अध्ययन: तकनीक नहीं, किसान-आमजन की सहभागिता से बचेगा जल; रिचार्ज पिट्स से बदली किस्मत, मिला स्थायी समाधान
बहु-उद्देशीय अध्ययन से साबित हुआ कि एक्विफर रिचार्ज एंड रिकवरी (एएसआर) जैसी तकनीकें तब ही काम करती हैं, जब किसान स्वयं उनकी जिम्मेदारी लें। इस अध्ययन का नेतृत्व प्रो. प्रभाकर शर्मा ने किया, जिनके साथ स्पेन, जापान और भारत के विशेषज्ञ शामिल थे। यह शोध सोसाइटल इंपैक्ट्स जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
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जल संकट का हल सिर्फ वैज्ञानिक तकनीक से नहीं, बल्कि किसानों, आम आदमी की सोच और सहभागिता से मिलेगा। नागालैंड विश्वविद्यालय के नेतृत्व में किए ताजा वैश्विक अध्ययन ने स्पष्ट कर दिया है कि जल संरक्षण की उन्नत तकनीकें तब तक असर नहीं दिखा सकतीं, जब तक उन्हें स्थानीय समुदाय न अपनाए।
बहु-उद्देशीय अध्ययन से साबित हुआ कि एक्विफर रिचार्ज एंड रिकवरी (एएसआर) जैसी तकनीकें तब ही काम करती हैं, जब किसान स्वयं उनकी जिम्मेदारी लें। इस अध्ययन का नेतृत्व प्रो. प्रभाकर शर्मा ने किया, जिनके साथ स्पेन, जापान और भारत के विशेषज्ञ शामिल थे। यह शोध सोसाइटल इंपैक्ट्स जर्नल में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन के दौरान दक्षिण बिहार के नालंदा जिले के मेयर और नेकपुर गांवों में एएसआर तकनीक का पायलट परीक्षण किया गया। इन गांवों में वर्षा जल को जमीन के भीतर पहुंचाने के लिए रीचार्ज पिट्स बनाए गए। जहां मेयर गांव के किसानों ने इन संरचनाओं की नियमित सफाई व देखरेख की, वहां सिंचाई व्यवस्था में सुधार, अतिरिक्त फसलें और बेहतर आमदनी देखने को मिली। वहीं, नेकपुर गांव में किसानों की अनिच्छा और संदेह के चलते संरचनाएं बेकार पड़ी रहीं। यही फर्क दिखाता है कि तकनीक की सफलता लोगों की सहभागिता पर निर्भर है। शोध में बताया गया कि एक रीचार्ज पिट की लागत लगभग 33,000 से 35,000 रुपए आती है, जो पारंपरिक बोरवेल से बहुत ज्यादा सस्ता है। शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि नीतिगत स्तर पर शुरुआत मध्यम और बड़े किसानों से की जाए ताकि सामूहिक जिम्मेदारी का माहौल बन सके।
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देसी तकनीक अपनाकर महिलाएं भी बनीं प्रेरणा
शोध में भुंगरू नामक देसी तकनीक का भी जिक्र किया गया है, जिसमें बारिश के समय खेतों में जमा अतिरिक्त पानी को जमीन के भीतर भेजकर भूजल स्तर को रिचार्ज करना है। इस जल को बाद में सिंचाई के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। यह तकनीक खासतौर पर गुजरात में विकसित हुई, जहां इसका सफल प्रयोग सरगवा गांव की महिलाओं ने किया। पहले बाढ़ के कारण खेतों में सिर्फ एक फसल ही ली जा सकती थी, वहीं भुंगरू तकनीक अपनाने के बाद महिलाओं ने साल में दो से तीन फसलें उगानी शुरू कर दीं। आज यही महिलाएं न सिर्फ अपने खेतों में पानी की आत्म-निर्भरता हासिल कर चुकी हैं, बल्कि गांव के लिए प्रेरणा बन गई हैं।
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भारत सर्वाधिक भूजल उपयोगकर्ता
शोध के निष्कर्ष बताते हैं कि भारत जैसे देश के लिए जो विश्व का सर्वाधिक भूजल उपयोगकर्ता है, वहां सिर्फ तकनीक अकेले समाधान नहीं हो सकती। जब तक किसान और आम आदमी नीति और क्रियान्वयन दोनों के केंद्र में नहीं होंगे, तब तक किसी भी जल-संरक्षण तकनीक की सफलता क्षणिक ही रहेगी। इस तकनीक को टिकाऊ बनाने के लिए शोधकर्ताओं ने राज्य सरकारों से व्यापक क्रियान्वयन मैनुअल तैयार करने और किसान सहभागिता को योजनाओं में शामिल करने की सिफारिश की है।
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