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राष्ट्रीय सर्वे: देश में हर दूसरा ग्रामीण काम-धंधे के कारण अपने गांव से दूर, इनके सामने सबसे ज्यादा बाधाएं
Wed, 01 Jul 2026 05:34 AM IST
अमन तिवारी
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो
Published by: अमन तिवारी
Updated Wed, 01 Jul 2026 05:34 AM IST
सार
एनआईआरडीपीआर की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि आजीविका और समय की कमी के कारण ग्राम सभाओं में नागरिकों की भागीदारी लगातार घट रही है। रिपोर्ट में ग्राम सभाओं को अधिक सहभागी, पारदर्शी और समावेशी बनाने के लिए समय-सारिणी में बदलाव तथा शिकायत निवारण तंत्र मजबूत करने की सिफारिश की गई है।
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ग्राम सभाओं में घट रही लोगों की भागीदारी
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
देश की ग्राम सभाओं में नागरिकों की भागीदारी घट रही है। आजीविका-समय की मजबूरी इसकी बड़ी वजह बनकर उभरी है। राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान (एनआईआरडीपीआर), हैदराबाद के अध्ययन के अनुसार, जागरूकता संतोषजनक होने के बावजूद यह नियमित भागीदारी में नहीं बदल रही।
निर्वाचित प्रतिनिधियों और स्वयं सहायता समूह सदस्यों की भागीदारी बेहतर है, जबकि महिलाओं, प्रवासी मजदूरों, दिहाड़ी श्रमिकों व वंचित समुदायों को सबसे ज्यादा बाधाओं का सामना करना पड़ता है। यह अध्ययन रिपोर्ट मंगलवार को नई दिल्ली में जारी की गई है। 26 राज्यों-केंद्रशासित प्रदेशों के 213 जिलों की 400 ग्राम पंचायतों से लगभग 7,790 उत्तरदाताओं की राय इस अध्ययन में ली गई।
यह रिपोर्ट जारी करते हुए, नीति आयोग सदस्य डॉ. आर. बालासुब्रमण्यम ने कहा कि सशक्त ग्राम सभा की नींव सूचना संपन्न और सशक्त नागरिक में निहित है। उन्होंने सार्थक भागीदारी को ज्ञानवर्धन, सहभागिता और अंततः सशक्तिकरण की यात्रा बताया है।
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आजीविका और समय बड़ी बाधा
ग्राम सभा में कम भागीदारी के 55.50% मामलों में आजीविका व समय की मजबूरी, 16.22% में जागरूकता व संचार की कमी, 9.93% में रुचि की कमी, 5.54% में समावेशन बाधाएं, 4.92% में सेवा वितरण मुद्दे, 3.97% में भरोसे की कमी और 2.92% में ढांचागत समस्याएं जिम्मेदार पाई गईं। वहीं, 41.74% लोग दिहाड़ी मजदूरी, 30.26% कृषि कार्य, 15.06% पलायन और 12.26% प्रतिकूल समय के कारण ग्राम सभा की बैठकों से दूर रहते हैं।
रिपोर्ट की अहम सिफारिशें: रिपोर्ट में ग्राम सभाओं को सांविधिक औपचारिकता के बजाय निरंतर नागरिक भागीदारी की प्रक्रिया बनाने का सुझाव दिया गया है। इसके लिए आजीविका-अनुकूल समय-सारिणी, पारदर्शिता-जवाबदेही, मजबूत शिकायत निवारण तंत्र तथा स्वयं सहायता समूहों, युवाओं और निर्वाचित प्रतिनिधियों की अधिक भागीदारी जरूरी बताई गई है। प्रभावशीलता इस पर निर्भर करती है कि नागरिक कितने सूचित, संलग्न और सशक्त महसूस करते हैं।
बैठकें रस्म अदायगी, घटा भरोसा
15-24% उत्तरदाताओं ने बैठकों को खानापूर्ति बताया, 18-28% लोगों ने नतीजे न दिखने और 14-22% ने राय का असर न होने की शिकायत की। 12-20% ने पारदर्शिता की कमी व राजनीतिक हस्तक्षेप तथा 10-18% ने शिकायतों के अनसुलझे रहने की बात कही है। महिलाओं और कमजोर वर्गों की सीमित भागीदारी, पर घरेलू जिम्मेदारियां, सामाजिक झिझक व पुरुषों का वर्चस्व बाधा बने हुए हैं।
