Modi Completes 20 Years in Power: क्या मोदी भाजपा से ‘बड़े’ हो गए हैं, उन पर इंदिरा मॉडल फॉलो करने के आरोप क्यों हैं
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विस्तार
भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने एक बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हुए कहा था ‘ ही इज मोस्ट क्रिटिसाइज्ड मैन इन इंडियन पॉलिटिक्स’। यह बात सच भी है। जब मोदी देश के शक्तिशाली नेता के तौर पर उभर रहे थे तब न तो कोई ऐसी राजनीतिक पार्टी थी और न मीडिया जिसने मोदी पर हमला नहीं किया हो। लेकिन मोदी इन हमलों से और ताकतवर होते चले गए। मोदी के आलोचक और समर्थक दोनों एक मत से मानते हैं कि भाजपा में मोदी का कद अब इतना ऊंचा हो गया है कि अब अक्सर ये कहा जाने लगा है कि मोदी भाजपा और भाजपा मोदी हो गए हैं।राजनीति के जानकार कहते हैं कि मोदी की ताकत पॉलिटकल मार्केटिंग हैं और इसकी बदौलत वे चुनाव में जीत दिलवाने वाले ‘मोदी ब्रांड’ हो गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार के सात साल पूरे हो चुके हैं और मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का दूसरा साल भी 30 मई को पूरा हो चुका है। मोदी जैसे ही केंद्र की सत्ता पर आसीन हुए भाजपा के अच्छे दिन आ गए।
मोदी का चेहरा आगे करके भाजपा एक-एक करके कई राज्यों में चुनाव जीतती गई और उसका सियासी ग्राफ बढ़ता गया। 2014 में मोदी के आने के बाद 2018 तक देश के 21 राज्यों में भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार थी। इस समय भाजपा और उसके सहयोगी दलों की सरकार वाले प्रदेशों की संख्या 18 है। इससे पहले इंदिरा गांधी के समय में कांग्रेस की 17 राज्यों में सरकार थी।
मोदी ने जीत दिलाने वाली इमेज बना ली
संघ के प्रचारक रहे गोंविदाचार्य ने एक बयान में कहा-मोदी संघ के दूसरे प्रचारकों की तरह कभी चुपचाप काम करने वाले नहीं रहे। वे काम भी पूरी ताकत के साथ करते हैं और उसकी मार्केटिंग भी। उनके मुताबिक एक नेता को बड़ा बनने के लिए तीन जरूरी बातें हैं, विपरीत परिस्थितियों में खुद को मजबूती से खड़ा करने के लिए पूरी तैयारी, तकनीक और साधन। विपरीत परिस्थितियों में खड़ा रखने के लिए संघ का संगठन उनकी पूरी मदद करता है और अब उनके पास सोशल मीडिया की भी ताकत है और मोदी के पास सत्ता तक पहुंचने की बेहतर राजनीतिक समझ है।
उनका मानना रहा कि मोदी चुनाव जीतने के लिए पूरी ताकत लगा दते हैं। मोदी पॉलिटिक्स का मतलब सिर्फ पावर समझते हैं और पावर के लिए जरूरी है चुनावों में जीत और जीत बेहतर इमेज से बनती है। मोदी ने यह इमेज बना ली है इसलिए वे अक्सर भाजपा को जीत दिला देते हैं।
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हालांकि 2019 के दौरान भाजपा को कुछ झटके भी लगे। लोकसभा चुनाव के साथ आंध्र प्रदेश, सिक्किम, ओडिशा और अरुणाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव भी हुए। भाजपा ने लोकसभा चुनाव में तो पिछली बार से ज्यादा सीटें लाकर आलोचकों का मुंह बंद करा दिया लेकिन विधानसभा चुनावों में वह सिर्फ अरूणाचल प्रदेश को ही फतह कर पाई। भाजपा को दूसरा बड़ा झटका 2020 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में लगा जहां भाजपा ने जीत के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया लेकिन अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी से जीत नही सकी।
तीसरा बड़ा झटका भाजपा को इस साल अप्रैल- मई में हुए पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर लगा है जहां उसने सरकार बनाने की उम्मीदें पाली हुई थीं लेकिन टीएमसी ने भाजपा की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। हालांकि पार्टी के प्रदर्शन में यहां जबरदस्त उछाल हुआ और भाजपा तीन से 74 सीटों पर पहुंच गई और कई राज्यों में भाजपा का सियासी वर्चस्व बना हुआ है।
वे पार्टी के सर्वमान्य नेता
राजनीति के जानकार बताते हैं कि नरेंद्र मोदी के लिए दिल्ली में पैर पसारना उतारना आसान काम नहीं था। मोदी के हिंदू नेता के तौर पर जिस पहचान को नेगेटिव माना गया उसे मोदी ने पॉजिटीव इमेज में बदल दिया और यही मोदी की ताकत बन गई। भाजपा के एक नेता कहते हैं कि मोदी विकास पुरुष के तौर पर उभरे हैं और युवाओं-महिलाओं ही नहीं बल्कि हर वर्ग में लोकप्रिय हैं। पार्टी उनकी सरकार के कामकाज की उपलब्धियों को लेकर चुनाव में उतरती है और अक्सर चुनाव जीत जाती है इसलिए वे पार्टी के सर्वमान्य नेता हैं।
