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New Lok Sabha: 2026 में परिसीमन हुआ तो लोकसभा में बढ़ेंगी कितनी सीटें? बढ़ जाएगा उत्तर के राज्यों का दबदबा

Mon, 29 May 2023 07:47 PM IST
शिवेंद्र तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिवेंद्र तिवारी Updated Mon, 29 May 2023 07:47 PM IST
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सार
सदन में सीटों की संख्या राज्यों की आबादी के आधार पर तय की जाती है। साल 1971 में हुई जनगणना के आधार पर दोनों सदनों के लिए अधिकतम सीटों की संख्या तय है। उस वक्त लोकसभा की 550 और राज्यसभा की 250 सीटों की अधिकतम संख्या तय की गई थी। 
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New parliament building has 888 member capacity, how many seats will increase after delimitation
New Lok Sabha - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

देश के नए संसद भवन का उद्घाटन रविवार को हो गया। इस भवन के अस्तित्व में आने की सबसे बड़ी वजह थी मौजूदा भवन में संसद सदस्यों के बैठने की संकीर्णता। 2026 में होने वाले परिसीमन के साथ लोकसभा में सीटों की संख्या बढ़ सकती है। 


इस लिहाज से अब यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ है कि संसद के निचले सदन में किस राज्य का कितना प्रतिनिधित्व होगा? ये संख्या तय कैसे होती है? मौजूदा नियम में लोकसभा में अधिकतम कितनी सीटें हो सकती हैं? सीटें बढ़ती हैं किन राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा? किन राज्यों का प्रतिनिधित्व घट सकता है? आइये समझते हैं…

ऐसे निर्धारित होती है सीटों की संख्या?
सदन में सीटों की संख्या राज्यों की आबादी के आधार पर तय की जाती है। साल 1971 में हुई जनगणना के आधार पर दोनों सदनों के लिए अधिकतम सीटों की संख्या तय है। उस वक्त लोकसभा की 550 और राज्यसभा की 250 सीटों की अधिकतम संख्या तय की गई थी। 1971 के बाद से इसमें बदलाव नहीं हुआ है। 

1971 में जब ये संख्या निर्धारित की गई थी। तब करीब साढ़े 10 लाख आबादी पर एक लोकसभा सीट थी। आज यह आंकड़ा बढ़कर 25 लाख से ज्यादा की आबादी पर एक लोकसभा सांसद का हो चुका है। हालांकि, संविधान में अधिकतम दस लाख की आबादी पर एक सांसद का जिक्र किया गया है। 

लोकसभा सीटें
लोकसभा सीटें - फोटो : AMAR UJALA
10 लाख की आबादी पर एक सांसद हो तो कैसी होगी लोकसभा?
देश में हर 10 लाख की आबादी पर एक सांसद वाले नियम के हिसाब से सीटें बांटी जाएं तो देश में कुल 1375 सीटें होगीं। सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व यूपी का होगा जहां के सीटों की संख्या 80 से बढ़कर 238 हो जाएगी। इसी तरह बिहार में अभी 40 सीटें हैं और यहां 125 सीटें होगीं। मध्य प्रदेश में लोकसभा का प्रतिनिधित्व 29 सीटों से बढ़कर 85 पहुंच जाएगा। राजस्थान में मौजूदा आंकड़ा है 25 है जो आगे चलकर 81 हो जाएगा। अन्य छोटे राज्यों की बात करें तो झारखंड में 39 सीटें, छ्त्तीसगढ़ में 29 सीटें, हरियाणा में 28 सीटें और दिल्ली में 19 सीटें हो जाएंगी।

दूसरी ओर दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु में 39 लोकसभा सीट हैं जो बढ़कर 78 हो जाएंगी। कर्नाटक का आंकड़ा 28 सीटों से बढ़कर 68 हो जाएगा। आंध्र प्रदेश में सीटें 25 से बढ़कर 54 तक पहुंच जाएंगी। केरल में सीटों की संख्या 20 से बढ़कर 36 हो जाएगी। तेलंगाना में यह आंकड़ा 17 से बढ़कर 39 हो जाएगा। 

New Lok Sabha
New Lok Sabha - फोटो : ANI
नए संसद भवन की क्षमता तो 888 सीटों की ही है?
नया बनकर तैयार हुए संसद भवन की लोकसभा में अधिकतम 888 सांसदों के बैठने की क्षमता है। अगर इसी आधार पर परिसीमन हो और 1375 सीटों  की जगह लोकसभा की सीटें बढ़कर 888 हों तो, इस स्थिति में यूपी में लोकसभा सीटें 153 हो जाएंगी।

