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मोदी के सत्ता में 20 साल: क्या ब्रांड मोदी 'अपराजेय' हैं.. 2024 में गेम बिगाड़ेंगी दीदी, कितने पानी में विपक्ष
Thu, 07 Oct 2021 07:38 AM IST
प्रतिभा ज्योति
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
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Published by: प्रतिभा ज्योति
Updated Thu, 07 Oct 2021 07:38 AM IST
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मोदी के सत्ता में 20 साल: क्या 2024 तक तैयार होगा मजबूत विपक्ष
- फोटो :
Amar Ujala
विस्तार
यह सवाल तो वैसे कई नेता और राजनीतिक विश्लेषकों से पूछा गया लेकिन जैसे ही यह बात भारतीय जनता पार्टी के एक नेता से की उन्होंने पलट कर पूछा- क्या आज भारत में राष्ट्रीय स्तर पर सभी विपक्षी दल मिलकर भी ऐसे किसी विकल्प का दावा कर सकते हैं? भाजपा नेता का कहना है कि किसी भी लोकतंत्र में एक स्वस्थ विकल्प का हमेशा स्वागत है लेकिन पीएम मोदी ने किसी के लिए कोई विकल्प नहीं छोड़ा।वे आगे कहते हैं एक राजनेता के रूप में मोदी अपने विरोधियों से कई कदम आगे हैं। राजनीतिक विमर्श में वह किसी से पीछे नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने जो कद हासिल किया है उससे सभी को हैरान हैं। विपक्ष में ऐसा कोई चुनौती देने वाला नहीं है जो उनकी तुलना में भी करीब आ सके। यह एक कठोर वास्तविकता है और विपक्ष इसे जानता है। इससे यह कड़वा सच नहीं बदलेगा।
आपदा को अवसर में बदलने में माहिर
एक वरिष्ठ राजनीतिक पर्यवेक्षक भी कुछ ऐसा ही कहते हैं। उनके मुताबिक नरेंद्र मोदी आपदा में अवसर ढूंढने के मामले में माहिर हैं। उन्होंने 2007 गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के मौत का सौदागर नारे को राष्ट्रवाद में बदल दिया, 2014 चुनाव में मणि शंकर के चायवाला वाले बयान को लेकर चाय पर चर्चा ही करवा दी और इसे गरीब का मजाक उड़ाने वाले बयान में बदल दिया।
2016 नवंबर में नोटबंदी के फैसले को मोदी ने अमीरों के खिलाफ अभियान बना दिया। फिर राहुल गांधी के चौकीदार चोर के नारे को देशभर में ‘मैं भी चौकीदार’ अभियान बना दिया। मोदी एक फाइटर हैं। वे जो लक्ष्य निर्धारित कर लेते हैं तो उसके लिए अपना सौ फीसदी देते हैं। तो क्या वाकई ऐसा है कि नरेंद्र मोदी या भाजपा के खिलाफ 2024 तक भी कोई मजबूत विपक्ष तैयार नहीं हो सकता।
मजबूत गठबंधन बन सकता है विकल्प
कुछ राजनीतिक जानकार मानते हैं कि ऐसा नहीं है कि मोदी अभेद्य किला हैं। एक मजबूत गठबंधन से पीएम मोदी और भाजपा के सामने एक सशक्त विकल्प खड़ा करने की कोशिश की जा सकती है। लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि मजबूत गठबंधन की उनकी रणनीति किस हद तक कामयाब होगी और सबसे अहम सवाल है कि मजबूत विपक्ष में नरेंद्र मोदी के सामने गठबंधन का चेहरा कौन होगा।
राहुल गांधी
- फोटो :
पीटीआई
