फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   muslim man freed after 22 years

खौफ से भरे 22 साल: 'मां कमरे में आती और मेरे माथे पर हाथ रखकर चली जाती'

Thu, 02 Jun 2016 01:35 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली Updated Thu, 02 Jun 2016 01:35 PM IST
विज्ञापन
muslim man freed after 22 years
खौफ से भरे 22 साल - फोटो : BBC

''बीच रात में मेरी मां उठकर मेरे कमरे में आती है और मेरे माथे पर हाथ रखकर चली जाती है क्योंकि वो अपने आपको ये भरोसा देना चाहती है कि मैं वाक़ई जेल से बाहर आ चुका हूं। ये कोई सपना नहीं है।" निसारुद्दीन ये बात बड़ी आसानी से कह जाते लगते हैं। इस जुमले के पीछे के बेपनाह दर्द को समझना शायद तबतक सहज न होगा जबतक ये मालूम न हो कि निसारुद्दीन ज़िंदगी के 22 बेशक़ीमती साल कालकोठरी में बिताकर हाल ही में घर लौटे हैं।

विज्ञापन


साल 1994 में हैदराबाद पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया था। उन पर आरोप था एपी एक्सप्रेस में हुए ब्लास्ट में शामिल होने का। लंबी क़ानूनी लड़ाई के बाद आख़िरकार पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने उनकी और उनके भाई ज़हीरुद्दीन की सज़ा निरस्त कर दी और निसारुद्दीन को फ़ौरन छोड़ने का हुक्म दिया था।
विज्ञापन


निसार 1994 के उस दिन की बात बताते हैं: हैदराबाद में 15 जनवरी 1994 को वो घर से अपने फार्मेसी कॉलेज जाने के लिए निकले। एक सप्ताह बाद उनके इम्तिहान शुरू होने वाले थे। तब उन्हें हैदराबाद पुलिस ने उठा लिया।
विज्ञापन
विज्ञापन


निसार ने बताया, "मुझे 43 दिनों तक ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से हिरासत में रखा गया। उसके बाद मुझे मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। हिरासत में उन्होंने मुझे मारा-पीटा, उल्टा लटकाया। मैं उनसे पूछता रहा कि मेरा क़सूर तो बताओ लेकिन उन्होंने मुझे कुछ नहीं बताया। उन्होंने एक मनगढंत क़बूलनामे पर जबरन मेरे दस्तख़त करा लिए। उन्होंने कहा कि ये मेरी रिहाई के लिए है। लेकिन मुझे बाद में पता चला कि मुझे टाडा में फंसा दिया गया। दो साल बाद स्थानीय टाडा अदालत ने कहा कि टाडा के नियम-क़ायदे मुझ पर लागू नहीं होते।"

यकीन नहीं हुआ कि मैं छूट गया हूं

muslim man freed after 22 years
जब मैं जेल से बाहर आया तो मुझे यक़ीन नहीं हुआ - फोटो : BBC

निसार 1994 के उस दिन की बात बताते हैं: हैदराबाद में 15 जनवरी 1994 को वो घर से अपने फार्मेसी कॉलेज जाने के लिए निकले। एक सप्ताह बाद उनके इम्तिहान शुरू होने वाले थे। तब उन्हें हैदराबाद पुलिस ने उठा लिया। निसार ने बताया, "मुझे 43 दिनों तक ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से हिरासत में रखा गया। उसके बाद मुझे मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। हिरासत में उन्होंने मुझे मारा-पीटा, उल्टा लटकाया। मैं उनसे पूछता रहा कि मेरा क़सूर तो बताओ लेकिन उन्होंने मुझे कुछ नहीं बताया। उन्होंने एक मनगढंत क़बूलनामे पर जबरन मेरे दस्तख़त करा लिए। उन्होंने कहा कि ये मेरी रिहाई के लिए है। लेकिन मुझे बाद में पता चला कि मुझे टाडा में फंसा दिया गया। दो साल बाद स्थानीय टाडा अदालत ने कहा कि टाडा के नियम-क़ायदे मुझ पर लागू नहीं होते।"

निसार के वकील शादां फरासत ने कहा, "सामान्य तौर पर एक पुलिस अफ़सर के सामने दिए गए क़बूलनामे को अदालत में वैध नहीं माना जाता लेकिन टाडा के अंतर्गत क़बूलनामे को वैध माना जाता है अगर वो एसपी रैंक के अफ़सर के सामने दिया गया हो। लेकिन निसार के केस में बिना किसी सीनियर पुलिस अधिकारी की अनुमति के उसका क़बूलनामा लिया गया था जो मान्य नहीं होता।" उन्होंने आगे कहा, ''कोर्ट में केस उसी समय ख़ारिज हो जाना चाहिए था लेकिन फिर सीबीआई ने केस अपने हाथ में ले लिया और वही क़बूलनामा अजमेर टाडा कोर्ट में पेश किया। तब अदालत ने निसार को उम्रक़ैद की सज़ा सुना दी।" निसार के भाई ज़हीर ने कहा, "मुझे तो बेल मिल गई क्योंकि मुझे फेफड़ों का कैंसर हो गया था। लेकिन हमें सुप्रीम कोर्ट में जाने और केस रद्द कराने में 12 साल लग गए।"

जवानी का लंबा दौर जेल में बिता चुके निसार

muslim man freed after 22 years
जवानी का लंबा दौर जेल में बिता चुके निसार - फोटो : BBC

निसार ने कहा, ''जब मैं जेल से बाहर आया तो मुझे यकीन नहीं हुआ कि मैं छूट गया हूं। जब लोग जेल से बाहर आते हैं तब उन्हें ख़ुशी होती है। लेकिन रिहा होने के बाद भी मैं वो ख़ुशी महसूस ही नहीं कर पा रहा था।" निसार के मुताबिक़ ''जब मैं अपने घर पहुंचा तब जाकर मुझे अहसास हुआ कि मैं रिहा हो चुका हूं। लेकिन सब बदल चुका था। मैं अपने शहर में ही अजनबी जैसा महसूस कर रहा था। मेरे भतीजों और भतीजी को मुझसे मिलाया गया। मेरी रिहाई की लड़ाई लड़ते-लड़ते मेरे अब्बा दुनिया से रुख़सत हो चुके थे। मेरा पुराना घर वैसा ही था। टूटी दीवारें और लीक होती छत।"

जवानी का लंबा दौर जेल में बिता चुके निसार तय नहीं कर पा रहे हैं कि उन्हें आगे करना क्या है। "मैं जब 20 साल का था जब पुलिस पकड़ कर ले गई। अब मैं 43 साल का हूं। मुझे ज़िंदगी नए सिरे से शुरू करनी है।" वो कहते हैं, "मेरी मां मेरे लिए बहुत तड़पी है। मैं नहीं चाहता कि दूसरी मांओं के साथ ऐसा हो। कई लोग ऐसे हैं जो मेरी तरह बिना क़सूर सालों से जेल में सड़ रहे हैं। मेरी एकमात्र यही इच्छा है कि बेगुनाहों को इस तरह से कष्ट ना झेलना पड़े। मैं यही संदेश प्रशासन तक पहुंचाना चाहता हूं। निसार और ज़हीर अपनी जवानी ख़राब करने के एवज़ में मुआवज़े के हक़दार हैं। लेकिन अपनी रिहाई के लिए इतनी लंबी लड़ने वाले दोनों भाइयों को पता है कि इसके लिए एक और लंबा संघर्ष उनका इंतज़ार कर रहा है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed