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Karnataka High Court: जैविक और दत्तक संतान में कोई फर्क नहीं, अनुकंपा नियुक्ति के मामले में अहम फैसला

Tue, 22 Nov 2022 11:32 AM IST
सुरेंद्र जोशी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बेंगलुरु
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बेंगलुरु Published by: सुरेंद्र जोशी Updated Tue, 22 Nov 2022 11:32 AM IST
सार

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि इस तरह भेदभाव किया गया तो फिर गोद लेने का कोई उद्देश्य नहीं रह जाएगा। इस बारे में हाईकोर्ट ने कर्नाटर सरकार के अभियोजन विभाग की दलीलें खारिज कर दी। जस्टिस सूरज गोविंदराज और जस्टिस जी. बासवराज ने यह आदेश दिया। 

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No distinction between adopted & biological child on job on compassionate grounds
कर्नाटक हाईकोर्ट का अनुकंपा नियुक्ति को लेकर अहम फैसला - फोटो : amar ujala

विस्तार

कर्नाटक हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति को लेकर अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने कहा है कि इस मामले में दत्तक व जैविक संतान में कोई फर्क नहीं है। गोद लिए बच्चे को भी जैविक बच्चे की तरह ही अधिकार है। उनके अभिभावकों के मामले में अनुकंपा आधार पर नियुक्ति को लेकर इसमें कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता। 

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हाईकोर्ट ने कहा कि यदि इस तरह भेदभाव किया गया तो फिर गोद लेने का कोई उद्देश्य नहीं रह जाएगा। इस बारे में हाईकोर्ट ने कर्नाटर सरकार के अभियोजन विभाग की दलीलें खारिज कर दी। जस्टिस सूरज गोविंदराज और जस्टिस जी. बासवराज ने यह आदेश दिया। 
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हाईकोर्ट ने कहा कि प्रतिवादी अभियोजन विभाग और सहायक लोक अभियोजक द्वारा दत्तक पुत्र और जैविक पुत्र (biological child) के बीच किए गए अंतर का इस केस में कोई असर नहीं होगा। विभाग ने मौजूदा नियमों का हवाला देकर कहा था कि इनमें दत्तक पुत्र (adopted son) को अनुकंपा नियुक्ति का कोई प्रावधान नहीं है। 
हाईकोर्ट ने अपने हालिया फैसले में कहा कि एक बेटा, बेटा है और लड़की लड़की है, भले वह दत्तक हो या जैविक। यदि इनमें भेदभाव किया गया तो दत्तक लेने का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। इनमें भेदभाव संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा। 

क्या है मामला
दरअसल, कर्नाटक के विनायक एम मुत्तत्ती सहायक लोक अभियोजक, जेएमएफसी, बनहट्टी के कार्यालय में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे। उन्होंने 2011 में एक लड़के को गोद लिया था। इसके बाद मुत्तत्ती की मार्च 2018 में मृत्यु हो गई। उसी वर्ष उनके दत्तक पुत्र गिरीश ने एक आवेदन दायर कर अनुकंपा आधार पर नौकरी मांगी। विभाग ने द्वारा आवेदन को इस आधार पर खारिज कर दिया कि आवेदक दत्तक पुत्र है। दत्तक पुत्र को अनुकंपा नियुक्ति देने का नियम नहीं है। 

इसके बाद गिरीश ने कर्नाटक हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इस पर 2021 में एकल पीठ ने गिरीश की याचिका खारिज कर दी थी, क्योंकि नियमों में अनुकंपा नियुक्ति के लिए गोद लिए गए बेटे के आवेदन पर विचार करने का प्रावधान नहीं है। एकल पीठ के फैसले को गिरीश ने डबल बैंच के समक्ष चुनौती दी थी। खंडपीठ ने अपने फैसले में  कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का मकसद कमाने वाले सदस्य की मृत्यु के कारण परिवार के सामने आने वाली वित्तीय कठिनाई को दूर करना है।
इस केस में मृतक अपने पीछे अपनी पत्नी और पुत्र और दत्तक पुत्र तथा एक पुत्री छोड़ गया है, जो मानसिक रूप से विक्षिप्त और शारीरिक रूप से विकलांग हैं। चूंकि जैविक पुत्र की मृत्यु हो गई है, इसलिए दत्तक पुत्र को अनुकंपा नियुक्ति का हक है। हाईकोर्ट ने विभाग के तर्क को खारिज करते हुए दत्तक पुत्र के आवेदन को उपयुक्त माना। 

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