार 458 आईयू होती है, गाजर (आधा कप) में 9,189 आईयू होती हैं। कैप्सूल में 200 आईयू विटामिन डी की मात्रा होती है, वहीं अगर किसी में विटामिन डी की कमी हो तो डाक्टर इलाज के दौरान 60 हजार आईयू हर सप्ताह देने की सिफारिश करते हैं।