जनता दल (यूनाइटेड) के वरिष्ठ नेता के सी त्यागी कहते हैं कि हमने तख्तापलट के दो बड़े उदाहरण देखें हैं। 12 जून 1975 में आपतकाल लगते ही इंदिरा गांधी की तख्ता पलट की पटकथा लिख दी गई और 1988 में जन मोर्चा का गठन हुआ जिसमें जनता पार्टी, लोकदल और कई पार्टियों को मिलाकर जनता दल की स्थापना हुई ताकि सभी दल एकसाथ मिलकर राजीव गांधी सरकार का विरोध कर सकें। लेकिन इन आंदोलनों की बात करें खासकर पहले वाले आंदोलन की तो उसमें जेपी जैसा नेतृत्व था जिनका न कोई आगे था ना पीछे और जिन्होंने राष्ट्रहित से आगे कुछ नहीं सोचा। इसलिए वे इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ विरोध का बिगुल बजा सके।
उनका सवाल है 'आज ऐसा कौन सा नेता है जो जेपी जैसा विश्वसनीय है और जिसके कहने पर लोग आंदोलन के लिए सड़कों पर उतर जाएं। इसकी कमान कौन संभालेगा, कौन सड़कों पर उतरेगा और यह आंदोलन कैसे पूरे देश में फैलेगा? इसलिए इस बात की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं है कि 2024 तक मोदी के खिलाफ कोई मजबूत विपक्ष तैयार हो पाएगा।'
मोदी को लंबे समय तक कवर करने वाले गुजरात के वरिष्ठ पत्रकार धीमंत पुरोहित भी विपक्ष की स्थिति देखकर इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते कि 2024 तक इस बात की कोई उम्मीद भी दिखती है। उनका कहना है कि मोदी ने खुद को इतना बड़ा नेता बना दिया है कि विपक्ष खत्म हो गया। कांग्रेस मुक्त बनाने के लिए मोदी या भाजपा जितनी कोशिश कर रही है उससे ज्यादा कोशिश खुद सोनिया और राहुल कर रह हैं क्योंकि कांग्रेस में अब राजनीति करने की इच्छा नहीं रह गई है। जहां तक बाकी विपक्षी पार्टियां है वे इतने दंभी हैं कि वे राहुल या ममता के मंच के नीचे आने को तैयार नहीं होंगे।
राहुल गांधी विपक्ष को एकमत से स्वीकार्य चेहरा नहीं
कांग्रेस विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी है लेकिन वह अभी बिखरी हुई है। कांग्रेस को करीब से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं कांग्रेस जरूरत एक मजबूत विपक्ष के तौर पर उभर सकती थी लेकिन दिक्कत यह है कि पार्टी को अभी अंदरूनी लड़ाईयों से ही फुर्सत नहीं है। राहुल गांधी पार्टी के सारे फैसले कर रहे हैं लेकिन अध्यक्ष पद स्वीकार करने को तैयार नहीं। इसलिए जरूरी है कि यदि मोदी से मुकाबला करना है तो वह पहले अपना घर ठीक करें।
उनका सवाल है 'आज ऐसा कौन सा नेता है जो जेपी जैसा विश्वसनीय है और जिसके कहने पर लोग आंदोलन के लिए सड़कों पर उतर जाएं। इसकी कमान कौन संभालेगा, कौन सड़कों पर उतरेगा और यह आंदोलन कैसे पूरे देश में फैलेगा? इसलिए इस बात की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं है कि 2024 तक मोदी के खिलाफ कोई मजबूत विपक्ष तैयार हो पाएगा।'
मोदी को लंबे समय तक कवर करने वाले गुजरात के वरिष्ठ पत्रकार धीमंत पुरोहित भी विपक्ष की स्थिति देखकर इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते कि 2024 तक इस बात की कोई उम्मीद भी दिखती है। उनका कहना है कि मोदी ने खुद को इतना बड़ा नेता बना दिया है कि विपक्ष खत्म हो गया। कांग्रेस मुक्त बनाने के लिए मोदी या भाजपा जितनी कोशिश कर रही है उससे ज्यादा कोशिश खुद सोनिया और राहुल कर रह हैं क्योंकि कांग्रेस में अब राजनीति करने की इच्छा नहीं रह गई है। जहां तक बाकी विपक्षी पार्टियां है वे इतने दंभी हैं कि वे राहुल या ममता के मंच के नीचे आने को तैयार नहीं होंगे।