पार्टी ने 303 सीटों पर जीत दर्ज की जबकि एनडीए के खाते में 352 सीटें आई। जबकि पांच साल पहले हुए 16वें लोकसभा चुनाव में 'मोदी लहर' की बदौलत भारतीय जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला था। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 30 सालों का रिकॉर्ड तोड़ 283 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इस चुनाव में भाजपा गठबंधन ने कुल 336 सीटें जीती थीं।
मोदी भाजपा के लिए जरूरी हो गए
मोदी सहित देश के तमाम प्रधानमंत्रियों पर ‘भारत के प्रधानमंत्री-देश दशा और दिशा’ किताब लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार और लेखक रशीद किदवई के मुताबिक यह बात बहुत हद तक सही है कि मोदी अब भाजपा से ‘बड़े’ हो गए हैं या यह भी कह सकते हैं कि मोदी भाजपा के लिए जरूरी हो गए हैं क्योंकि पार्टी में सारे निर्णय मोदी ही कर रहे हैं। हाल की गुजरात की घटना को लीजिए। विजय रूपाणी के साथ-साथ पूरे मंत्रिमंडल को बदल दिया गया और माना जाता है कि यह निर्णय मोदी का रहा।
उनके मुताबिक भाजपा पूरी तरह मोदी पर निर्भर है। जैसे इंदिरा पर कांग्रेस निर्भर थी वैसे ही मोदी पर भाजपा निर्भर है। 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, और राजस्थान में कांग्रेस जीती और उसके छह महीने बाद लोकसभा सीट में में इन तीनों राज्यों में कांग्रेस को केवल दो ही सीटें मिली। इसका मतलब है कि मोदी ब्रांड भाजपा को केंद्र की सत्ता तक पहुंचाती है और मोदी जीत दिलवाने वाला चेहरा हैं।
ब्रांड मोदी बनने में सावधानी से काम किया
पीएम मोदी पर 'नरेंद्र मोदीः द मैन, द टाइम्स.' किताब लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार और लेखक नीलांजन मुखोपाध्याय तस्वीर का एक दूसरा पहलू दिखाते हैं। उनका मानना है कि भाजपा का ब्रांड बनने में मोदी ने बहुत सावधानी से काम किया है। सामूहिकता को हटाकर एकमात्र नेता वाली छवि विकसित की है। संघ का जब गठन हुआ था तब एक सिद्धांत विकसित हुआ था एक चालक अनुवर्तित्वा का, इसका मतलब है कि एक ही नेता को माने। केशव बलिराम हेडगेवार ने एक तरह से यह सिद्धांत दिया था।
बाद में बालसाहेब देवरस के समय यह बात उभर कर आई कि इसमें कई लीडर होंगे एक नहीं। अभी भी भाजपा में कई नेता हैं लेकिन फेसलेस हैं। यह नहीं कहा जा सकता कि कोई एक नेता ही फैसले कर रहे हैं लेकिन वो कौन कर रहा है यह आम जनता को नहीं पता है क्योंकि संदेश यह जाना है कि मोदी सुप्रीम लीडर है।
मोदी इंदिरा मॉडल को फॉलो करते हैं
वहीं नरेंद्र मोदी को लंबे समय तक कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार धीमंत पुरोहित कहते हैं मनोवैज्ञानिक तौर पर एक प्रचलित थ्योरी है जिसे आप धिक्कारते हैं आप धीरे-धीरे उसी की तरह हो जाते हैं। मोदी कांग्रेस मुक्त भारत की बात करते हैं। पर दुर्भाग्य से मोदी मुख्य तौर पर इंदिरा मॉडल को फॉलो करते हैं। यह मोदी की कामयाबी नहीं है। यह लोकतंत्र के लिए ही नहीं बल्कि मोदी के लिए नुकसानदायक है। मोदी के बाद शाह को छोड़कर किसी और मंत्री की पहचान नहीं बन पा रही है। मोदी के बाद और कोई नहीं। यह मोदी की नाकामयाबी मानी जा सकती है।
पुरोहित का मानना है कि मोदी ने खुद को आगे करने के लिए किसी और को बढ़ना नहीं दिया। वे गुजरात से बाहर गए तो यहां नेतृत्व का खालीपन सा हो गया कि मोदी के बाद कौन। एक बड़े नेता के पीछे अंधकार होता है उसे वो सच साबित कर रहे हैं। यह देश, लोकतंत्र और मोदी के लिए खतरनाक है। सारे चुनाव मोदी के नाम पर ही लड़े जाते हैं, यह ठीक नहीं है। मोदी के चेहरे का इस्तेमाल बड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों के लिए होना चाहिए। प्रधानमंत्री की जरूरत किसान आंदोलन जैसे बड़े मुद्दे को सुलझाना है। कोरोना वैक्सीनेशन या सुप्रीम कोर्ट के कम्यूनिकेशन में उनकी तस्वीर का क्या मतलब है? इन सब को राजनीति से दूर रहना चाहिए।
वाजपेयी का दौर ऐसा नहीं था
नीलंजन मुखोपाध्याय भी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं। उनका कहना है कि जब मैं पत्रकारिता में आया था तब इंदिरा गांधी कांग्रेस में सब कुछ थी। राजीव गांधी भी ऐसा करने लगे और अब मोदी भी ऐसा ही कर रहे हैं। हमने इंदिरा-राजीव की भी आलोचना की थी और आज भी कह रहा हूं कि 2014 के पहले भाजपा ज्यादा लोकतांत्रिक थी अब कम है।
उनके मुताबिक मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब भी मुख्यमंत्री ऑफिस ही सबकुछ हुआ करता था। व्यक्ति केंद्रित सत्ता काम कर रही थी। अब भी ऐसा ही प्रधानमंत्री के अलावा दूसरे मंत्रियों की कोई पूछ नहीं है। जबकि वाजपेयी के समय ऐसा नहीं था। वाजपेयी और आडवाणी को सम्मान में बराबरी में रखा जाता था। यह मोदी की आत्ममुग्धता है कि वे खुद को पार्टी से बड़ा बनाने में लगे हैं और अपने खुद के भाषण में अपने नाम का बार-बार जिक्र करते हैं।