इसी तरह अन्य राज्यों को देखें तो बिहार 80 लोकसभा सीटों का प्रतिनिधित्व करेगा। इसके बाद महाराष्ट्र में 79 सीटें होगीं। पश्चिम बंगाल में आंकड़ा बढ़कर 64 सीटों का हो जाएगा। मध्य प्रदेश में 54 सीटें, राजस्थान 52 सीटें, झारखंड में 25 सीटें, छ्त्तीसगढ़ में 18 सीटें, हरियाणा में 18 सीटें और दिल्ली में 12 सीटें हो जाएंगी।

यही आंकड़े दक्षिण भरत के राज्यों के लिए देखें तो तमिलनाडु में सीटें 50 हो जाएंगी। इसके बाद कर्नाटक में 44 सीटें, आंध्र प्रदेश में 35 सीटें, केरल में 23 सीटें और तेलंगाना में 25 सीटें हो जाएंगी।

लोकसभा सीटें
लोकसभा सीटें - फोटो : AMAR UJALA
आबादी के हिसाब से कहां कितनी सीटें हो सकती हैं?
अनुच्छेद 81 के मुताबिक, लोकसभा में 550 से ज्यादा सीटें नहीं हो सकतीं, ऐसे में आबादी के हिसाब से देश के राज्य में यूपी में सबसे ज्यादा यूपी में 94 सीटें हो सकती हैं। इसी तरह बिहार में 49 सीटें, मध्यप्रदेश 34 सीटें राजस्थान में 32 सीटें, झारखंड 15 सीटें, छ्त्तीसगढ़ में 12 सीटें, हरियाणा में 11 सीटें और दिल्ली में सात सीटें हो सकती हैं। 

यही आंकड़े दक्षिण भारतीय राज्यों के लिए देखें तो तमिलनाडु में 31 सीटें, कर्नाटक में 27 सीटें, आंध्र प्रदेश में 21 सीटें, केरल में 14 सीटें और तेलंगाना में 16 सीटें हो सकती हैं। 

संसद
संसद - फोटो : Social Media
1971 के बाद लोकसभा की सीटें क्यों नहीं बढ़ीं?
संविधान का अनुच्छेद 81 कहता है कि लोकसभा का प्रतिनिधित्व जनसंख्या के अनुसार होना चाहिए। लेकिन 1971 की जनगणना के आधार पर किए गए परिसीमन के बाद से यह कमोबेश वैसा ही बना हुआ है। दरअसल, अनुच्छेद 81 के तहत अनिवार्य जनसंख्या-सीट अनुपात सभी राज्यों के लिए समान होना चाहिए। हालांकि, इससे पता चला कि जनसंख्या को नियंत्रण न करने वाले राज्यों को संसद में अधिक संख्या में सीटें मिल सकती हैं। वहीं, इसके उलट परिवार नियोजन को बढ़ावा देने वाले दक्षिणी राज्यों को अपनी सीटें कम होने की चिंता हुई। इन आशंकाओं को दूर करने के लिए, 1976 में इंदिरा गांधी के आपातकालीन शासन के दौरान 2001 तक परिसीमन को निलंबित करने के लिए संविधान में संशोधन किया गया था।

प्रतिबंधों के बावजूद, कुछ ऐसे मौके आए हैं जब राज्य को आवंटित संसद और विधानसभा सीटों की संख्या में बदलाव की मांग की गई है। इनमें 1986 में अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम द्वारा प्राप्त राज्य का दर्जा, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के लिए विधानसभा का निर्माण और उत्तराखंड जैसे नए राज्यों का निर्माण शामिल है। 

2001 की जनगणना के बाद लोकसभा और विधानसभाओं में सीटों की संख्या पर रोक हटा दी जानी चाहिए थी लेकिन एक अन्य संशोधन से यह रोक 2026 तक के लिए स्थगित कर दी गई। यह इस आधार पर था कि 2026 तक पूरे देश में एक समान जनसंख्या वृद्धि दर हासिल की जाए।

क्या सीटें बढ़ सकती हैं?
संविधान के आर्टिकल-81 के मुताबिक लोकसभा में सीटों की संख्या 550 से ज्यादा नहीं हो सकती। संविधान में यही है कि आबादी के हिसाब से सीटों की संख्या का निर्धारण होगा। यदि 2026 से पहले लंबित जनगणना होती है तो सीटें आबादी के हिसाब से बढ़ सकती हैं। अगर सरकार इसकी तय सीमा 2026 से और आगे बढ़ाती है, तो सीटों की संख्या में यथा स्थिति बनी रहेगी।
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