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नए साल में नई आशा: उत्सव, परंपरा और एक भारत श्रेष्ठ भारत की झलक

Tue, 14 Apr 2026 04:05 AM IST
Nirmal Kant सी.पी. राधाकृष्णन, भारत के उपराष्ट्रपति।
सी.पी. राधाकृष्णन, भारत के उपराष्ट्रपति। Published by: Nirmal Kant Updated Tue, 14 Apr 2026 04:05 AM IST
सार

तमिल नव वर्ष अत्यंत विशेष अवसर है, जो हमारे पूर्वजों की बुद्धिमत्ता का उत्सव मनाता है।  तमिल कैलेंडर अपनी विशेषता के कारण केवल दिनों और महीनों को ही नहीं, बल्कि वर्षों को भी नाम देता है। ऐसे कुल 60 वर्ष-नाम होते हैं, और इस वर्ष का नाम पराभव है, जो इस चक्र का 40वां वर्ष है।

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सीपी राधाकृष्णन, उपराष्ट्रपति - फोटो : एएनआई (फाइल)

विस्तार

मैं भारत और विश्वभर के सभी लोगों को बैसाखी, रोंगाली बिहू, महा बिषुबा पना संक्रांति, पोइला बोइशाख, विषु और तमिल पुथांडु के अवसर पर अपनी पारंपरिक नववर्ष की शुभकामनाएं देता हूं, जो एक भारत श्रेष्ठ भारत की भावना को दर्शाते हैं। चिथिरई का महीना कृषि की तैयारियों का समय होता है। किसान जमीन को उपजाऊ बनाने के लिए उस पर काम करना शुरू कर देते हैं। पूरे देश में हमें इसी तरह के उत्सव देखने को मिलते हैं, जो भारत में एकता और साझा संस्कृति के उदाहरण हैं। तेलुगु भाषी लोगों ने हाल ही में अपना नववर्ष उगादी के रूप में मनाया, जबकि मराठी और कोंकणी समुदाय अपना नववर्ष गुड़ी पड़वा के रूप में मनाते हैं। हम एक प्राचीन सभ्यता से संबंधित हैं, जिसका प्रमाण हमारे पूर्वजों के वैज्ञानिक ज्ञान से मिलता है। ब्रह्मांड के प्रति उनकी सटीक समझ इन नववर्ष उत्सवों में झलकती है। खगोल विज्ञान शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा से हुई है, जिसका अर्थ है तारों के नियमों का अध्ययन। तमिल में इसे वाणियल कहा जाता है। हजारों वर्ष पहले ही तमिल विद्वानों ने यह समझ लिया था कि पृथ्वी गोल है और उन्होंने खगोलीय पिंडों की गति तथा उनके प्रभाव का अध्ययन किया था। प्राचीन तमिल साहित्य, जैसे कि पतिरुप्पट्टू, ब्रह्मांड की प्रकृति और गति का वर्णन करता है। श्लोकों में बताया गया है कि संसार पांच तत्वों से बना है और आकाशीय शक्तियों से शासित है। सिरुपनरुप्पदई जैसी अन्य रचनाएं ग्रहों की गति का उल्लेख करती हैं।
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चिथिरई के पहले दिन मंदिरों में पढ़ा जाता है पंचांग: संगम साहित्य में ग्रहों और तारों के संदर्भ मिलते हैं। उदाहरण के लिए, पुराणनुरु में शनि को काला (मैम्मीन) बताया गया है। आकाशीय प्रभावों के अध्ययन की परंपरा कनियान कहलाने वाले विद्वानों से जुड़ी थी। माना जाता है कि कवि कनियान पूंगुंद्रनार ने अपना नाम इसी परंपरा से लिया है। यहां तक कि तोलकाप्पियम जैसे प्राचीन ग्रंथ भी ऐसे विद्वानों को अरीवर कहते हैं। अकनानुरु जैसे साहित्य से पता चलता है कि विवाह जैसे शुभ आयोजन उचित तिथियों और समय का चुनाव करके संपन्न किए जाते थे। यह परंपरा आज भी तमिलनाडु में जारी है। चिथिरई के पहले दिन मंदिरों में पंचांग पढ़ा जाता है और लोग इसे सुनने के लिए एकत्रित होते हैं।
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पूर्वजों से मिले ज्ञान के धरोहर को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना हमारी जिम्मेदारी: पंचांग में पांच तत्व होते हैं : वार (दिन), तिथि, करण, नक्षत्र और योग। इनके आधार पर वर्षा, कृषि और वर्ष से जुड़े अन्य पहलुओं के बारे में भविष्यवाणी की जाती है। हमारे पूर्वज समय को मापने के लिए सौर और चंद्र दोनों प्रणालियों का उपयोग करते थे। आज आधुनिक विज्ञान उन्नत उपकरणों से ग्रहण की गणना करता है, लेकिन पहले भी इन घटनाओं का अध्ययन कर उन्हें सटीक रूप से बताया जाता था। हमारे पूर्वजों से मिला ज्ञान हमारी धरोहर है। हमें इसे सुरक्षित रखना चाहिए और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना चाहिए।
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वर्ष के पहले दिन से संतुलन को प्राथमिकता देते हैं तमिल
नव वर्ष के पहले दिन बनने वाले पारंपरिक भोजन में सभी स्वाद शामिल होते हैं, यहां तक कि कड़वा भी। यह हमें सिखाता है कि जीवन में सुख और दुख दोनों तरह के अनुभव होते हैं, और हमें उन्हें संतुलन के साथ स्वीकार करना चाहिए। मैं युवाओं से आग्रह करता हूं कि वे नए साल को सकारात्मक सोच, विश्वास और समर्पण के साथ मनाएं और अपने पूर्वजों के दिखाए रास्ते पर चलें।


राज्यों में अलग-अलग परंपराएं
उत्तर भारत में, विशेषकर पंजाब में, लोग बैसाखी को फसल उत्सव के रूप में मनाते हैं। दक्षिण और खासकर केरल में विशु मनाया जाता है, जहां शुभ वस्तुओं (कानी) को देखना एक महत्वपूर्ण रिवाज है। असम में लोग बिहू मनाते हैं, जबकि पश्चिम बंगाल मेंपोइला बोइशाख को उत्साहपूर्वक मनाया जाता है। इसी प्रकार मणिपुर, त्रिपुरा, ओडिशा, बिहार, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान में भी लोग इस अवधि को विभिन्न पारंपरिक रूपों में नववर्ष के रूप में मनाते हैं। उत्तराखंड के हरिद्वार में देशभर से श्रद्धालु गंगा में पवित्र स्नान करने के लिए एकत्र होते हैं।
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