सशक्त ग्राम सभा विकसित भारत की नींव
पिछले एक दशक में सड़क, पानी और बिजली जैसी बुनियादी समस्याएं काफी हद तक सुलझ चुकी हैं, अब ग्राम सभाओं को अधिक सहभागी, समावेशी और प्रभावी बनाने की जरूरत है ताकि हर नागरिक स्थानीय विकास में सक्रिय भूमिका निभा सके। सशक्त ग्राम सभा ही सशक्त पंचायत और विकसित भारत की मजबूत नींव है। -विवेक भारद्वाज, केंद्रीय पंचायती राज सचिव
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निर्वाचित प्रतिनिधियों और स्वयं सहायता समूह सदस्यों की भागीदारी बेहतर है, जबकि महिलाओं, प्रवासी मजदूरों, दिहाड़ी श्रमिकों व वंचित समुदायों को सबसे ज्यादा बाधाओं का सामना करना पड़ता है। यह अध्ययन रिपोर्ट मंगलवार को नई दिल्ली में जारी की गई है। 26 राज्यों-केंद्रशासित प्रदेशों के 213 जिलों की 400 ग्राम पंचायतों से लगभग 7,790 उत्तरदाताओं की राय इस अध्ययन में ली गई।
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यह रिपोर्ट जारी करते हुए, नीति आयोग सदस्य डॉ. आर. बालासुब्रमण्यम ने कहा कि सशक्त ग्राम सभा की नींव सूचना संपन्न और सशक्त नागरिक में निहित है। उन्होंने सार्थक भागीदारी को ज्ञानवर्धन, सहभागिता और अंततः सशक्तिकरण की यात्रा बताया है।
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आजीविका और समय बड़ी बाधा
ग्राम सभा में कम भागीदारी के 55.50% मामलों में आजीविका व समय की मजबूरी, 16.22% में जागरूकता व संचार की कमी, 9.93% में रुचि की कमी, 5.54% में समावेशन बाधाएं, 4.92% में सेवा वितरण मुद्दे, 3.97% में भरोसे की कमी और 2.92% में ढांचागत समस्याएं जिम्मेदार पाई गईं। वहीं, 41.74% लोग दिहाड़ी मजदूरी, 30.26% कृषि कार्य, 15.06% पलायन और 12.26% प्रतिकूल समय के कारण ग्राम सभा की बैठकों से दूर रहते हैं।
रिपोर्ट की अहम सिफारिशें: रिपोर्ट में ग्राम सभाओं को सांविधिक औपचारिकता के बजाय निरंतर नागरिक भागीदारी की प्रक्रिया बनाने का सुझाव दिया गया है। इसके लिए आजीविका-अनुकूल समय-सारिणी, पारदर्शिता-जवाबदेही, मजबूत शिकायत निवारण तंत्र तथा स्वयं सहायता समूहों, युवाओं और निर्वाचित प्रतिनिधियों की अधिक भागीदारी जरूरी बताई गई है। प्रभावशीलता इस पर निर्भर करती है कि नागरिक कितने सूचित, संलग्न और सशक्त महसूस करते हैं।
बैठकें रस्म अदायगी, घटा भरोसा
15-24% उत्तरदाताओं ने बैठकों को खानापूर्ति बताया, 18-28% लोगों ने नतीजे न दिखने और 14-22% ने राय का असर न होने की शिकायत की। 12-20% ने पारदर्शिता की कमी व राजनीतिक हस्तक्षेप तथा 10-18% ने शिकायतों के अनसुलझे रहने की बात कही है। महिलाओं और कमजोर वर्गों की सीमित भागीदारी, पर घरेलू जिम्मेदारियां, सामाजिक झिझक व पुरुषों का वर्चस्व बाधा बने हुए हैं।
सशक्त ग्राम सभा विकसित भारत की नींव
पिछले एक दशक में सड़क, पानी और बिजली जैसी बुनियादी समस्याएं काफी हद तक सुलझ चुकी हैं, अब ग्राम सभाओं को अधिक सहभागी, समावेशी और प्रभावी बनाने की जरूरत है ताकि हर नागरिक स्थानीय विकास में सक्रिय भूमिका निभा सके। सशक्त ग्राम सभा ही सशक्त पंचायत और विकसित भारत की मजबूत नींव है। -विवेक भारद्वाज, केंद्रीय पंचायती राज सचिव