राहुल गांधी विपक्ष को एकमत से स्वीकार्य चेहरा नहीं
कांग्रेस विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी है लेकिन वह अभी बिखरी हुई है। कांग्रेस को करीब से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं कांग्रेस जरूरत एक मजबूत विपक्ष के तौर पर उभर सकती थी लेकिन दिक्कत यह है कि पार्टी को अभी अंदरूनी लड़ाईयों से ही फुर्सत नहीं है। राहुल गांधी पार्टी के सारे फैसले कर रहे हैं लेकिन अध्यक्ष पद स्वीकार करने को तैयार नहीं। इसलिए जरूरी है कि यदि मोदी से मुकाबला करना है तो वह पहले अपना घर ठीक करें।
राहुल गांधी और ममता बनर्जी
- फोटो :
पीटीआई
किदवई कहते हैं क्या कांग्रेस के पास 2024 में भी सभी विपक्षी दलों में से अधिकतम सांसद होंगे? क्या अन्य विपक्षी दल राहुल गांधी को अपने निर्विवाद नेता के रूप में स्वीकार करेंगे? ऐसे कई सवाल हैं जिसका जवाब लोकसभा चुनाव के बाद ही मिल सकता है।
राहुल प्रबल दावेदार
कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि राहुल गांधी परंपरागत तौर पर मोदी से मुकाबला करने के प्रबल दावेदार माने जाते हैं। यदि हम अपनी सीटों की संख्या में उल्लेखनीय रूप से वृद्धि कर लेते हैं तो क्या इस बात की संभावना दिखाई नहीं देती है कि अन्य विपक्षी दल राहुल गांधी को स्वीकार करेंगे? दिक्कत इस बात की नहीं कि राहुल गांधी विपक्ष के सर्वमान्य नेता बन सकते हैं या नहीं समस्या इस बात की है कि क्षेत्रीय दल हमारे उम्मीदवारों को अपने गढ़ में नहीं आने देते हैं। वे हमारी पार्टी के साथ गठबंधन भी करते हैं तो अपने शर्तों पर और हम उसमें सौदेबाजी नहीं कर पाते। दूसरी बात यह है कि मोदी अपने प्रचार की योजना पहले से ही बना लेते हैं, हम इसमें पिछड़ जाते हैं।
ममता बनर्जी का दावा भी मजबूत
विपक्षी नेताओं में एकमात्र नेता टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी है जो विपक्ष का मजबूत चेहरा बनने की दावेदारी पेश कर सकती हैं। उन्होंने लगभग हर मुद्दे पर मोदी और भाजपा का सामना करके एक फाइटर होने की छवि बनाई है। तृणमूल कांग्रेस चाहती हैं कि ममता निर्विवाद रूप से विपक्ष की नेता के रूप में उभरें। यह सच है कि ममता ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा की चुनावी मशीन को कड़ी टक्कर दी और करारी शिकस्त दी।
वे राष्ट्रीय स्तर पर मोदी को घेरने के लिए अपनी जीत को भुनाना भी चाहती हैं। बेशक 2024 के आम चुनावों में अभी ढाई साल का समय बाकी हैं, लेकिन ममता ने संकेत दे दिया है कि भाजपा हराने के लिए विपक्षी दलों को बहुत पहले से तैयारी करनी होगी। इसलिए कहा जा रहा है कि यदि भविष्य में कभी कोई ऐसी संभावना बनती है कि राहुल और ममता में से विपक्षी दलों को अपना प्रधानमंत्री चुनना हो तो ममता बनर्जी इस रूप में स्वीकार की जा सकती हैं।
राहुल प्रबल दावेदार
कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि राहुल गांधी परंपरागत तौर पर मोदी से मुकाबला करने के प्रबल दावेदार माने जाते हैं। यदि हम अपनी सीटों की संख्या में उल्लेखनीय रूप से वृद्धि कर लेते हैं तो क्या इस बात की संभावना दिखाई नहीं देती है कि अन्य विपक्षी दल राहुल गांधी को स्वीकार करेंगे? दिक्कत इस बात की नहीं कि राहुल गांधी विपक्ष के सर्वमान्य नेता बन सकते हैं या नहीं समस्या इस बात की है कि क्षेत्रीय दल हमारे उम्मीदवारों को अपने गढ़ में नहीं आने देते हैं। वे हमारी पार्टी के साथ गठबंधन भी करते हैं तो अपने शर्तों पर और हम उसमें सौदेबाजी नहीं कर पाते। दूसरी बात यह है कि मोदी अपने प्रचार की योजना पहले से ही बना लेते हैं, हम इसमें पिछड़ जाते हैं।
ममता बनर्जी का दावा भी मजबूत
विपक्षी नेताओं में एकमात्र नेता टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी है जो विपक्ष का मजबूत चेहरा बनने की दावेदारी पेश कर सकती हैं। उन्होंने लगभग हर मुद्दे पर मोदी और भाजपा का सामना करके एक फाइटर होने की छवि बनाई है। तृणमूल कांग्रेस चाहती हैं कि ममता निर्विवाद रूप से विपक्ष की नेता के रूप में उभरें। यह सच है कि ममता ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा की चुनावी मशीन को कड़ी टक्कर दी और करारी शिकस्त दी।
वे राष्ट्रीय स्तर पर मोदी को घेरने के लिए अपनी जीत को भुनाना भी चाहती हैं। बेशक 2024 के आम चुनावों में अभी ढाई साल का समय बाकी हैं, लेकिन ममता ने संकेत दे दिया है कि भाजपा हराने के लिए विपक्षी दलों को बहुत पहले से तैयारी करनी होगी। इसलिए कहा जा रहा है कि यदि भविष्य में कभी कोई ऐसी संभावना बनती है कि राहुल और ममता में से विपक्षी दलों को अपना प्रधानमंत्री चुनना हो तो ममता बनर्जी इस रूप में स्वीकार की जा सकती हैं।
दिल्ली में पीएम मोदी से मिले शरद पवार (फाइल फोटो)
- फोटो :
ANI
शरद पवार की दावेदारी में कितना दम
पवार विपक्षी नेताओं में सबसे अनुभवी हैं और उनके कौशल को नरेंद्र मोदी और ममता बनर्जी जैसे नेता पहचानते हैं। अपने लंबे राजनीतिक जीवन में, पवार को प्रधानमंत्री बनने के कई मौके मिले, लेकिन वे चूक गए। हालांकि दो बातें उनके खिलाफ जाती हैं कि एक तो उनकी उम्र बढ़ रही है, और दूसरी, उनकी पार्टी एनसीपी ज्यादातर महाराष्ट्र तक ही सीमित है। लेकिन, अतीत में ऐसा देखा गया है कि जब विपक्षी दल गठबंधन करते हैं तो वे किसी नेता की उम्र या क्षेत्रीय सीमाओं को नहीं देखते हैं। केवल एक ही मुद्दा रहता है कि विपक्षी नेताओं के बीच एकता कितनी है। हालांकि चाहे वह शरद पवार हों या ममता बनर्जी, दोनों जानते हैं कि नेतृत्व के मुद्दे पर सभी विपक्षी नेताओं को एक के नाम पर सहमत करना एक कठिन काम होगा।
एक वरिष्ठ पत्रकार का मानना है कि यदि 2024 में विपक्ष को मोदी का मुकाबला करना है तो उनके खिलाफ लड़ाई उनकी तरह ही लड़नी पड़ेगी। मोदी की सबसे बडी ताकत है तकनीक का इस्तेमाल। वे तकनीक का सबसे ज्यादा और बेहतर इस्तेमाल करते हैं। कोविड काल में जब सब लोग सोशल डिस्टेंसिग पर काम कर रहे थे उस समय पीएम सब लोगों के साथ संपर्क में थे। चाहे मुख्यमंत्री हों, या जिलाधिकारी हों, या डॉक्टर हों या हेल्थ वर्कर्स। वे तकनीक की कद्र करने वाले लोगों में से है जो चुनाव प्रबंधन में उनके लिए सबसे बेहतर औजार बन जाता है।
