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बच्चों की पढ़ाई से चिंतित बाल आयोग, ‘एक देश एक चुनाव’ के पक्ष में उतरा
हरेन्द्र, नई दिल्ली
Updated Tue, 18 Sep 2018 12:29 PM IST
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राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखा है। आयोग ने अपने पत्र में ‘एक देश एक चुनाव’ का समर्थन करते हुए लिखा है कि बार-बार चुनाव कराने से बच्चों की पढ़ाई पर बुरा असर पड़ता है, जो शिक्षा के मूलभूत अधिकार का उल्लंघन है। आयोग का कहना है कि इस विषय पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है क्योंकि बच्चों की शिक्षा के हिसाब से यह क्रांतिकारी कदम होगा।
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10 दिन बंद रखने पड़ते हैं स्कूल
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग यानी एनसीपीसीआर के सदस्य (शिक्षा का अधिकार) प्रियंक कानूनगो का कहना है कि आयोग को देश के कई राज्यों से ऐसी शिकायतें मिली हैं कि जिनमें शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाने से बच्चों की शिक्षा प्रभावित हो रही है। उन्होंने कहा कि शिकायतें मिलने के बाद कराए शोध में पता चला कि चुनावों में स्कूलों की आधारिक संरचना और संसाधन भी इस्तेमाल होते हैं, जिससे कम से कम 10 दिन बच्चों की पढ़ाई के बर्बाद होते हैं।
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बच्चों को नहीं मिलता मध्यान्ह भोजन
आयोग को लिखे पत्र में कानूनगो ने कहा है कि चुनावी ड्यूटी के दौरान बच्चों को स्कूलों में मध्यान्ह भोजन भी नहीं मिल पाता और उन्हें पोषण से वंचित किया जाता है। जो उनके विकास के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि तकरीबन 15 फीसदी अध्यापकों को बूथ लेवल अधिकारी बनाया जाता है, जबकि इसे चुनाव ड्यूटी में शामिल नहीं किया जाना चाहिए। एनसीपीआर का कहना है कि चुनावों के चलते स्कूल साल में कम से कम 220 शैक्षिक दिवस पूरे नहीं कर पाते, जो शिक्षा के अधिकार, 2009 के पैरा 19 का उल्लंघन है।
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देश में 80 लाख शिक्षक
2015-16 के आंकड़ों के मुताबिक देश में लगभग 14.67 लाख स्कूल हैं, जिनमें 10.7 लाख सरकारी एवं 3.49 लाख निजी स्कूल हैं। जिनमें कुल 11 करोड़ बच्चे सरकारी और 7.43 करोड़ बच्चे गैर सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं। वहीं देश में 14.36 लाख स्कूल भवन बने हुए हैं, जिनमें 80 लाख शिक्षक नियुक्त हैं। जिनमें 47.3 लाख शिक्षक सरकारी स्कूलों में तैनात हैं।
ज्यादातर मतदान केंद्र स्कूलों में
अपने पत्र में कानूनगो ने लिखा है कि 2014 के चुनावों में देश में 9 लाख 28 हजार 237 मतदान केंद्र को स्कूलों में बनाया गया था। इनमें निजी और सरकारी दोनों तरह के स्कूल शामिल थे। वहीं स्कूलों में चुनावों की तैयारी, सुरक्षा और जांच में कम से कम 10 दिन लगे। शिक्षा के अधिकार की धारा-27 की गलत व्याख्या के चलते शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाया जा रहा है। वहीं मानव संसाधऩ मंत्रालय ने भी इस संदर्भ में अपनी रिपोर्ट मांगी है।
नहीं बना सकते मतदान केंद्र अधिकारी
शिक्षा के अधिकार की धारा 37 के मुताबिक शिक्षकों को विधानसभा, लोकसभा, जनगणना या आपदा-राहत के काम के अलावा किसी और गैर-शैक्षणिक गतिविधि में नहीं लगाया जा सकता। कानूनगो का कहना है कि धारा-27 की गलत व्याख्या करके शिक्षकों को मतदान केंद्र अधिकारी बनाया जा रहा है। जबकि छूट केवल मतदान और मतगणना के लिए दी गई है। बूथ लेवल अधिकारी बना कर ऐक्ट के उल्लंघन के साथ बच्चों की पढ़ाई का कीमती वक्त भी बर्बाद हो रहा है।
बच्चों की पढ़ाई की कोई नहीं सोचता
प्रियंक के मुताबिक भारत में लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए चुनावी प्रक्रिया को अपनाया गया है। लोकसभा से लेकर स्थानीय निकाय सभी के अलग-अलग चुनाव होते हैं और इन चुनावों को संपन्न कराने के लिए स्कूलों के संसाधन प्रयोग में लाए जाते हैं। लेकिन इस पर कभी विचार-विमर्श नहीं हुआ कि स्कूली बच्चों की शिक्षा पर इसका कितना दुष्प्रभाव पड़ता है।
लॉ कमीशन ने भी जताई थी चिंता
गौरतलब है कि ‘एक देश एक चुनाव’ पर सरकार को सौंपी अपनी ड्राफ्ट रिपोर्ट में लॉ कमीशन ने भी माना था कि अधिकांश मतदाता केंद्र स्कूलों के अंदर बने होते हैं। स्कूली कर्मचारी को भी चुनावी प्रक्रिया में लगाया जाता है। वहीं मतदान वाले दिन स्कूल को बंद भी करना पड़ता है। इसके अलावा केन्द्र और राज्य सरकार के कर्मियों को भी चुनावी प्रकिया में लगाया जाता है, उन्हें प्रशिक्षण भी देना होता है। अगर अलग-अलग चुनाव होंगे तो उन्हें बार-बार प्रशिक्षण देना पड़ता है, जिससे उनके रोजमर्रा के कामों में भी व्यवधान पड़ता है।