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दीपक मिश्रा ही नहीं बल्कि इन 6 जजों के खिलाफ भी लाया गया था प्रस्ताव

Sat, 21 Apr 2018 09:32 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 21 Apr 2018 09:32 AM IST
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not only Chief Justice of India Dipak Misra but these sitting judges also faced removal action
दीपक मिश्रा

इस समय विपक्ष चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा को हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव ला रहा है। मगर यह पहली बार नहीं है जब किसी सिटिंग जज को हटाने की कोशिशें हो रही हैं। इससे पहले भी 6 बार जजों को इस तरह की कार्यवाही से गुजरना पड़ा है लेकिन किसी को भी हटाया नहीं गया था। किसी भी जज को तब तक नहीं हटाया जा सकता जब तक उसपर भ्रष्टाचार या दुर्व्यवहार के गंभीर आरोप ना हों।

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संविधान इस बात की अनुमति देता है कि एक न्यायाधीश को केवल राष्ट्रपति के आदेश से हटाया जा सकता है। इसका आधार लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों के कुल सदस्यों के बहुमत द्वारा इस प्रस्ताव को पारित होना चाहिए। यानी न्यायधीश को हटाने के लिए जो प्रस्ताव लाया जाएगा उसका बहुमत से या फिर दो-तिहाई सदस्यों द्वारा उसके पक्ष में वोटिंग किया जाना अनिवार्य है। 
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स्वतंत्र भारत में जस्टिस वी रामास्वामी सुप्रीम कोर्ट के पहले ऐसे जज थे जिन्हें हटाने की कार्यवाही साल 1991 में शुरू की गई थी। उनपर आरोप था कि 1990 में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रहते हुए उन्होंने अपने आधिकारिक निवास पर काफी ज्यादा खर्च किया था। यहां तक की सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन तक ने उन्हें हटाने के लिए प्रस्ताव पारित किया था।
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इसके बाद 2011 में सिक्किम हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस पीडी दिनाकरन के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों के तहत जांच शुरू हुई थी। राज्यसभा के सभापति ने उनपर लगे आरोपों की जांच के लिए एक समिति गठित की थी। हालांकि इससे पहले कि उन्हें हटाए जाने की प्रक्रिया शुरू होती उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

2011 में ही कोलकाता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सौमित्र सेन को अनाचार के आरोप में महाभियोग की कार्यवाही का सामना करना पड़ा था। 53 साल के सेन ने महाभियोग चलाए जाने के बाद अपना इस्तीफा उस समय की राष्ट्रपति प्रतिभा देवी पाटिल को भेज दिया था।

2015 में 58 राज्यसभा सांसदों ने गुजरात हाई कोर्ट के न्यायाधीश जेबी पारदीवाला के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाए थे। जेबी पारदीवाला के खिलाफ आरक्षण के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। हालांकि जज ने अपने जजमेंट से विवादित वाले बयान को हटा लिया था जिसके बाद उनके खिलाफ लाए गए प्रस्ताव को रोक दिया गया था।

2015 में ही मध्यप्रदेश के जस्टिस एसके गंगेले के खिलाफ प्रस्ताव लाया गया था। उनपर सेक्शुअल हैरेसमेंट का आरोप लगा था और राज्यसभा के 58 सांसदों ने इसपर हस्ताक्षर किए थे। हालांकि बाद में उनके खिलाफ कार्रवाई को रोक दिया गया।


2017 में हाईकोर्ट के जज नागार्जुना रेड्डी पर अपने पद का दुरुपयोग करने और एक दलित जज को प्रताड़ित करने का आरोप लगा था। हालांकि यह प्रस्ताव वापस लेना पड़ा क्योंकि उन्हें हटाने की दूसरी प्रक्रिया के तहत केवल 9 राज्यसभा सदस्यों ने वोट दिए थे।

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