उनसे पहले चंद्रबाबू नायडू ऐसे नेता थे जिन्होंने कामकाज में तकनीक के इस्तेमाल पर जोर दिया। नायडू ने सरकारी दफ्तरों में समय की पाबंदी तकनीक के जरिए कर दी थी। मोदी भी कामकाज में तकनीक लेकर आए तो पारदर्शिता आई। आज वही काम अरविंद केजरीवाल कर रहे हैं। कहने का मतलब है कि मोदी टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल की बात हो सोशल मीडिया पर मौजूदगी की या हर घटना को इंवेट में बदलने की वे हर बात में माहिर है। यदि विपक्ष को मोदी से लड़ना है तो विपक्ष की एकता, मजबूत गठबंधन समेत यह भी बहुत जरूर है कि विपक्ष को तकनीक के मामले में अपनी ताकत बढ़ानी होगी।
पवार विपक्षी नेताओं में सबसे अनुभवी हैं और उनके कौशल को नरेंद्र मोदी और ममता बनर्जी जैसे नेता पहचानते हैं। अपने लंबे राजनीतिक जीवन में, पवार को प्रधानमंत्री बनने के कई मौके मिले, लेकिन वे चूक गए। हालांकि दो बातें उनके खिलाफ जाती हैं कि एक तो उनकी उम्र बढ़ रही है, और दूसरी, उनकी पार्टी एनसीपी ज्यादातर महाराष्ट्र तक ही सीमित है। लेकिन, अतीत में ऐसा देखा गया है कि जब विपक्षी दल गठबंधन करते हैं तो वे किसी नेता की उम्र या क्षेत्रीय सीमाओं को नहीं देखते हैं। केवल एक ही मुद्दा रहता है कि विपक्षी नेताओं के बीच एकता कितनी है। हालांकि चाहे वह शरद पवार हों या ममता बनर्जी, दोनों जानते हैं कि नेतृत्व के मुद्दे पर सभी विपक्षी नेताओं को एक के नाम पर सहमत करना एक कठिन काम होगा।
एक वरिष्ठ पत्रकार का मानना है कि यदि 2024 में विपक्ष को मोदी का मुकाबला करना है तो उनके खिलाफ लड़ाई उनकी तरह ही लड़नी पड़ेगी। मोदी की सबसे बडी ताकत है तकनीक का इस्तेमाल। वे तकनीक का सबसे ज्यादा और बेहतर इस्तेमाल करते हैं। कोविड काल में जब सब लोग सोशल डिस्टेंसिग पर काम कर रहे थे उस समय पीएम सब लोगों के साथ संपर्क में थे। चाहे मुख्यमंत्री हों, या जिलाधिकारी हों, या डॉक्टर हों या हेल्थ वर्कर्स। वे तकनीक की कद्र करने वाले लोगों में से है जो चुनाव प्रबंधन में उनके लिए सबसे बेहतर औजार बन जाता है।
उनसे पहले चंद्रबाबू नायडू ऐसे नेता थे जिन्होंने कामकाज में तकनीक के इस्तेमाल पर जोर दिया। नायडू ने सरकारी दफ्तरों में समय की पाबंदी तकनीक के जरिए कर दी थी। मोदी भी कामकाज में तकनीक लेकर आए तो पारदर्शिता आई। आज वही काम अरविंद केजरीवाल कर रहे हैं। कहने का मतलब है कि मोदी टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल की बात हो सोशल मीडिया पर मौजूदगी की या हर घटना को इंवेट में बदलने की वे हर बात में माहिर है। यदि विपक्ष को मोदी से लड़ना है तो विपक्ष की एकता, मजबूत गठबंधन समेत यह भी बहुत जरूर है कि विपक्ष को तकनीक के मामले में अपनी ताकत बढ़ानी होगी।
किसान आंदोलन
- फोटो :
amar ujala
विपक्ष को इन राज्यों में करना होगा अच्छा प्रदर्शन
राजनीतिक पर्यवेक्षक की राय में कांग्रेस को छोड़कर अन्य विपक्षी दल क्षेत्रीय राजनीति के उस्ताद हैं, लेकिन यदि वे साथ आते हैं तो भाजपा के लिए बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है। बड़े राज्यों की बात करें तो तमिलनाडु और केरल से भाजपा की कोई सीट नहीं है, जहां 59 लोकसभा सीटें हैं। आज महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल की 90 सीटों में से भाजपा के पास 40 है।
