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निकाह हलाला: कानून बनाने के खिलाफ मुस्लिम बोर्ड, कहा- प्रथा इस्लाम के अनुसार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Tue, 17 Jul 2018 08:43 AM IST
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देश में मुस्लिमों के सबसे बड़े संगठन ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) निकाह हलाला के खिलाफ कानून बनाने के खिलाफ है। हालांकि उसे लगता है कि इसके इस्तेमाल को हतोत्साहित किया जाना चाहिए और इसे दुर्लभ से दुर्लभतम परिस्थितियों' तक सीमित कर देना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई से पहले बोर्ड ने अपना पक्ष साफ कर दिया है।
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निकाह हलाला में यदि कोई मुस्लिम महिला तलाक के बाद फिर से अपने पहले पति के साथ शादी करना चाहती है तो उसे एक दिन के लिए किसी और शख्स के साथ शादी करके शारीरिक संबंध बनाने पड़ते हैं। इसके बाद वह उसे अगले दिन तलाक दे देता है ताकि वह फिर से अपने पहले पति से निकाह कर सके। एआईएमपीएलबी का कहना है कि यह प्रथा इस्लाम के अनुसार है।
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बोर्ड के सचिव और कानूनी जानकार जफरयाब जिलानी ने कहा, 'निकाह हलाला को चुनौती नहीं दी जा सकती। निकाह हलाला एक ऐसी प्रथा है जिसमें आप अपनी पत्नी से तलाक के बाद दोबारा शादी नहीं कर सकते हैं। जब तक कि वह किसी और से शादी करके संबंध स्थापित ना करें। यह जरूरी है कि पत्नी को दोबारा तलाक मिले। यह कुरान के अनुसार है और बोर्ड के विचार इससे अलग नहीं हो सकते हैं।'
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मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व करने वाले बोर्ड में ही कुछ लोग इस प्रथा का विरोध कर रहे हैं। बोर्ड के कुछ सदस्यों ने आगे आकर कहा है कि अस्थायी शादी और दोबारा अपने पहले पति से शादी करने का विचार शरीया में मौजूद नहीं है। यदि कोई शादी इस मकसद से की जाती है कि महिला को तलाक दिया जाएगा और वह पहले पति के पास वापस लौट सकती है तो यह हराम है और एक तरह का अपराध है जिसपर सजा मिलनी चाहिए।
बोर्ड के सदस्य कमाल फारुकी ने कहा, 'दूसरे शख्स के साथ इस मकसद से शादी करना ताकि अपने पहले पति के पास वापस जाया जा सके कुरान के अनुसार अपराध है। इस तरह के जोड़े जो कॉन्ट्रैक्ट शादी करते हैं ताकि पहले पति से शादी हो सके, उन्हें भारतीय दण्ड संहिता की धारा के तहत सजा दी जानी चाहिए। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि समुदाय में कुछ अनैतिक तत्व निकाह हलाला का दुरुपयोग कर रहे हैं। यह गलत और अस्वीकार्य है।'