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New Education Policy 2020 : भाषा थोपी नहीं... कम उम्र के बच्चे ज्यादा सीखते हैं - कस्तूरीरंगन

Fri, 31 Jul 2020 08:26 AM IST
योगेश साहू अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली। Published by: योगेश साहू Updated Fri, 31 Jul 2020 08:26 AM IST
सार

  • पांचवीं तक मातृभाषा में पढ़ाई पर बोले राष्ट्रीय शिक्षा नीति कमेटी व इसरो के पूर्व अध्यक्ष के कस्तूरीरंगन
  • अब सिर्फ कागज के सर्टिफिकेट और डिग्री धारक नहीं, विभिन्न विषयों के ज्ञाता छात्र स्कूल और कॉलेज कैंपस से बाहर आएंगे

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New Education Policy 2020 : K Kasturirangan said Not imposing language, young children learn more
के कस्तूरीरंगन

विस्तार

पांचवीं कक्षा तक मातृभाषा में पढ़ाई का फैसला किसी भी बच्चे पर भाषा थोपना नहीं है। इसका मकसद छोटे बच्चों को संस्कृति से जोड़ते हुए सीखने की प्रवृति को बढ़ाना है। घर में मातृभाषा का ही प्रयोग होता है, ऐसे में छात्र जब उसी भाषा में सीखेगा तो उसे हमेशा याद रहेगा। हालांकि मातृभाषा किसी पर थोपी नहीं गई है।

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यदि कोई किसी अन्य भाषा से जुड़ना चाहता है तो उसका भी विकल्प होगा। यह कहना है राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अध्यक्ष के कस्तूरीरंगन का। नीति में अलग-अलग भाषाओं पर ही जोर दिया गया है। किसी पर कोई भी भाषा थोपी नहीं जा रही है। अपनी भाषा में बच्चे को सीखने में आसानी होगी और उनका ज्ञान बढ़ेगा।
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गुणवत्ता युक्त शिक्षा से रोजगार बढ़ेगा
कस्तूरीरंगन कहते हैं कि इस नीति से शिक्षा की हर स्तर पर गुणवत्ता बढ़ेगी। गुणवत्ता युक्त स्कूली और उच्च शिक्षा से रोजगार भी बढ़ेगा। इसीलिए छठवीं कक्षा से व्यावसासिक शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण को जोड़ा गया है। नीति से भारत की शिक्षा का स्वरूप पूरी तरह बदल जाएगा। हर स्तर पर इसमें बदलाव दिखेगा। अब सिर्फ कागज के सर्टिफिकेट या डिग्री लेकर छात्र कैंपस से बाहर नहीं आएंगे, बल्कि ज्ञान के साथ कौशल व हुनर भी होगा। अब छात्र बहुविषयक ज्ञाता होंगे।

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कोचिंग की दुकानदारी होगी बंद

अब बोर्ड परीक्षा में अच्छे अंक लेने के लिए कोचिंग की जरूरत नहीं रहेगी। या यूं कहें कि कोचिंग की दुकानदारी बंद हो जाएगी। क्योंकि अब रट्टा की बजाय प्रैक्टिकल अधिक होगा। बोर्ड परीक्षाओं से सभी छात्रों की योग्यताओं एवं क्षमताओं का सही आकलन नहीं हो पा रहा था।

इसलिए इनके स्वरूप को बदलने की जरूरत महसूस की गई है। साल में बोर्ड परीक्षा एक से अधिक बार भी हो सकती है। इन्हें ऑनलाइन आयोजित करने जैसे विकल्पों पर भी कार्य किए जाने की जरूरत है। ताकि बोर्ड परीक्षाएं तनाव का कारण नहीं बनें और इनके नतीजे छात्रों के लिए आनंददायक हों।

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