2024 में गठबंधन सरकार बनाने की किसी भी उम्मीद के लिए, विपक्ष को इन चार राज्यों में बहुत अच्छा प्रदर्शन करना होगा और 149 में से कम से कम 120 सीटों पर जीत हासिल करनी होगी और फिर शेष भारत से 155 सीटों का प्रबंधन करना होगा। साथ ही हिंदी बेल्ट वाले राज्यों यूपी, बिहार, गुजरात, हरियाणा और मध्यप्रदेश से भी भाजपा की सीटें छीननी होगी। हालांकि इसकी संभावना बेहद कम दिखती है, क्योंकि अभी यूपी, हरियाणा और मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार है और बिहार में वह जेडीयू के साथ सरकार चला रही है।
विपक्ष के पास मुद्दों की कमी नहीं
रशीद किदवई का मानना है कि यदि 70 फीसदी बहुसंख्यक किसी पार्टी को मिलते हैं तो उसको पछाड़ा नहीं जा सकता। यदि किसी पार्टी को बहुसंख्यक के बहुमत वोट नहीं मिलते और सिर्फ अल्पसंख्यक वोट मिलते हैं तो इसका कोई फायदा नहीं होता। मोदी और भाजपा के खिलाफ लामबंद होने वाली पार्टियों को इस बहुसंख्यक वोट हासिल करने पर जोर देना होगा। उनका मानना है कि ऐसा नहीं है कि मोदी के खिलाफ मजबूती से खड़े होने के लिए विपक्ष के पास मुद्दा नहीं है। किसान आंदोलन हो या महंगाई या बेरोजगारी इन तमाम मुद्दों पर मोदी और भाजपा को घेरा जा सकता है लेकिन यहां यह देखना है कि विपक्षी एकता कितनी है?
राजनीतिक पर्यवेक्षक की राय में कांग्रेस को छोड़कर अन्य विपक्षी दल क्षेत्रीय राजनीति के उस्ताद हैं, लेकिन यदि वे साथ आते हैं तो भाजपा के लिए बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है। बड़े राज्यों की बात करें तो तमिलनाडु और केरल से भाजपा की कोई सीट नहीं है, जहां 59 लोकसभा सीटें हैं। आज महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल की 90 सीटों में से भाजपा के पास 40 है।
2024 में गठबंधन सरकार बनाने की किसी भी उम्मीद के लिए, विपक्ष को इन चार राज्यों में बहुत अच्छा प्रदर्शन करना होगा और 149 में से कम से कम 120 सीटों पर जीत हासिल करनी होगी और फिर शेष भारत से 155 सीटों का प्रबंधन करना होगा। साथ ही हिंदी बेल्ट वाले राज्यों यूपी, बिहार, गुजरात, हरियाणा और मध्यप्रदेश से भी भाजपा की सीटें छीननी होगी। हालांकि इसकी संभावना बेहद कम दिखती है, क्योंकि अभी यूपी, हरियाणा और मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार है और बिहार में वह जेडीयू के साथ सरकार चला रही है।
विपक्ष के पास मुद्दों की कमी नहीं
रशीद किदवई का मानना है कि यदि 70 फीसदी बहुसंख्यक किसी पार्टी को मिलते हैं तो उसको पछाड़ा नहीं जा सकता। यदि किसी पार्टी को बहुसंख्यक के बहुमत वोट नहीं मिलते और सिर्फ अल्पसंख्यक वोट मिलते हैं तो इसका कोई फायदा नहीं होता। मोदी और भाजपा के खिलाफ लामबंद होने वाली पार्टियों को इस बहुसंख्यक वोट हासिल करने पर जोर देना होगा। उनका मानना है कि ऐसा नहीं है कि मोदी के खिलाफ मजबूती से खड़े होने के लिए विपक्ष के पास मुद्दा नहीं है। किसान आंदोलन हो या महंगाई या बेरोजगारी इन तमाम मुद्दों पर मोदी और भाजपा को घेरा जा सकता है लेकिन यहां यह देखना है कि विपक्षी एकता कितनी है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (फाइल फोटो)
