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नई दवा नीति: दवा कंपनियों को मिली बड़ी राहत, छोटी तकनीकी चूक पर होगा जुर्माना; गंभीर मामलों में सीधा ट्रायल

Mon, 05 Jan 2026 04:42 AM IST
शुभम कुमार परीक्षित निर्भय
परीक्षित निर्भय Published by: शुभम कुमार Updated Mon, 05 Jan 2026 04:42 AM IST
सार

दवा कंपनियों को अब हर तकनीकी गलती पर कोर्ट नहीं जाना पड़ेगा। केंद्र ने ड्रग कंपाउंडिंग नियम 2025 लागू किए हैं, जिनमें गलती मानकर सुधार करने पर जुर्माना देकर मामला निपटाया जा सकेगा। हालांकि झूठ, जानकारी छिपाने या बार-बार नियम तोड़ने पर सीधा ट्रायल होगा। सीडीएससीओ ने राज्यों को दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

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New drug policy Companies will fined for technical errors and direct trials will be conducted in serious cases
दवा - फोटो : Adobe Stock

विस्तार

दवा कंपनियों को अब हर गलती पर कोर्ट के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। नए ड्रग कंपाउंडिंग नियमों के तहत अगर कंपनी ने गलती मानी और सुधार किया तो जुर्माना देकर मामला निपट सकता है लेकिन झूठ, जानकारी छिपाने या नियमों की अनदेखी दोहराने पर सीधा ट्रायल होगा। केंद्र सरकार ने दवा एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम 1940 में अपराधों के निपटारे संबंधी नियम (कंपाउंडिंग ऑफ ऑफेंसेस) 2025 को अधिसूचित किया है। इन नए नियमों के बारे में राज्यों को पूरी जानकारी देने के लिए केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) ने 10 पन्नों के दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

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इसके तहत केंद्र सरकार ने दवा कानूनों में एक नई व्यवस्था लागू की है, जिसमें तकनीकी या प्रक्रियात्मक उल्लंघनों को जुर्माना देकर निपटाने का मौका मिलेगा। दवा नियमन में इस बड़े नीतिगत बदलाव सरकार ने स्पष्ट किया है कि अब हर छोटी चूक पर आपराधिक मुकदमा नहीं चलेगा लेकिन राहत बिना शर्त नहीं होगी।
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क्या कहते है नए नियम?
नए नियमों के मुताबिक, यदि किसी दवा निर्माता, आयातक या विक्रेता से नियमों का उल्लंघन हुआ है और वह गलती स्वीकार कर उसे सुधारने को तैयार है तो वह मामले को कंपाउंड कराने के लिए आवेदन कर सकता है। तय जुर्माना जमा करने के बाद इस मामले में आपराधिक कार्रवाई से राहत मिल सकती है। हालांकि, सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह छूट केवल उन्हीं मामलों में मिलेगी, जहां उल्लंघन से जनस्वास्थ्य को सीधा नुकसान न हुआ हो और मामला गंभीर प्रकृति का न हो।
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सरकार ने यह भी सख्त प्रावधान किया है कि यदि आवेदन के दौरान या जांच में यह सामने आता है कि कंपनी ने गलत तथ्य पेश किए, जानकारी छिपाई या जांच एजेंसियों को गुमराह किया तो दी गई इम्युनिटी तत्काल वापस ली जा सकती है। ऐसे मामलों में न केवल कंपाउंडिंग रद्द होगी, बल्कि आरोपी के खिलाफ पूरी कानूनी कार्रवाई और ट्रायल शुरू किया जाएगा।

समय पर जुर्माना न देना पड़ेगा भारी
नियमों में यह भी कहा गया है कि जुर्माना तय समय सीमा में जमा न करने की स्थिति में मामला दोबारा सक्रिय हो जाएगा और उसे सामान्य आपराधिक केस की तरह आगे बढ़ाया जाएगा। बार-बार उल्लंघन करने वाली कंपनियों को इस व्यवस्था का लाभ नहीं मिलेगा। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि नई नीति का दुरुपयोग न हो और यह केवल अनुपालन को प्रोत्साहित करने का माध्यम बने न कि नियम तोड़ने का आसान रास्ता हो। यह पूछे जाने पर कि नए नियमों में क्या फार्मा उद्योग को जेल से राहत का रास्ता दिया है, इस पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि यह बदलाव ढील नहीं बल्कि नियामक सुधार है।


क्या है कंपाउंडिंग?
सीडीएससीओ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि कंपाउंडिंग का मतलब कानूनी मामले को अदालत में मुकदमा चलाए बिना तय जुर्माना पूरा करके निपटा देना है। आसान भाषा में कहें तो जब किसी दवा कंपनी या कारोबारी से नियमों की छोटी या तकनीकी गलती हो जाती है तो अब हर बार कोर्ट केस नहीं चलेगा। सरकार ने ऐसी गलतियों के लिए यह विकल्प दिया है कि गलती मान ली जाए और उसे सुधार लिया जाए। फिर तय जुर्माना समय रहते भर दिया जाए। इसके बाद इस मामले में आपराधिक मुकदमा नहीं चलेगा। इसी प्रक्रिया को कंपाउंडिंग कहते हैं।

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