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Nupur Sharma: क्या नुपुर शर्मा प्रकरण में मीडिया चैनल दोषी नहीं? एडिटर्स गिल्ड ने की आत्मनिरीक्षण की मांग
Wed, 08 Jun 2022 02:30 PM IST
Harendra Chaudhary
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Wed, 08 Jun 2022 02:30 PM IST
सार
एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने भारतीय चैनलों से ‘रेडियो रवांडा’ की तरह से काम न करने की अपेक्षा की है। रेडियो रवांडा के बारे में माना जाता है कि उसकी सांप्रदायिक रिपोर्टिंग ने अफ्रीका में एक जनसंहार को जन्म दिया, जिसकी कीमत हजारों लोगों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी...
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नुपुर शर्मा
- फोटो : Agency (File Photo)
विस्तार
भाजपा की राष्ट्रीय प्रवक्ता नुपुर शर्मा की एक टीवी बहस के दौरान की गई टिप्पणी ने देश के सामने असहज स्थितियां पैदा कर दी हैं। इस टिप्पणी के बाद न केवल कानपुर में दंगे की स्थिति पैदा हो गई, बल्कि वहां से उपजे विवाद में देश को भी शर्मसार होना पड़ रहा है। इस तरह के टीवी डिबेट्स आयोजित करने के कारण भारतीय मीडिया चैनलों पर भी गंभीर टिप्पणी होती रही है। नुपुर शर्मा प्रकरण के बाद एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने इन चैनलों से आत्मनिरीक्षण करने की मांग की है। गिल्ड ने कहा है कि पत्रकारों के संगठनों को इस प्रकरण को गंभीरता से लेते हुए मीडिया की जिम्मेदारी तय करने की कोशिश करनी चाहिए।
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एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के द्वारा बुधवार को जारी किए गए एक पत्र में कहा गया है कि मीडिया की लोकतंत्र में बेहद महत्त्वपूर्ण भूमिका तय की गई है। उसे देश के लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करने की बेहद आवश्यक जिम्मेदारी दी गई है। दुर्भाग्य से देश के कई शीर्ष चैनल अपनी इस जिम्मेदारी को निभाने में असफल रहे हैं। ज्यादा दर्शक पाने की होड़ में इन चैनलों पर उत्तेजक बहस को आयोजित कराया जाता है, जिसमें कई बार अभद्र भाषा का उपयोग होने लगता है। चैनलों से इस तरह की बहस आयोजित करने से स्वयं को बचाने की सलाह दी गई है।
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मीडिया चैनलों पर चल रही बहस केवल एक बहस मात्र नहीं होती है, इसके माध्यम से देश के अंतिम व्यक्ति के अधिकार सुरक्षित रखने की गारंटी भी सुनिश्चित की जाती है। ये बहस कई मायनों में देश के संवैधानिक मूल्यों के मामले में दुनिया में देश की छवि निर्माण में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसे देखते हुए चैनलों को अपनी महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी को समझने और उसके अनुरूप कार्य करने की उम्मीद जाहिर की गई है।
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भारतीय मीडिया चैनलों, विशेषकर हिंदी मीडिया के चैनलों, पर यह आरोप लगता रहा है कि अपनी बहस के दौरान वे विशेष विचारधारा को आगे बढ़ाने का काम करते हैं। उनकी बहसों से समाज में सांप्रदायिक वैमनस्य ब़ढ़ने की आशंका तक जताई जाती रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बेहद संवेदनशील मामले में भी कुछ चैनलों ने बेहद हास्यास्पद स्तर की रिपोर्टिंग की जिसकी सोशल मीडिया में खूब आलोचना हुई। लेकिन इसके बाद भी टीवी चैनलों पर होने वाली बहस में कोई सुधार होता नहीं दिखाई पड़ा है। एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने भारतीय चैनलों से ‘रेडियो रवांडा’ की तरह से काम न करने की अपेक्षा की है। रेडियो रवांडा के बारे में माना जाता है कि उसकी सांप्रदायिक रिपोर्टिंग ने अफ्रीका में एक जनसंहार को जन्म दिया, जिसकी कीमत हजारों लोगों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।