नए आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल की पाँच चुनौतियां
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नरेंद्र मोदी सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक के 24वें गवर्नर के रूप में उर्जित पटेल के नाम की घोषणा कर दी है। पटेल मौजूदा गवर्नर रघुराम राजन की जगह लेंगे। राजन की जगह गवर्नर नियुक्त किए गए उर्जित पटेल को जुलाई 2013 में रिजर्व बैंक का डिप्टी गवर्नर बनाया गया था और इसी साल जनवरी में उनके कार्यकाल को तीन साल के लिए बढ़ाया गया था। उधर राजन 1992 के बाद से पहले ऐसे गवर्नर हैं जिनका कार्यकाल नहीं बढ़ाया गया है।
माना जा रहा है कि सार्वजनिक मौकों पर उनकी बेबाकी और आर्थिक नीतियों पर सरकार के साथ बहुत अधिक सहयोग न करना उनके खिलाफ गया। कई आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि राजन का अधिक जोर महंगाई को काबू करने पर रहा और इस कारण आर्थिक विकास पर असर पड़ा।
राजन के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने भी उन पर ब्याज दरें नहीं घटाने और आर्थिक विकास पर ध्यान नहीं देने के आरोप लगाए थे। उर्जित पटेल लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से ग्रेजुएट हैं और उन्होंने ऑक्सफोर्ड और येल यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा हासिल की है।
इसके अलावा उन्हें इंफ्रास्ट्रक्चर, वित्त और ऊर्जा क्षेत्रों में शीर्ष पदों पर कार्य करने का अनुभव है। रिजर्व बैंक की वेबसाइट पर उपलब्ध प्रोफाइल के अनुसार रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर नियुक्त होने से पहले पटेल रिलायंस इंडस्ट्रीज में प्रेसिडेंट (बिजनेस डेवलपमेंट) और आईडीएफसी में कार्यकारी निदेशक थे। आईएमएफ और पूर्ववर्ती एनडीए सरकार में कई महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके उर्जित पटेल के सामने कई चुनौतियां होंगी।
ब्याज दरों पर नियंत्रण रखना- पटेल के लिए ब्याज दरों पर नियंत्रण रखना अहम चुनौती होगी। हालाँकि ये बात भी सच है कि अब ब्याज दरें घटाने या बढाने का फैसला अकेले गवर्नर नहीं करता और एक छह सदस्यीय समिति के साथ मिलकर वो ये फैसला लेता है। बावजूद इसके ब्याज दरों में कमी होने या नहीं होने की आलोचना सिर्फ गवर्नर को ही झेलनी पडती है।
महंगाई की धार पर ध्यान देना होगा
महंगाई की धार पर ध्यान देना होगा- मौजूदा हालात में जबकि कच्चे तेल की कीमतें नीचे हैं और देश का चालू खाता घाटा एक हद तक नियंत्रण में है, गवर्नर रघुराम राजन के लिए महंगाई व्यापक रूप से चिंता का विषय नहीं रहा है। लेकिन तेल ने फिर गर्मी दिखानी शुरू की तो हालात बदल और बिगड़ सकते हैं। वैसे भी खाने-पीने की चीजें महंगी होने से जुलाई में लगातार चौथे महीने उपभोक्ता मूल्य महंगाई दर 6।07% के स्तर तक पहुँच गई है और इसने रिजर्व बैंक की 6% की ऊपरी सीमा को तोड़ दिया है।
डॉलर कर्ज भुगतान- उर्जित पटेल का पहला बड़ा इम्तेहान अगले ही महीने होगा, जब लगभग 2000 करोड़ डॉलर के बॉन्ड्स भुनाए जाएंगे। बैंकों ने पिछले कुछ वर्षों में विदेशी बाजारों से ये रकम वसूल की थी।
सरकारी बैंकों का डूबता कर्ज- भारत के सरकारी बैंकों के लाखों करोड़ रुपए के कर्ज डूब गए हैं। इसी साल जून में रिजर्व बैंक ने एक रिपोर्ट में कहा है कि अगले साल तक ये कुल कर्ज का 8।5 प्रतिशत तक पहुँच जाएगा। अभी डूबते कर्ज की कुल कर्ज में हिस्सेदारी तकरीबन 7।6 प्रतिशत है। मौजूदा गवर्नर रघुराम राजन ने बैंकों को डूबते कर्ज को अपनी बैलेंसशीट से हटाने के लिए मार्च 2017 तक का समय दिया है।
स्पेशलाइज्ड बैंकिंग मॉडल- सरकार और रिजर्व बैंक यूं तो बड़े बैंकों को तरजीह देना चाहते हैं। शायद यही वजह है कि स्टेट बैंक के सहयोगी बैंकों का भारतीय स्टेट बैंक में विलय करने का फैसला लिया गया है। बैंकों के विलय के रोडमैप में राजन का अहम योगदान रहा है। ऐसे में उर्जित पटेल पर ये जिम्मेदारी होगी कि वह भारतीय बैंकिंग उद्योग को किस दिशा में ले जाएंगे।