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'सद्दाम हुसैन' को भारत में नहीं मिल रही नौकरी
बीबीसी हिंदी.कॉम के लिए
Updated Mon, 20 Mar 2017 03:09 PM IST
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सद्दाम हुसैन
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इराक के नेता सद्दाम हुसैन को फांसी दिए दस साल से ज्यादा समय बीत चुका है लेकिन अब भी कोई है जो उनके नाम की कीमत चुका रहा है। सद्दाम हुसैन नाम के 25 साल के एक भारतीय मरीन इंजीनियर को अब तक 40 बार नौकरी देने से इनकार किया जा चुका है।
हालांकि उनके नाम की स्पेलिंग इराक के तानाशाह के नाम से अलग है लेकिन फिर भी उनकी दिक्कतें कम नहीं हो रही। उनके दादा ने उनका नाम सद्दाम हुसैन रखा था लेकिन वो अपने दादा को अपनी परेशानी के लिए जिम्मेदार नहीं मानते। नौकरी मिलने में आ रही अड़चन के चलते उन्होंने अपना नाम बदलने का फैसला किया लेकिन इस प्रक्रिया में वक्त लग रहा है इसलिए नौकरी मिलने में भी देरी हो रही है।
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हालांकि उनके नाम की स्पेलिंग इराक के तानाशाह के नाम से अलग है लेकिन फिर भी उनकी दिक्कतें कम नहीं हो रही। उनके दादा ने उनका नाम सद्दाम हुसैन रखा था लेकिन वो अपने दादा को अपनी परेशानी के लिए जिम्मेदार नहीं मानते। नौकरी मिलने में आ रही अड़चन के चलते उन्होंने अपना नाम बदलने का फैसला किया लेकिन इस प्रक्रिया में वक्त लग रहा है इसलिए नौकरी मिलने में भी देरी हो रही है।
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कंपनियों का डर
झारखंड के जमशेदपुर के रहने वाले सद्दाम हुसैन को तमिलनाडु की नूरुल इस्लाम यूनिवर्सिटी से पढ़ाई पूरी किए दो साल बीत चुके हैं लेकिन वो अब तक खाली बैठे हैं। जहां उनके सहपाठियों को नौकरियां मिल चुकी है वहां अच्छे अंकों से पास होने के बावजूद सद्दाम हुसैन को शिपिंग कंपनियां खाली हाथ लौटा देती हैं।
अब साजिद बन चुके सद्दाम ने हिंदुस्तान टाइम्स अखबार को बताया " लोग मुझे नौकरी देने से डरते हैं ।" वो कहते हैं कि शायद कंपनियां इस बात से डरती हैं कि अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर अप्रवासन अधिकारियों से सद्दाम हुसैन का सामना होगा तो क्या होगा?
अब साजिद बन चुके सद्दाम ने हिंदुस्तान टाइम्स अखबार को बताया " लोग मुझे नौकरी देने से डरते हैं ।" वो कहते हैं कि शायद कंपनियां इस बात से डरती हैं कि अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर अप्रवासन अधिकारियों से सद्दाम हुसैन का सामना होगा तो क्या होगा?
अदालत का चक्कर
सद्दाम मानते हैं कि नया पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस और अन्य कागजात बनवा लेने से उनकी दिक्कतें कम हो जाएंगे। लेकिन नए नाम के साथ वो कंपनियों के सामने साबित नहीं कर पा रहे कि स्कूल के जो सर्टिफिकेट हैं वो उनके हैं, इस पूरी प्रक्रिया में काफी वक्त लग रहा है। शिक्षण विभाग सेकेंड्री स्कूल के प्रमाणपत्रों में उनका नाम बदल दे इसके लिए वो अदालत गए हैं और पांच मई को अगली सुनवाई होनी है।
स्कूल के सर्टिफिकेट के बाद कॉलेज के कागजात में नाम बदलने की बारी आएगी। सद्दान हुसैन होने का दंश सिर्फ भारत के इंजीनियर को ही नहीं झेलना पड़ रहा बल्कि इराक में भी ऐसे किस्से सामने आ चुके हैं। रामादी में काम कर रहे सद्दाम नाम के एक पत्रकार ने बताया कि इराक में उनके पिता को बेटे का नाम सद्दाम रखने की वजह से सरकारी नौकरी से हाथ धोना पड़ा था।
एक शख्स ने बताया कि शिया लड़ाकों ने उसे पकड़कर बंदूक तान दी थी, लेकिन बंदूक जाम होने की वजह से वो बच पाए। समाचार एजेंसी एएफपी के इराक ब्यूरो चीफ प्रशांत राव बताते हैं कि बगदाद में एक कुर्द स्कूली बच्चे को वो जानते थे जिसका नाम सद्दाम हुसैन था। उसके साथी अक्सर फुटबॉल खेलते हुए कहते थे, ''सिर्फ हम ही नहीं पूरा इराक तुमसे नफरत करता है।''
स्कूल के सर्टिफिकेट के बाद कॉलेज के कागजात में नाम बदलने की बारी आएगी। सद्दान हुसैन होने का दंश सिर्फ भारत के इंजीनियर को ही नहीं झेलना पड़ रहा बल्कि इराक में भी ऐसे किस्से सामने आ चुके हैं। रामादी में काम कर रहे सद्दाम नाम के एक पत्रकार ने बताया कि इराक में उनके पिता को बेटे का नाम सद्दाम रखने की वजह से सरकारी नौकरी से हाथ धोना पड़ा था।
एक शख्स ने बताया कि शिया लड़ाकों ने उसे पकड़कर बंदूक तान दी थी, लेकिन बंदूक जाम होने की वजह से वो बच पाए। समाचार एजेंसी एएफपी के इराक ब्यूरो चीफ प्रशांत राव बताते हैं कि बगदाद में एक कुर्द स्कूली बच्चे को वो जानते थे जिसका नाम सद्दाम हुसैन था। उसके साथी अक्सर फुटबॉल खेलते हुए कहते थे, ''सिर्फ हम ही नहीं पूरा इराक तुमसे नफरत करता है।''