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सोशल मीडिया
जदयू नेता केसी त्यागी का मानना है कि राष्ट्रीय और राज्य चुनावों के मानदंड और मुद्दे अलग-अलग होते हैं। कोई क्षेत्रीय नेता अपने स्थानीय आकांक्षा को तो पूरा कर सकते हैं लेकिन यही काम वे राष्ट्रीय स्तर पर नहीं कर सकते। खेला होबे बंगाल में तो चल सकता है लेकिन यूपी में नहीं चलेगा। दूसरी पार्टियों में परिवारवाद है या उन पर भ्रष्चाचार के आरोप है, इसलिए वे राष्ट्रीय स्तर पर बड़े सवाल नहीं खड़े कर सकते हैं। उसके बाद सबसे बड़ी समस्या भाषा की है। देश चलाने के लिए नेता के पास भाषा तो ऐसी होनी चाहिए जो सबको अपनी लगे। वे मानते है कि ऐसा हो सकता है लोग किन्हीं कारणों से भाजपा से निराश हों लेकिन जब उन्हें कोई विकल्प नहीं दिखता है तो वे भाजपा की तरफ जाते हैं।
कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षक कहते हैं बेशक, पश्चिम बंगाल में चुनावी हार एक झटका थी, लेकिन मोदी ऐसे नेता हैं जो हार से कभी निराश नहीं होते। मोदी को टक्कर देने के लिए विपक्ष के सामने एक बड़ी भाजपा जैसी विशाल पार्टी है। मोदी एक मजबूत नेता हैं और उनके पास एक प्रभावी पार्टी संगठन है जो भारत के प्रत्येक राज्य में फैल गया है। मोदी को चुनाव लड़ने की कला में महारत हासिल है. उन्होंने अपने अथक परिश्रम से ही अपना दबदबा मजबूत किया है।
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता को भी उम्मीद है कि कई चुनौतियों के बाद भी मोदी का जादू चलता रहेगा और भाजपा को 2024 में सत्ता में लौटने से कोई नहीं रोकेगा क्योंकि विपक्ष या उनके नेताओं ने पिछले सात सालों में मतदाताओं को यह समझाने के लिए बहुत कम काम किया है कि वे मोदी या भाजपा से बेहतर शासन दे सकते हैं। दूसरी बात यह है कि क्या विपक्षी दल उस समय तक एक साथ रहेंगे और क्या वे एक निर्विवाद नेता के नाम पर सहमत होंगे। इस समय उसका अनुमान लगाना बहुत मुश्किल है।
कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षक कहते हैं बेशक, पश्चिम बंगाल में चुनावी हार एक झटका थी, लेकिन मोदी ऐसे नेता हैं जो हार से कभी निराश नहीं होते। मोदी को टक्कर देने के लिए विपक्ष के सामने एक बड़ी भाजपा जैसी विशाल पार्टी है। मोदी एक मजबूत नेता हैं और उनके पास एक प्रभावी पार्टी संगठन है जो भारत के प्रत्येक राज्य में फैल गया है। मोदी को चुनाव लड़ने की कला में महारत हासिल है. उन्होंने अपने अथक परिश्रम से ही अपना दबदबा मजबूत किया है।
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता को भी उम्मीद है कि कई चुनौतियों के बाद भी मोदी का जादू चलता रहेगा और भाजपा को 2024 में सत्ता में लौटने से कोई नहीं रोकेगा क्योंकि विपक्ष या उनके नेताओं ने पिछले सात सालों में मतदाताओं को यह समझाने के लिए बहुत कम काम किया है कि वे मोदी या भाजपा से बेहतर शासन दे सकते हैं। दूसरी बात यह है कि क्या विपक्षी दल उस समय तक एक साथ रहेंगे और क्या वे एक निर्विवाद नेता के नाम पर सहमत होंगे। इस समय उसका अनुमान लगाना बहुत मुश्किल है।